शनिवार, 23 सितंबर 2017

Mystery of "Arya" beyond historical facts and imagination(in Hindi)

यह आर्टिकल ऋग्वेद ,कुरान और भी कई धर्म ग्रंथो के अध्यन और स्वयं  की परिकल्पना पर आधारित है .क्यों की हम जिस विषय के बारे में ,ऐतिहासिक  तथ्यों  की बात करने जा रहे ,वहाँ से  प्राप्त साक्ष्यो में मत    भेद  और ज्यादातर इतिहासकारो  की  अवधारणा  पर आधारित है .
दुनिया  का हर इंसान अपने अतीत को अपने वजूद को अपने पूर्वजो के इतिहास को जानना चाहता है : उसपर गर्व करना चाहता है और यदि इतिहास भी उतना ही गौरवपूर्ण  समृद्ध हो  तो इससे अच्छी बात भला  क्या हो सकती है .प्राचीनकालीन इतिहास के पन्नो में सब से गौरवशाली  प्राचीन और प्रामाणिक  इतिहास  है ;ऋग्वैदिक सभ्यता .हमारे मन में कई तरह   के सवाल होते है जैसे  आर्य कौन है?कहा से अये?आर्य सभ्यता क्या है?सनातन धर्म क्या है ?या कहे ऋग्वेदिक सभ्यता उनकी धार्मिक,सामाजिक,आर्थिक  स्थिति आदि या और भी  कई तरह के सवाल जैसे   बांकी  धर्मो की धार्मिक विचारधारा  सनातन धर्म  से किस तरह से सम्बंधित है .
 आर्य सभ्यता के साक्ष्य आज से  ५ हजार साल पुराने या कहें  उससे भी  पहले के हैं  .आर्य  के सम्बन्ध में जानकारी का प्रमुख श्रोत ऋगवेद है जो विश्व का सबसे प्राचीन और प्रामाणिक ग्रन्थ है और इसी ग्रन्थ के अनुसार  आर्य का मतलब होता है -सत्य ,अहिंसा ,पवित्रता ,आदि गुणों को धारण करने वाला  आर्य होता है जो इन चीजों को नहीं मानते थे उन्हें "अनार्य' या दस्यु कहा जाता था.
ऋगवेद में इंद्र को सब से प्रतापी देवता के तौर पर बताया  गया है जो जल के देवता मने जाते थे.दूसरे सबसे महत्व पूर्ण देवता  अग्नि और तीसरे  महत्वपूर्ण देवता वरुण थे.आर्य मुख्यतःप्रकृति  की पूजा स्तुति पाठ,यज्ञ  और आहुति के माध्यम से करते थे. ऋगवेद में १०२८ पद्य है जो मंत्र  और  स्लोक  पर ही आधारित है .
संभव है की  आर्यो के प्रकृति पूजा  के पीछे का धार्मिक आधार  बारिश  और पानी की  वजह से तरह- तरह की फसल वनस्पतियो का  जमींन पर  उगना इसके अलावा आदिम काल से ही मानव जीवन में आग का विशेष महत्व था  जैसे  आग से रोशनी पैदा करना खाना पकाना आदि.
इन सब कारणो से उनके दिमाग में यह यह विचार होना  स्वभाविक  था की कोई न कोई प्राकृतिक सक्ति मौजूद  है जो इस धरती को  नियंत्रित करती है .
यह भी संभव है की  इसी धार्मिक मान्यता के आधार पर त्रिदेव यानि ब्रह्मा ,विष्णु और महेश की परिकल्पना की गयी होगी क्यों की बांकी धर्म ग्रन्थ इसके  बाद में लिखे  गए  हैऔर उस समय वैदिक काल में मूर्ति पूजा का प्रचलन नहीं था .मूर्ति पूजा का प्रचलन उत्तर वैदिक काल और गुप्त काल से माना जाता है .
अब बात करते है आर्यो की आर्थिक स्थिति के सन्दर्भ में ऋगवेदिक सभ्यता तत्कालीन उस समय की मौजूदा अन्य सभ्यता से बेहतर थी ऋग्वैदिक  सभ्यता कृषि प्रधान थी गेंहू और जौ  की खेती आर्य उस समय प्रमुखता से करते इसके अतिरिक्त ,मटर,सरसो  और तिल खेती करते थे . सर्वप्रथम  कपास की खेती भी आर्यो ने ही प्रारम्भ की थी .
अब आर्यावर्त के बारे में जानते  आर्यावर्त  मतलब होता है "श्रेष्ठ जनो का निवास  स्थान"
आर्यो  के निवास स्थान  को ले कर काफी विरोधाभास है कुछ इतिहास करो का कहना है आर्य ईरान से अये कुछ कहते है जर्मनी से अये कुछ  कहते है ध्रुवीय प्रदेश से आये या मध्य एशिया से सब के आपने -अपनेअलग  मत है.लेकिन आर्य कहा से अये इसका कोई सटीक और स्पस्ट प्रमाण नहीं है .
