शुक्रवार, 22 जून 2018

वो बात नहीं जो पहले थी , जो है उनमे वो बात नही...Poetry


1
वो बात नहीं जो पहले थी,
जो है उनमे वो बात नही,
अब वो कांटे नहीं जो चुभ सके,
जो बचे है उन्हें कोई अकेला ही,
साफ कर रहा हो जैसे...

2
कही दूर रौशनी की एक किरण दिख रही है,
युग प्रवर्तक बन युग परिवर्तन करने,
कर्त्तव्यचुत हो कंटकाकीर्ण पथ पर,
कोई अकेले ही चल रहा हो जैसे ...

3
दुर्भेद्य को धेय कर दुर्गम पथ ,
आप प्रशस्त करते हुए ,
दुर्दम्य सहस को कोई अकेला ही,
निस्तेज कर रहा हो जैसे ...

4
राह की गंदगी को खिंचते हुए ,
अतीत की काली परछाइयों को,
समेटते हुए कोई अकेला ही ,
चला जा रहा हो जैसे...

5
शूलपाणि बन सूल से अभ्र को भेदते हुए,
सूरज के सप्तरथ पे बैठ ,
सूरज की किरणों को साथ ले,
कोई धरती पर अकेला ही दौड़ा,
चला रहा हो जैसे...
From "Meri Suchhm Anubhuti"...

प्रेम अप्रकट भाव ,अप्रत्यछ जीवन

"प्रेम अंतरात्मा का अप्रकट भाव है, अप्रत्यछ जीवन भी है .प्रेम जीवन की रसधार है,प्रेम जीवन के उद् भीज का कारण और चरम स्खलन भी है"

जो हमें दिखाई नहीं देता लेकिन बढ़ता उसी तरह है ,जिस प्रकार एक सामान्य जीव देह का विकाश होता है .
विस्तार से जानते है ...

प्रेम और जीव देह की परस्पर ,और समान्तर समानता क्या है . अप्रकट जीव देह कैसे है ,इस विषय में अपनी "सूछ्म अनुभूति " व्यक्त करने का प्रयाश करता हूँ , हालाकी प्रेम जीव देह का भी भाव है ,श्रष्टि का कारण और आधार भी प्रेम ही है ,प्रेम की व्याख्या करना एक बड़ा ही मुश्किल कार्य है ,इस विषय पर जितनी भी बात की जाये कम है,फिर भी मेरी जितनी समझ है कम सब्दो में  विचार प्रकट करने की कोशिश करता हूँ ...


  शिशु के जन्म लेने के बाद उसके माता -पिता द्वारा हर समय नजर रखते है ,कही उसे,सर्दी ,गर्मी ,तो नहीं लग रही ,शिशु के मनोभाव को समझने की कोशिश करते है .ठीक उसी प्रकार जब दो विपरीत लिंगो  के मध्य प्रेम पनपता है ,तब दोनों एक दूसरे की छोटी छोटी बातो पर ,व्यवहार पर नजर रखते है ,एक दूसरे के मनो भाव को समझने की कोशिश करते है .सुरूआती अवस्था में  यह एक शिशु की तरह बड़ा ही नाजुक होता है ,जरा सी भी विपरीत परिस्थिति सहन नहीं कर सकता है.


अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करने लगता है ,अपने अस्तित्व्य की रच्छा * करने में समर्थ नहीं पता ,अगर बहरी परिस्थि अनुकूल न हुई तो शिशु रूपी प्रेम पुष्प का  अंत हो जाता है .तात्पर्य माता पिता द्वारा शिशु के समुचित देख भाल न करना .उसी प्रकार प्रेम भी शिशु अवस्था में स्वयं की सुरछा करने में असमर्थ है .इसके अलावा शिशु और प्रेम दोनों के उत्तरोत्तर   वृद्धि के लिए ,शिशु का  जीव देह के प्रति आसक्त भाव और प्रेम में निः छलता उतनी ही आवश्यक है .परिस्थितियां कितनी भी अनुकूल हो ,यदि दोनों के आधार उर्वर  नहीं है ;तो कितना  भी सिंचित करे दोनों का विकाश संभव नहीं होपाता है .


फिर  जैसे- जैसे शिशु बालक बनता है ,माता पिता द्वारा समय समय पर ललन पालन किया जाता  है,भार थोड़ा कम लगता है, उसी प्रकार प्रेम भी बढ़ता है ,
,हर समय फिकर करने की जरुरत नहीं पड़ती ,प्रेम के अंदर विश्वास धीरे धीरे  पनपने लगता है .
बालक जैसे जैसे युवा अवस्था में प्रवेश करता है ,अपने कार्य स्वयं करने लग जाता है ,माता पिता का  दायित्व देख -रेख  करना और दिशा -निर्देशन करना होता है .उसी प्रकार प्रेम का  आधार भी मजबूत होता जाता है,प्रेम में समर्पण का भाव आजाता है,वृछ की भांति दोनों पुष्पित और पल्लवित होने लगते है ..
पग डंडी से चल कर जीवन और प्रेम रूपी गाड़ी हाई वे पर आजाती है ..गाड़ी में  समय समय पर ब्रेक लगाकर बस समंजश्य बनाने की आवश्यकता पड़ती है.

