बघेली कविता है,रसास्वादन करे !!!
पती गमाईहा बीबी सहर वाली,
ब्याह लाया बीबी अंग्रेजी वाली.
दहेज़ में चीजे अजीब-अजीब सी थी लाई,
ये सब उसकी मम्मी जी ने थी भिजवाई .
साजो श्रृंगार सब भड़वा-बर्तन,
फ्रिज कूलर भी साथ थी लाई .
गांव वाले देख कर भौचक्का रह गये,
चले जब कूलर तो कलेजा काँप जाये.
बहु सहर वाली देख के गन्न हुए मेहमान,
बहु बेचारी बेखबर उनकी बातन से अंजान.
सुबह एक दिन बहु जी करती रही कोलगेट,
अतने माँ देखिस उनकर देवर छोटकौना.
मंजन कइके रख दिहिन बहुजी ,
चली गयी अंदर उड़सामय बिछौना.
अतने मा मौका पायिस छोटकौना,
चिखमयमा मीठ लगा कोलगेटउना.
चिखत-चिखत आधा कैदिहिस कोलगेट छोटकौना,
देखिस जब भौजी ये क्या कर रहे हो तुम छोटकौना.
बहुत मीठ लगा भौजी या तोहार कोलगेटउना,
भौजी दिहिस एक चटकन खींच के कनौना.
छोटू बिचारु भागे छिल्लाय केरे,
रोवत-रोवत पहुंचे जाय खेतौना .
हमारे भाई के को कई दिहिस गाल -लाल,
कह मिश्रा बंधू केकर सामत है आयी आज.
ओतय मारय लाग्,हमका भौजी,
भईया या तू का कई लाये हो काज.
कहे मारिस बताव ता पहिले छोटकौना,
या मेहरिया के का अतनी बढ़िगय सान .
दुइ अच्छर पढ़ी का लिहिस या मेहरिया,
अउतय बघारय लाग् या आपन ज्ञान.
रोवा न तू ओखा हम सबक सिखाउब,
सानमा ओखे आज हम आगी लगाउब.
तव-तव मा बड़काउ हर-बरदा ढील चले,
कंधे मा हर राखि केरे बरदा हाँकि चले .
राखिस हर जोर से पूँछिस मेहरारु सेन्हि,
कहे मारे छोटकौना हमा का किनिहिस .
कह बीबी जी तुम ही कहो ये क्या बात है,
कोलगेट भी क्या कोई खाने की चीज है.
बड़कू अपने गांव के मुखिया जमींदार,
पढ़े-लिखे सबसे अधिक है चौथा पास.
कोलगेट देखींन फेर चाखिन.
खाये के बाद थोड़ा मुस्काईन.
अरे याता बहुत मीठ है बड़कू जी बोले,
सुखय काहे खाये,तै है अबे बहुत भोले .
रोटी माँ चुपड़ी के कहे न खाये छोटकौना,
जा रोसँइया से रोटीता लईआव छोटकौना.
भौजी से ओमा कोलगेट चुपरावा,
थोड़ का तै खा बांकी हम खई ,
परा सगला खेत जोते का फे हम जाई.
मेहरारू बोली इसे अइसे नहीं खाते,
बड़कू जी बोले ता फेर कैसे है खाते.
इसे कूंची में रख के दाँत में लगते,
साथ-साथ इसे हिलाते भी है जाते .
इससे दाँत हो जाते है जैसे मोती,
इसे लगाने से सड़न नहीं है होती.
कह बड़कउनु इसे कूंची में कैसे है खाते,
कोलगेट नहीं पर कूंची हम खा जायेंगे.
इससे भी विचित्र हुआ था हाल,
बड़कऊ जब गए थे ससुराल.

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