आर्य  यही  के  मूल  निवासी  है या कही बाहर से आये इस बात की सच्चाई  को  तथ्यों   के  माध्यम  से  परखने  की  कोसिस  करते  है क्योंकी   उस  समय  की    तत्कालीन  परिस्थियो और  मिले  प्रमाणों  के साक्ष्य के आधार  पर देखा जाये तो सम्पूर्ण दक्षिण एशिया का भूभाग आर्यवर्त के अंतरगत आता था  जिसे भारतीय उपमहाद्वीप के नाम से भी जाना जाता था .
उस समय आर्यावर्त मध्य  एशिया के सम्पूर्ण भूभाग में फैला  था और उसकी सीमाएं समय -समय पर बदलती रही .
आर्यवर्त पहले काबुल अफगानिस्तान के कुम्भा नदी से लेकर उत्तर भारत में गंगा नदी तक तथा कश्मीर की वादियों से लेकर नर्मदा नदी के उसपर तक या कहे मध्यभारत तक दक्षिण भारत उस समय जलमग्न था. वर्मा मामयार ,तिब्बत आदि सभी आर्यवर्त का  हिस्सा  थे .
 १ हजार से  भी  ज्यादा  साक्ष्य आर्य के भारतीय  उपमहाद्वीप  से प्रप्त हुए है और कही से नहीं .
ऋगवेद में  सिंधु और सरस्वती नदी का विशेष तौर पर जिक्र है इन नदियों के किनारे स्थित  मोहनजोदाड़ो और  हड़प्पा वैदिक काल की प्रंमुख  विकशित सभ्यता  में  से  एक  थी  .पाकिस्तान के लरकाना नामक जिले में मोहनजोदाड़ो  के  खंडहर आज भी  मौजूद है जिसे "मृतकों का टीला" कहा जाता है सायद वो सभ्यता किसी प्रकृतिक आपदा  की वजह से नस्ट  हुई लेकिन  इतिहास  से  कोई स्पस्ट प्रमाण नहीं मिलता है . इस सभ्यता के नस्ट होने की कई  इतिहासकारो  के  अपने  अलग  -अलग  मत  है .हालिया एक फिल्म भी मोहनजोदाड़ो पर बानी थी जिसमे इस सभ्यता के नस्ट होने की वजह बाढ़ दिखाया गया है जो स्पष्तः सत्य नहीं है.
 अब  आते है  हड़प्पा सभ्यता की  तरफ  हड़प्पा  पाकिस्तान के मांटगोमरी  जिले में स्थित है जंहा  से  प्रचुर  मात्रा में आर्य   सभ्यता  के  प्रमाण मिले है जैसे ,गेंहू,जौ,पीतल के बर्तन ,स्वस्तिक के निसान आदि. इसी तरह और भी कई  प्रमाण मिले जो  अन्य  जगहों से  भी प्राप्त हुए है जो जादातर उत्तर भारत में स्थित है जैसे  लोथल  गुजरात के अहमदाबाद  में भोगवा  नदी के किनारे  ,काली बंगा जो  राजस्थान में है ,आलमगीरपुर  जो उत्तर प्रदेश में है ,सुरकोतड़ा जो  गुजरात  के कक्ष जिले में है ,रोपड़ जो  पंजाब में है ,वनमाली  हरियाणा जैसी कई कई   जगहो   से मिले साक्ष्य आर्यो के  भारतीय  उपमहाद्वीप  से   होने  का  प्रमाण   देते है .
अब बात आती फिर ये भ्रम कैसा ,भ्रम क्यों फैलाया गया की  आर्य  बहार से आये इसकी वजह है भारत में ब्रिटिश शासन काल के दौरान इतिहासकारो  ने भारतीयों को भ्रमित करने और देश भक्ति की भावना को कम करने के लिए 'इंडो-आर्यन माइग्रेशन थ्योरी" दी .जिसका समर्थन वामपंथी विचार धारा वाले लोग तथा कुछ निम्न  वर्गीय समुदाय  के लोगो ने इस सिद्धांत को  बल  दिया  क्योंकी  इन लोगो का मानना  था  और  आज  भी यही मानना है की  द्रविड़ और आदिवासी  वर्ग  के  लोग  ही यहाँ के मूल निवासी है .
अब जानते  है  'इंडो-आर्यन माइग्रेशन थ्योरी" में  कितनी सच्चाई है  वैज्ञानिको ने एक  शोध के   माध्यम से बताया की  प्राचीन उत्तर भारतीय  लोगो में और यूरेसियाई  लोगो के जींस में समानता पायी  गई .यूरेसियाई का अर्थ  होता  है  यूरोप  और एशिया के निवासी .