शनिवार, 16 जून 2018

किसान हूँ मै

 काविता

  

...किसान हूँ मै...
सिसक सिसक कर रोए,
दरके धरती,नीर उबले,
पोखर तालाब  सब सूखे,
सूरज धरती एक सीध में,
दिन दुपहरी,जब धूप चढ़े,
ऐसी उत्कट ज्वाला में,
जलाता हूँ मै 
किसान हूँ मै 
दुनिया चक्की,
आटा हूँ मै ...


खाली अम्बर वीरान लगे ,
सूनी गालियाँ बयार चले,
जेठ की दुपहरिया में,
बेदम हो चली है सांसे,
अतड़ी पेट से है चिपटे ,
लहू बून्द पसीना बनके,
 टपका हूँ मै 
किसान हूँ मै 
दुनिया चक्की,
आटा हूँ मै ...


फसल पड़ी है पूरी खेत में ,
कब मौसम खेल बिगाड़े,
वक़्त बेवक्त की बारिश से ,
हाँथ में हसुली,साफा सर पे,
फसल काट रहा हूँ  मै ,
किसान हूँ मै 
दुनिया चक्की,
आटा हूँ मै ...


घर के अंदर छाव में ,
जब दुनिया चैन से सोए ,
चिड़िया भी न मुन्नाए
कुत्ता भी न गुगु आए ,
आती हुई लू की थपेड़े ,
खाता हूँ मै 
किसान हूँ मै 
दुनिया चक्की
आटा हूँ मै ...


आस है की जाये नहीं मन से,
बड़वाग्नि सी लगी है पेट में,
बीज बहड़ी उरिया डी ए पी ,
बराबर भी दाम न मिले,
मुनाफे की बात कौन करे ,
फेरो दिन रात मरता हूँ मै
किसान हूँ मै 
दुनिया चक्की,
आटा हूँ मै...


इस तरह के भाव  की कविता ,कहानी ,शेर ,गजल का संग्रह "मेरी सूछ्म अनुभूति" में आप चाहे तो पढ़ सकते है ...Link
https://www.amazon.com/Dharmendra-Mishra/e/B07BMV8XHX

रविवार, 10 जून 2018

"स्वाविवेक ही बुद्धिमत्ता का प्रथम सोपान है

"स्वाविवेक ही बुद्धिमत्ता का प्रथम सोपान है"

 

 स्वानुभूति एवम स्वप्रेरित ज्ञान ही जीवन में सार्थकता और सम्पूर्णता लाते है  है .जिस व्यक्ति का जीवन जानकारी एवम दुसरो के दिए हुए उधार के विचारो से लदा नहीं है .

वही व्यक्ति आत्म ज्ञान के करीब होता है . आत्म ज्ञान होने के तदुपरान्त व्यक्ति प्रकृति का सूछ्म चित्रण करने लगता है .विचारो में गहराई एवम स्वयं और प्रकृति के मध्य सम्बन्ध स्थापित करने की चेष्टा करता है क्योकि प्रकृति शक्तियों से निर्मित जीव देह और प्रकृति के मध्य आत्मा एक कड़ी का काम करती है.फलस्वरूप तीनो ही शक्तियों के आपसी सामंजश्या  की स्थिति में ही जीवन में समरसता का भाव आता है .निर्वध्य ऊर्जा का प्रवाह होने लगता है .


लेकिन यह बात कहना   जितना  आसान है करना उतना ही दुष्कर है.हर जीव देह के लिए कदाचित संभव नहीं है ,वजह प्रकृति शक्तियों को समझने के लिए विचारो  में स्थिरता(सुख दुःख से परे विन्दु स्वरुप शून्य भाव , वैचारिक अवस्था ) और नि:छलता का भाव होना अत्यंत अवश्यक  है.

सांसारिक तृष्णा रूपी जीवन में लगा मन आत्म ज्ञान कभी प्राप्त नहीं कर सकता.जो व्यक्ति करता होते हुए भी जो स्वयं को करता नहीं मानता,कर्म फल के बंधन से मुक्त अपना समर्पण भाव  प्रकृति में ,सन्निहित मानता है वही व्यक्ति आत्म ज्ञान प्राप्त कर सकता है क्योकि बिना प्रकृति को समझे ,अंतरात्मा  के अस्तित्व को नहीं समझा जा सकता है .

