सोमवार, 1 अक्टूबर 2018

अध्यात्म विज्ञानं के गूढ़ तत्व रहस्य ,Wisdom of Life

                                  !!!अध्यात्म विज्ञानं!!!

साधना बाहरी और आंतरिक परिस्थिति को समरूप ,समरस एक सूत्र में बांधने की चेष्टा, साधन और माध्यम है,जिसमे योग और तप अध्यात्म को प्राप्त करने में एक कारक होसकते है केवल इन्ही रास्तो में चलकर अध्यात्म को प्राप्त किया जा सकता है ऐसा बिलकुल भी नहीं है .


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संसार में जितने भी तरह के अविष्कार ,धर्म शास्त्रों का सृजन हुआ वो सब अध्यात्म की ही देन है.आइंस्टीन ,स्टीफन हॉकिंस दुनिया के सबसे बड़े खगोल और भौतिक शास्त्री है जिन्होंने आंतरिक सूछ्मता के विज्ञानं को समझा .विज्ञानं का अर्थ जानना होता,इस परिभाषा को अगर सत्य माने तो फिर एक ही विज्ञानं है .


"आत्म विज्ञानं" बांकी जितने भी तरह के विज्ञानं मानव द्वारा बनाये गए है ,वो सब इन्द्रिय बोध के लिए चीजों को आसान तरीके से समझने के लिए बनाये गए है .बाहरी परिस्थिति को जानने से पहले स्वयं को जानना अत्यंत आवश्यक है ,क्योकि जब तक स्वयं के अंतरात्मा के विज्ञानं को नहीं समझते ,बाहरी परिस्थिति से संपर्क ,सम्बन्ध स्थापित करना संभव नहीं .


सम्पूर्ण भ्रह्मांड ऊर्जा का बंधन है ,आंतरिक ऊर्जा के सक्रिय अवस्था में होने के तदुपरांत व्यक्ति आश्चर्य की सीमा को लाँघ जाता है,जिससे जिज्ञासा का जन्म होता है ,कहने का तात्पर्य आंतरिक ऊर्जा की सक्रिय अवस्था का परिणाम ही जिज्ञासा है.


आइंस्टीन ,स्टीफन हॉकिंस के जीवन पर यदि प्रकाश डाले तो मालूम होता है ,ये दोनों ही औसत मानसिकता के व्यक्ति थे परन्तु स्वाभाव से अत्यंत ही जिज्ञासु इसी जिज्ञासा के कारणवस कई महत्वपूर्ण खोज की जिन्हे सर्वकालीन दुनिया का सबसे बुद्दिमान व्यक्ति समझा जाता है.संछेप में ...


गौर करने वाली दो बाते है "जिज्ञासा और बुद्दिमत्ता"बारीकी से विवेचना करने पर ये दोनों ही अलग अलग है बुद्दिमत्ता "इन्द्रिय जनित संग्रह" की अवधारणा है,जिसे साधारणतः याददाश्त भी कह सकते है,किसी कारण और परिस्थिति में कुछ सामन्य से अलग व्यवहार के तौर पर भी समझा जासकता है .


जबकि जिज्ञासा स्वछंद मानसिकता की उन्मुक्त अवधारणा है ,जो भार रहित निर्वात ऊर्जा जो परमाणु से भी परे है (परमाणु भी ऊर्जा का बंधन है ,जो न्युट्रान रूपी निष्क्रिय बल ,प्रोटान रूपी सक्रिय बल इलेक्ट्रान के सक्रिय गतिमान फोटोन कणो से मिलकर बनता है )
भावार्थ  Meaning...
"जीवन का महत्व विस्तार से नहीं अपितु आत्मबोध,आंतरिक सूछ्मता में है"

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