इनके  जींस में तो समानता है लेकिन इस बात के कोई स्पस्ट प्रमाण नहीं है की आर्य पहले यूरोप  गए या फिर यूरोप  के लोग भारत पहले  आये.
लेकिन तथ्यों से तो यही मालूम होता  आर्य उस समय एक विकशित सभ्यता थी .भौगोलिक परिवर्तन और   व्यपार  के  चलते  आर्य ही पहले यूरोप  गए होंगे .
अब आते है आर्य और द्रविड़ पर द्रविड़ यानि दक्षिण भारतीय के मूल निवासी  इतिहासकार तो  इन्हे  आर्यो से अलग  बताया  है लेकिन अमेरिका और भारतीय वैज्ञानिको ने शोध में आर्य और द्रविड़ के जींस में समानता पायी  दोनों ही एक ही पूर्वजो की संताने है ऐसा  इनका मानना है और  इस  दावे  के पीछे वैज्ञानिको  का एक  ठोस  कारण भी है .वैज्ञानिको ने यह  शोध कई उत्तर और दक्षिण भारतीय  राज्यों  में विभिन्न जाती समुदायों ,ऊँची और नीची जाती में किया  और सभी में साझे अनुवांशिक सम्बन्ध पाए गए यानि  एक साथ कई  समुदायों  के  बीच  सम्बन्ध  'इंडो-आर्यन माइग्रेशन थ्योरी" को  पूरी  तरह  से  नकारती  है .
लेकिल  अभी  जो  इतिहास  पढ़ाया  जा  रहा  है  'इंडो-आर्यन माइग्रेशन थ्योरी"पर  ही  आधारित  है लेकिन  भविस्य   में  इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता की ये  शोध  एक  नया  इतिहास  लिखने  का  कारण  बने  .
अब  आते  है हिन्दू  सब्द   की   ओरे  जिसको  लेकर  कई  तरह की  भ्रांतिया  और मिथक है  .इतिहासकारो का कहना है ये शब्द अरबी और ईरानियों द्वारा दिया गया  .
दूसरी तरफ भाषाविद्वानों का कहना है की  सिंधु नदी के इस पार  रहने वाले लोगो को ईरानी लोग हिन्दू शब्द से सम्बोधित करते थे क्योंकी  "सा" का उचारण ईरानी भासा में 'ह" ध्वनि में बदल जाता है .
 तथ्यों के माध्यम से इस  बात  में  कितनी   सच्चाई  है जानते है.
पारसी ईरान के मूल निवासी थे और पारसी धर्म की स्थापना आर्य की एक सखा से ७०० एसवी पूर्व अत्रि कुल के लोगो से हुई थी बाद  में पारसी धर्म को संगठित रूप जरथ्रुस्त ने दिया जिन्हे पारसी धर्म का संस्थापक माना जाता है और  पारसी  लोग  इन्हे  अपना  भगवान्  मानते  है .यदि पर्सिओ को 'सा" ध्वनि के उच्चारण में समस्या होती तो संस्कृत  को "हंसकृत" कहते .वर्तमान पाकिस्तान के सिंधप्रान्त को "हिन्द "प्रान्त कहते .सिंधी समुदाय के लोगो को भी "हिंदी" या "हिन्दू" कहते ."सिंधु "नदी को हिन्दू नदी कहते लेकिन ऐसा नहीं था इनको इनके मूल नाम से ही जाना जाता था .
पर्सिओ की किताबो के पूर्व भी सनातन धर्म के धर्म ग्रंथो में हिन्दू सब्द मिलत है ,जैसे ऋग्वेद में सप्तसिंधु का उल्लेख मिलता है ,सप्तसिंधु का अर्थ होता है वह  भूमि जंहा आर्य रहते है .
कुछ विद्यावानो का मानना  है की  हिमालय से हिन्दू शब्द उसकी भौगोली पहचान की बजह से सामने आया हिमालय का पहला शब्द "ह" और उस समय सनातन धर्म में  ज्योतिष  शास्त्र का विशेष महत्व  था जिससे चन्द्रमा का पर्यवाची  शब्द "इन्दु " को मिला कर "हिन्दू" शब्द पड़ा .
  इस  तथ्य  के  पीछे  एक   ठोस  कारण  है उस समय सम्पूर्ण आर्यवर्त में केवल  वैदिक धर्म को मानाने  वाले लोग थे और कोई धर्म नहीं था इसलिए हिन्दू सब्द सम्पूर्ण आर्यवर्त के लोगो के लिए प्रयोग   में लाया गया .इसका अर्थ इतिहासकारो  के इस दावे में भी कोई सच्चाई  नहीं  .