 जिसे ईश्वर को जानने की चेष्टा भी कह सकते है ;अंतरात्मा ,जीव देह और प्रकृति तीनो ही एक सायकल की तरह काम करते है, तथा तीनो ही एक दूसरे के बिना अपूर्ण है .


इन तीनो ही तत्वज्ञ  के संतुलन के उपरांत ही यथार्थ ज्ञान ,विजिडम  प्राप्त किया जा सकता है,विजिडम ही ज्ञान की श्रेष्ठम अवस्था है .सुख ,दुःख ,लोभ और मोह -माया जैसे सांसारिक विषय वास्तु से परे मन में स्थिरता,शून्य,चैतन्य भाव प्रदान करता है.

विजिडम के तदुपरांत सभी ज्ञानेन्द्रिय एक साथ संचालित होने लगती है .स्वयं ज्ञान स्फुटित होने लगता  है,अगोचर , गोचर सदृश्य मालूम होता है .जिससे वैचारिक दृश्टव्य अवलोकन भी कह सकते है .जोकी  सांसारिक ज्ञान और विज्ञान का कारण बनता  है .

दुनिया में स्थापित हर तरह का ज्ञान,विज्ञानं  और अविष्कार विजिडम के तदुपरान्त ही प्राप्त किये गए है  .
जितने भी धर्म और धर्म शास्त्र की रचना,अविष्कार  हुए ,विजडम प्राप्त व्यक्तियों द्वारा ही किया गया.है अपनी  सूछ्म परिकल्पनाओं द्वारा अपनी अनुभूतियों का सांसारिक चित्रण कर ज्ञान और विज्ञान में परिणित किया .



भावार्थ ...

कुछ भी न जानो ...न जानते हुए भी सब कुछ जानो ....जो भी कर्म करो सम्पूर्ण समर्पण के भाव से करो ...कुछ लेने के भाव से नहीं ...न चाहते  हुए भी सब कुछ मिल जायेगा ...ये भाव रखना भी इंसान को सांसारिकता की तरफ खींचता है .जोकि नकारात्मक भाव है .
नोट ...आलेख मेरे स्वयं के आत्म ज्ञान और  अनुभव पर आधारित विचार है ...इससे इतर भी आप का विचार हो सकता है...हर व्यक्ति का दृश्टिकोण एक जैसा नहीं होता और न ही होना चाहिए ,"स्वाविवेक ही बुद्धिमत्ता का प्रथम सोपान है"...इसी तरह और भी कई सारे आलेख विज्ञानं और ऐतिहासिक पृस्ठभूमि पर आधारित है जो आपको एक बहुत ही अलग तरह का अनुभव देगा ..ebook आलेख संग्रह ...
link..
https://authorcentral.amazon.com/gp/books..
                                                                             लेखक
                                                                 मेरी सूछ्म अनुभूति
                                                                        सब्दारण्य

रविवार, 3 जून 2018

Bagheli Hindi Poetry

       ...बघेली हास्य कविता ...

दोहा,चौपाई,सोरठा,और छप्पय ये सब है छंद,
काहे "श्याम सुन्दर" का "पूरन छाप"बीड़ी है पसंद,

श्याम सुन्दर है अइसे,बिन पेंदी के लोटा हो जइसे,
गगरी जईसे पेट फुलाये,नाक मा किहे है सब के दम,

मारि माचिस सुलगायिन बीड़ी,लिहिन कट्टा करिहाने खोंस,
छोड़ भैंसिया फलाने के खेतमा,फलाने रहय दुरय से चिल्लात....


केकर भैंसिया हमरे खेत पड़ी,
लिहिस सगली अरशी हमा खाय ,

बेढ़ परय हो"श्याम सुन्दर"तोहरे भैंसियामा,
लिहा तू सगली अर्शी हमार चराय,

भईंस बरोबर तोहरे अकिल नहीं,
कहाँ बतान तू मनते नहीं ,

रोज रोज के तोहार धाईना होइगा,
अब तू हमरे हाँथे पनही खाबा,

या बीड़ी का तोहरे पीछे डरिके,
मर देब माचिस,रहबा  तू  फेर,

दुरय से चिल्लात,
घरे घरे जाय जाय के ,
कहत बागबा सबसे अगाध...


"श्याम सुन्दर "ककउ ना दे गारी हो...
साझीके दुइ पउआ दूध तुहु लैलीहा,

अर्शी का जाएँ दा तेल लेयें,
अगले साल पाकी फेर ,

दैउ करय जियत रहय हमार भैंसिया ,
हम फेर लेब सगली अर्शी तोहार चराय,

पूरन छाप बीड़ी के नाम बहुतबा,
आबा तलह तुहु ला बीड़ी सुलगाय,

 जबरा मारिस रोबय ना  देय,
कहाबत नहीं सरीहन कईदेब ,

जेसे कहबा ओहु के पिछवाड़े,
दुइ डंडा हम धई देब ...