इस विषय में एक लघु उपन्यास लिखी है ,उसका सार इस कविता के माध्यम से दे रहा हूँ ,चूँकि विषय वास्तु बघेलखण्ड से प्रेरित है और मेरी छेत्रिय बोली भी है ,इस कारण कविता बघेली में है...
मरीगय भईस बीयातै
,हे राम अब का करी !
दूध के चिंता जरौ
नहीं, रामलाल के अरशी अब को चरी
.
मरीगैन भईस चरावत-चरावत
,हे राम अब का करी!
दूध के चिंता जरौ
नहीं, रामलाल के खेत अब का हम चरी
.
या भईस के पीछे का-का
सहन ,हे राम अब का करी !
दूध के चिंता जरौ
नहीं, रामलाल के गारी अब को खई.
भईस का सानी-भूसा सब
दिहन,हे राम अब का करी !
दूध के चिंता जरौ
नहीं,भईस के खरी अब का हम खई .
भईस के आड़े छूटा साड़
कस घुमन,हे राम अब का करी !
दूध के चिंता जरौ
नहीं,खूटा से अब का हम हिन् बधिजई.
हाँथ रहा अब हमा सुहराय,हे
राम अब का करी !
दूध के चिंता जरौ
नहीं,अब का मेहरिया के कपार फोरी.
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