 अब बात करते है सनातन धर्म की-सनातन धर्म प्रकृत  की पूजा पर  आधारित  धर्म है  इस  धार्मिक  फिलॉसफी  को मानने  वाले  लोग  मूर्ति  पूजा  नहीं  करते जैसे  आर्य  समाज  के  लोग .  हिन्दू धर्म  जो सनातन धर्म के ससिद्धांतो के साथ -साथ मूर्ति पूजा पर भी यकीं  रखते   है जिसके  अंतर्गत  सभी वेद, पुराण  और उपनिषद और बांकी धर्म ग्रन्थ सम्लित है .
सनातन  एक   धर्म है जो नियमो  और  सिध्यांतो  पर   आधारित है जबकि  हिन्दू एक सब्द है जो बाद में संस्कृति का रूप लेलिया .कालांतर में गुप्त काल से लेकर अब तक बिभिन्न संस्कृति ,धर्म और सभ्यता को हिंदी अपने  आप  में  समाहित  कर  सम्पूर्ण  भारतीय  सभ्यता  का  प्रतिनिधित्व  करती  है  और  ये  सब्द  आज  सम्पूर्ण  समाज  का  परिचायक  है .
इसलिए  हिन्दू  को एक धर्म के नजरिये  से देखना  और विरोध करना  सर्वथा  अनुचित  है हिन्दू सभ्यता में ,मूर्तिपूजा करनेवाले ,बौद्ध,जैन ,इस्लाम, सिक्ख ,परषि  और यहूदी  सभी समाहित है ,यदि कोई दूसरे धर्म को मानने वाला व्यक्ति सनातन धर्म का विरोध करता है तो वह अपने धर्म की मूल भावना से भटक जायेंगे और वो भला कैसे कुछ तथ्यों के माध्यम से समझते है
सनातन का अर्थ है जिसका न आदि है न अंत इस तत्व को ही सनातन कहा गया है .यह सास्वत है .सदा के लिए सत्य है .जिन बातो का सास्वत महत्व है वही सनातन है जैसे सत्य सनातन है.
ईस्वर सनातन है,आत्मा सनातन है,मोक्ष सनातन है और इस सत्य के मार्ग को बताने  वाला  सनातन धर्म भी सत्य है .
सनातन धर्म ईस्वर ,आत्मा,और,मोक्ष को तत्व  से यानि अंतरात्मा,इंद्रियों और ध्यान से जानने का मार्ग बताता  है .
मोक्ष की  अवधारणा   भी सनातन धर्म की देंन है जो  बौद्ध  और  जैन  धर्म  के  प्रमुख  सिद्धांतो  में  से  एक  है .  मोक्ष का  अर्थ  होता  है अपनी  अंतरात्मा  से   ईस्वर को  जानना  जिसके  बाद  इंसान  जन्म  और  कर्म  के  बंधन  से  मुक्त  हो  जाता  है .
मोक्ष एकनिष्ठा ,ईस्वर के प्रति समर्पण  का भाव ,ध्यान,मौन,तप, और यम नियम के अभ्यास और जागरण  द्वारा  ही पाया  जा  सकता  है इसके अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग नहीं है .
अब  इस्लाम  और  ऋगवेद  में  क्या  सम्बन्ध  है  जानते  है -
ऋग्वेद में सम्पूर्ण विश्वा को आर्य बनाने का सन्देश दिया गया है और कुरान में भी कुछ ऐसा ही कहा गया है जैसे   पुरे  मानव  समाज  का  इस्लामीकरण  करना  .
ऋग्वेद में आर्य को ईस्वर पुत्र से सम्बोधित किया गया है ठीक  उसी प्रकार  इस्लाम के प्रवर्तक पैगम्बर मोहम्मद साहब ने अपने  आप  को  अल्लाह का सच्चा मसीहा कहा जिनका  काम  भटके  हुऐ नीच  और  अधम लोग जो गलत काम करते है उनको  सही  रास्ता  दिखना  है .कुरान  के  अनुसार  ईसाई  धर्म  के  प्रवर्तक  ईसामसीह  भी  अल्लाह  के  पैगम्बर  है  जिन्हो  ने  अल्लाह  की  पेशकस  को  ठुकरा  दिया  और  अल्लाह  की  सत्ता  पर  यकीं  नहीं  किया .इस  तथ्य  के  आधार  पर  कहा  जा  सकता  है  की  इस्लाम  को  मानने वाले  लोग  मुसलमान  और  इस्लाम  को  ना मानने वाले  लोग  "काफिर" हुऐ ,जिस प्रकार सनातन धर्म के सिद्धांतो पर चलने वाले लोग आर्य और न चलने वाले लोग अनार्य हुए .
ऋग्वेद के अनुसार जो लोग परमतत्व और परमेस्वर को नहीं मानते वे लोग असत्य में गिरते है और मृत्युलोक के अंधकार में पड़ते है.
