"स्वाविवेक ही बुद्धिमत्ता का प्रथम सोपान है"
स्वानुभूति एवम स्वप्रेरित ज्ञान ही जीवन में सार्थकता और सम्पूर्णता लाते है है .जिस व्यक्ति का जीवन जानकारी एवम दुसरो के दिए हुए उधार के विचारो से लदा नहीं है .
वही व्यक्ति आत्म ज्ञान के करीब होता है . आत्म ज्ञान होने के तदुपरान्त व्यक्ति प्रकृति का सूछ्म चित्रण करने लगता है .विचारो में गहराई एवम स्वयं और प्रकृति के मध्य सम्बन्ध स्थापित करने की चेष्टा करता है क्योकि प्रकृति शक्तियों से निर्मित जीव देह और प्रकृति के मध्य आत्मा एक कड़ी का काम करती है.फलस्वरूप तीनो ही शक्तियों के आपसी सामंजश्या की स्थिति में ही जीवन में समरसता का भाव आता है .निर्वध्य ऊर्जा का प्रवाह होने लगता है .
लेकिन यह बात कहना जितना आसान है करना उतना ही दुष्कर है.हर जीव देह के लिए कदाचित संभव नहीं है ,वजह प्रकृति शक्तियों को समझने के लिए विचारो में स्थिरता(सुख दुःख से परे विन्दु स्वरुप शून्य भाव , वैचारिक अवस्था ) और नि:छलता का भाव होना अत्यंत अवश्यक है.
सांसारिक तृष्णा रूपी जीवन में लगा मन आत्म ज्ञान कभी प्राप्त नहीं कर सकता.जो व्यक्ति करता होते हुए भी जो स्वयं को करता नहीं मानता,कर्म फल के बंधन से मुक्त अपना समर्पण भाव प्रकृति में ,सन्निहित मानता है वही व्यक्ति आत्म ज्ञान प्राप्त कर सकता है क्योकि बिना प्रकृति को समझे ,अंतरात्मा के अस्तित्व को नहीं समझा जा सकता है .
जिसे ईश्वर को जानने की चेष्टा भी कह सकते है ;अंतरात्मा ,जीव देह और प्रकृति तीनो ही एक सायकल की तरह काम करते है, तथा तीनो ही एक दूसरे के बिना अपूर्ण है .
इन तीनो ही तत्वज्ञ के संतुलन के उपरांत ही यथार्थ ज्ञान ,विजिडम प्राप्त किया जा सकता है,विजिडम ही ज्ञान की श्रेष्ठम अवस्था है .सुख ,दुःख ,लोभ और मोह -माया जैसे सांसारिक विषय वास्तु से परे मन में स्थिरता,शून्य,चैतन्य भाव प्रदान करता है.
विजिडम के तदुपरांत सभी ज्ञानेन्द्रिय एक साथ संचालित होने लगती है .स्वयं ज्ञान स्फुटित होने लगता है,अगोचर , गोचर सदृश्य मालूम होता है .जिससे वैचारिक दृश्टव्य अवलोकन भी कह सकते है .जोकी सांसारिक ज्ञान और विज्ञान का कारण बनता है .
दुनिया में स्थापित हर तरह का ज्ञान,विज्ञानं और अविष्कार विजिडम के तदुपरान्त ही प्राप्त किये गए है .
जितने भी धर्म और धर्म शास्त्र की रचना,अविष्कार हुए ,विजडम प्राप्त व्यक्तियों द्वारा ही किया गया.है अपनी सूछ्म परिकल्पनाओं द्वारा अपनी अनुभूतियों का सांसारिक चित्रण कर ज्ञान और विज्ञान में परिणित किया .
भावार्थ ...
कुछ भी न जानो ...न जानते हुए भी सब कुछ जानो ....जो भी कर्म करो सम्पूर्ण समर्पण के भाव से करो ...कुछ लेने के भाव से नहीं ...न चाहते हुए भी सब कुछ मिल जायेगा ...ये भाव रखना भी इंसान को सांसारिकता की तरफ खींचता है .जोकि नकारात्मक भाव है .
नोट ...आलेख मेरे स्वयं के आत्म ज्ञान और अनुभव पर आधारित विचार है ...इससे इतर भी आप का विचार हो सकता है...हर व्यक्ति का दृश्टिकोण एक जैसा नहीं होता और न ही होना चाहिए ,"स्वाविवेक ही बुद्धिमत्ता का प्रथम सोपान है"...इसी तरह और भी कई सारे आलेख विज्ञानं और ऐतिहासिक पृस्ठभूमि पर आधारित है जो आपको एक बहुत ही अलग तरह का अनुभव देगा ..ebook आलेख संग्रह ...
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लेखक
मेरी सूछ्म अनुभूति
सब्दारण्य