कुछ ऐसा ही कुरान में भी है जो अल्लाह पर यकीं नहीं करते उसकी सत्ता को नहीं मानते वो लोग जहन्नुम  को प्राप्त होते है और कई तरह की यातनाये  पाते  है.
ऋग्वेद के अनुसार सम्पूर्ण जगत की उत्त्पति परब्रह्म  यानि एक इस्वर से हुई पूर्ण ब्रह्म से सम्पूर्ण जगत की उत्पत्ति होने पर भी ब्रह्म की पूर्णता में कोई कमी नहीं आती अर्थात ईस्वर शेष रूप  में भी पूर्ण है .
कुरान में भी यही बात कहता है सम्पूर्ण जगत की उत्पत्ति अल्लाह से हुई,वह अपने आप में पूर्ण और समर्थवान और दोष से रहित है.
ऋग्वेद में जाती और संप्रदाय  के आधार पर तो कोई भेद नहीं है लेकिन  गुण ,कर्म ,और स्वाभाव आदि से इंसानो को दो भागो में बांटागया  है -पहला "आर्य"दूसरा "अनार्य"  या दस्सू कहा गया है .
आर्य  वो लोग होते थे जो  परिश्रम से अपना  कल्याण करते है दूसरी तरफ अनार्य या कहे  दस्सू  जो भ्रष्ट  स्वार्थी और दुसरो को हानि पहुंचने वाले होते है इसीलिए आर्य यानि श्रेस्ट मनुस्य ही भूमि और पदार्थ  पाने  के काबिल  है इसका मतलब धरती पर मौजूद सभी प्रकार की  सुख -सुविधाओं के उत्तराधिकारी केवल आर्य है  .कुरान के अनुसार  जो अल्लाह को मानते है यानि इस्लाम के नियमो का पालन करते है वही लोग अल्लाह के करीब और धरती पर मौजूद समस्त पदार्थ,सुख - सुविधाओं के भोग के अधिकारी  है .
सनातन धर्म और उसकी धार्मिक अवधारणा के आधार पर ये बात  साफ   है   की  बांकी धर्मो  के धार्मिक  सिद्धांत और विचारधारा   इसी धार्मिक  के इर्द- गिर्द घूमती है  .
इतिहास और उस समय की  मौजूदा परिस्थि . धर्म ग्रंथो के आधार पर  एक  और  निष्कर्ष  निकल   कर  सामने  आता है   की  धर्म को  इंसानो के बीच प्यार , सहिष्णुता  भाईचारा बढ़ने और  उनको संगठित कर  फिर उनपर धर्म को शासन  का आधार बनाया गया.
आर्य ऋषि और विद्वानों  द्वारा सबसे पहले धर्म की परिकल्पना की गई फिर इसे शासन का आधार बनाया इसके सुखद परिणामो से प्रभावित होकर  बाकि धर्म के विद्वानों  ने अपने समर्थ के अनुसार धर्म को जानने की कोसिस  की होगी .
महान दार्शनिक नास्त्रोदय ने धर्म के सन्दर्भ  में एक बात कही थी धर्म अफीम की तरह होता है लोगो को धीरे  -धीरे  पिलाओ  और उनपे राज्य करो  और यही सब  चीजे हम वर्तमान में परिलक्छित होते देख रहे है .

शुक्रवार, 22 सितंबर 2017

क्या मान सिंह और मृगनयनी की प्रेम कहनी पर आधारित है बाहुबली -२ की कहानी ?

        क्या मान सिंह और मृगनैनी की प्रेम कहनी पर आधारित है बाहुबली -२ की कहानी ?

बाहुबली -२ मूवी कहानी की सच्चाई जो सायद इस मूवी के राइटर के आलावा किसी को भी ना पता हो .
इस लेख  के माध्यम से सिलसिलेवार  दोनों कहानियो  का तुलनात्मक ढंग से बताने  की कोसिस  है की कैसे मaन सिंह और ममृगनैनी   की प्रेम कहनी को तोड़- मरोड़ कर बाहुबली -२ की कहनी को लिखा गया है .
इतिहास के पन्नो में कई प्रेम कहानिया दर्ज है जैसे   हीर-राँझा से लेकर लैला-मजनू,साहजंहा-मुमताज ,से लेकर जोधा -अकबर तक लेकिन आपने सायद ही ग्वालियर के राजा मानसिंह और मृगनयनी की प्रेम कहानी सुनी होगी जो उतनी ही दिलचस्प और रोमांचक  है.ग्वालियर वैसे  तो  अपने  ऐतिहासिक  इमारतों  के लिए  प्रसिद्ध  है जिसे "किलो के रत्न "की संज्ञा  दी जाती   है .
लेकिन हम यंहा पर ऐतिहासिक  तथ्यों  पर बात नहीं करेंगे अपितु मानसिंह -मृगनयनी की प्रेम कहानी के साथ -साथ बाहुबली-२ मूवी की कहानी कैसे इनकी प्रेम कहानी से प्रेरित है या कहे बाहुबली -२  कहानी मानसिंह और मृगनयनी की प्रेम कहनी पर आधारित है दोनो ही कहानी को  हम तुलना करते आगे बढ़ते है:
मानसिंह का राज्याभिषेक १४८६ में हुआ और १५१८ तक ग्वालियर के राजा रहे उस दौरन  ग्वालियर के समीपवर्ती राज्य मालवा जिसे अब इंदौर रीजन के नाम से जाना जाता है .वहाँ का शासक गयासुद्दीन खिलजी  जो अल्लाउदीन  खिलजी का वंसज था तब मालवा  की राजधानी  महेश्वर  थी जिसे प्राचीन काल में महिस्मती के नाम से जाना जाता था . बाद में मालवा की रानी  अहिल्या बाई होल्कर द्वारा 1836 में राजधानी बदल कर इंदौर कर दिया गया था.
गयासुद्दीन  ने ग्वालियर पर कई बार आक्रमण किया लेकिन मान  सिंह के राजा रहते कभी सफल न हो सका  .
मान  सिंह और मृगनयनी के विवाह से  पूर्व मान  सिंह की 8 रनिया  थी .फिर  ऐसा   क्या   हुआ की मान सिंह का दिल मृगनयनी पर आगया और जिंदगी  भर  उसी  के हो  कर रह  गए .
मृगनयनी ग्वालियर के राइ नमक गॉव में एक साधारण गुजर जाती में जन्मी  जिसके बचपन का नाम निन्नी था .
निन्नी गॉव  में न सिर्फ अनुपम सौंदर्य और  खूबसूरती  की मिसाल थी अपितु  तलवार,भला और तीर चलने में भी निपुण  एक अनाथ लड़की  थी .उसके माता पिता बचपन में ही गयासुद्दीन  खिलजी के आक्रमण में मरे गए थे.परिवार के नाते अब सिर्फ एक बड़ा भाई बचा था और दोनों ही युद्ध कला में माहिर थे  .
पुरे छेत्र में निन्नी के बहदुरी के सामने कोई न टिक पता जब भी गॉव  में कोई  बाहरी आक्रमण होता उसकी सुरक्षा की जिम्मेदाई निन्नी और उसके भाई पर रहती जिसका निर्वहन ये दोनों बखूबी करते इस कारण पुरे  छेत्र में  दोनों को  काफी मान -सम्मान और प्रतिस्ठा मिलती .
इस तरह  निन्नी के खूबसूरती और बहादुरी के चर्चे  गयासुद्दीन   के कानो तक पहुँची   और उसकी सबसे बड़ी कमजोरी औरत और सराब थी.उसने निन्नी  को अपनी रानी बनाने का फैसला किया और  अपने सैनिको  को निन्नी  को लाने का हुक्म दिया.
अब बहुबली -२ मूवी में चलते है-इस मूवी में भी देवसेना के भाई को एक छोटे से  राज्य  का राजा बताया गया है और इनके राज्य में बाहरी आक्रमण  होते रहते है . देवसेना  को अपनी  सैन्य टुकड़ी के साथ उनका मुकाबल करते हुए दिखया गया है .
बाहुबली-2 में  भी   भल्लादेव का करैक्टर भी इसी से प्रेरित है .भल्ला देव को देवसेना की खूबसूरती के चर्चे उसके गुप्तचरों द्वारा मिलती है .भल्लादेव  उसकी तस्वीर को   देख कर  मोहित  हो  जाता  है  और  देवसेना को लाने का प्रयाश बाहुबली के माध्यम से करता है क्योंकी यंहा पर भल्ला देव और बाहुबली दोनों भाई है वंहा पर मानसिंह और गयासुद्दीन  दो दुसमन राज्य के राजा थे इसलिए कहनी में ट्विस्ट होना लाजमी  है .मूवी  में बाहुबली और देवसेना का  मिलान  फिल्म को मनोरंजक बनाने के लिए एक युद्ध के द्वौरान दिखाया  गया  है   जो फिल्म का पहला vfx technique द्वारा   फिल्माया  गया  एक  खूबसूरत  दृश्य  है    जिसका  विसुअल  इफ़ेक्ट  बहुत  ही अच्छा  है  सायद पूरी  फिल्म   का ही सबसे बेहतर सीन  है क्योकि  बाद के जो vfx द्वारा  फिल्माए दृश्य है वो किसी कार्टून मूवी की तरह एनिमेटेड  विसुअल इफेक्ट्स लगते है.
अब मान सिंह  - मृगनयनी की कहानी में आगे बढ़ते  है .मृगनयनी आखेट करने जाती है और उसकी मुठभेड़ गयासुद्दीन के सैनिको से होती है .
मृगनयनी अकेले ही अपने तीर और भाले से उन सैनिको को ढेर कर देती .
इस तरह मृगनयनी के बहादुरी  के चर्चे पुरे राज्य में फ़ैल जाते है और ये बात मान सिंह के कानो तक भी पहुँच गई .मानसिंह मृगनयनी से मिलने के लिए बड़े लालायित हुए .
अगले ही दिन राज्य भ्रमण के  बहाने राइ गॉव  जा पहुंचे ,जंहा पर  औरते  और मर्द  अपने राजा का  स्वागत फूल और मालो से किया और उस क़तर में सब से पहले स्वागत मृगनयनी द्वारा किया गया. मृगनयनी ने  राजा के माथे में कुमकुम और हल्दी से तिलक किया ,पुष्प पगड़ी की तरफ फेका उन्ही पुष्पों में से एक  पुष्प राजा ने जमीन  से उठा  कर अपनी पगड़ी में लगा  लिया . इस तरह से  मान  सिंह अपना दिल मृगनयनी को दे बैठे और ये उनकी तरफ से मौन सुकृति थी .इस दृश्य को देखकर  गॉव  के लोग  मुस्कुराने लगे उनको भी समझ में  आगया  की उनकी निन्नी जल्द ही अब ग्वालियर की महरानी बनने वाली है .
मान सिंह ने रात का पड़ाव राई गॉव  में ही डाला पूरी  रात  संगीत  का कार्यक्रम  चलता  रहा .अगली  सुबह मान सिंह ने मृगनयनी की वीरता देखने के लिए आखेट की योजना बनायीं .मान सिंह मचान  पे   बैठ कर  आखेट के लिए निकले उनके साथ मृगनयनी भी अपनी तलवार  और तीर  कमान  के साथ चली उनके पीछे राजा की सेना ढोल नागडा  बजाते हुए साथ चल रही थी जिससे खेत  में जो  भी जंगली  सूअर और भैंसे  छुपे  थे  बहार  निकल आएं और उनका  सिकार आसानी से  किया जा सके उधर मृगनयनी भी तैयार थी अपने तीर कमान के साथ .ढोल -नगाड़े की आवाज से जैसे ही जंगली सूअर इधर -उधर भागने लगे ,मृगनयनी बिना  देर किये  एक -एक कर सभी जंगली सूअर  को ढेर करती जा रही थी मगर एक विशाल  सरीर वाला  जगली भैंसा मृगनयनी के तीर से  घायल होकर ,जोर -जोर से चिंघाड़ते हुए मृगनयनी की तरफ लपका ,ये देख मान सिंह अपनी बन्दुक से  गोली  चलने  ही वाले थे की क्या देखते है ,मृगनयनी भैंसे की सींग मरोड़ते हुए बिजली की गति से  अपना भला भैंसे के माथे पर भोप देती है और भैंसा वही  पर ढेर हो जाता  है .
अब बाहुबली-2 से तुलना करते  है -इस फिल्म की कहानी भी कुछ इसी   तरह आगे बढ़ती है देवसेना बाहुबली के साथ आखेट पर जाती है ,और खेत में कई जंगली सूअर  का शिकार अपने तीर से करती है.
लेकिन  फिल्म  को  मनोरंजक   बनने  के लिए देवसेना और बाहुबली का मिलान एक युद्ध के दौरान दिखाया गया है ,जंहा पर देवसेना एक साथ कई दुश्मनो को अपने तलवार से मरती है .सायद यही से वो बाहुबली और देवसेना के पहली  बार  मिलने  का कांसेप्ट बाहुबली -२ के राइटर  ने उठाया है . बाहुबली मृगनयनी की वीरता से प्रभावित  हो कर देवसेना के साथ उसके राज्य  में चला  जाता है .यंहा पर एक गौर  करने वाली बात है ,मूवी का ये दृश्य  वहाँ से उठाया  गया है जंहा  पर मृगनयनी यासुद्दीन की सेना से मुकाबला करती है लेकिन वंहा  पर मान सिंह से मुलाकात नहीं होती राइटर ने स्टोरी के पार्ट को आगे पीछे कर दिया .
फिर मूवी में आगे रात में एक गीत  सोजा-सोजा  नाम का बजता है , (मानसिंघ   और मृगनयनी  की कहानी में भी संगीत का कार्यक्रम  चलता है) फिर vfx तकनीक द्वारा एक नाटकीय ढंग से  युद्ध  का दृश्य  फिल्माया   जाता है और अगली सुबह बाहुबली देवसेना को लेकर महिस्मती के लिए रवाना हो जाता है .
अब आते है मान सिंह और मृगनयनी  की प्रेम कहानी में -आखेट के बाद  मानसिंह मृगनयनी के भाई से मृगनयनी का  हाँथ मांगते है और मृगनयनी के   भाई ने इस प्रस्ताव  को  सहर्ष स्वीकार कर अपनी  हैसियत के हिसाब से धूम- धाम से  विवाह   कर देता है उसके बाद मानसिंह मृगनयनी  को लेकर ग्वालियर आजाते है ,लेकिन मृगनयनी को मान सिंह के परिवारवालो और उनकी बीबियो  द्वारा अस्वीकार कर दिया जाता है ,जिससे आहत होकर मान सिंह ने मृगनयनी के लिए एक नए महल का निर्माण करवाते है जिसे  आज गुजरी महल के नाम से जाना जाता है .
मृगनयनी सुंदरता और युद्ध कला में निपुण तो थी ही उसके साथ -साथ  चित्रकला और संगीत में भी  रूचि लेने लगी जो बाद में  मान सिंह के लिए एक प्रेरणा का श्रोत बानी  मृगनयनी   हमेसा  मान सिंह को प्रजा  की भलाई के लिए प्रेरित किया  करती थी.
एक और दिलचस्प बात प्रसिद्ध संगीतकार  बैजू बाबरा ,मृगनयनी के ही संरक्षण में राग -रागनी की रचना की थी .इसी तरह कुछ साल बीतने के बाद मृगनयनी दो बेटो  को जन्म  देती है जिनको छत्रिया होने का दर्जा नहीं मिला और मृगनयनी को ग्वालियर से निर्वासित कर दिया जाता है .
मृगनैनी  अपने दोनों बेटो को साथ लेकर जंगल में चली गई और एक नए गोत्र को अपनाया जिससे आज तोमर समुदाय के नाम से जाना जाता है.
अब आते  है बाहुबली -२ की तरफ -बाहुबली और  देवसेना को भी महल से  उनके परिवार द्वारा निष्कासित कर दिया जाता है और वो दोनों किसी और महल में रहने लगते है.उसके बाद फिल्म पहले पार्ट के संकल्पना  के आधार पर चलती है जैसे - बाहुबली को मार  दिया जाता है फिर उसके बेटे की एंट्री होती है . vfx तकनिकी  द्वारा फिल्माए हैवी दृश्य जिससे फिल्म  को भव्य  रूप देकर फिल्म  का  समापन कर दिया जाता  है .यानि अब तीसरा पार्ट नहीं बनेगी क्युकी मानसिंह और मृगनयनी की प्रेम कहानी में आगे कोई रोचकता  नहीं .














रविवार, 17 सितंबर 2017

--हृदय विदारक - -


 कहानी:

  हमीरपुर सहर से दूर नदी किनारे बसा एक छोटा सा गॉव था।   झुंगी-झोपड़ी वाली बस्ती जँहा पर  गरीब और निम्न वर्ग के लोग  ही रहा करते  थे। उन्ही में से एक सुखीराम नाम के  गरीब मजदुर का भी परिवार  था। सुखीराम की  पत्नी तो कई साल पहले ही  डेंगू के चलते गुजर चुकी  थी ,अब उसके परिवार में सिर्फ २ बेटियाँ और १  बेटा ही परिवार  के नाते बचे थे। बड़ी वाली बेटी की उम्र १६ साल, दूसरी बेटी की उम्र १४ साल है और बेटे की उम्र  १० साल थी ।

हमीरपुर के ज्यादातर  लोगो  दिहाड़ी मजदूरी और  आस -पास के  गॉवो में जाकर  साहूकार और जमींदारो के यँहा मजदूरी किया  करते। सुखीराम  का जीवन भी बांकी लोगो की तरह  ही  गंदगी ,बीमारी ,गरीबी, दो बक्त की रोटी के लिए जद्दोजहद  आशा  और निराशा के बीच  किसी कदर कट रही थी।

गरीब की जिंदगी है ही ऐसी की  खुद को मार नहीं सकता क्योकि अपना और अपने परिवार का पेट भरने के लिए कमाना है।

सायद ऊपरवाले को यह  भी मंजूर नहीं ,भादो का महीना आसमान ने  तांडव मचा रखा था ,बारिस थी की थमने का नाम न लेरही  थी।  बारिश के कहर ने सब कुछ तबाह कर दिया नदी उफान में थी, ऐसा लग रहा था मानो धरती को निगल जाएगी,  जँहा देखो बस पानी ही पानी नजर आरहा था।  पानी धीरे-धीरे बस्ती की अंदर घुसने लगा  जो जितना अपनी गठरी में बांध सका अपने परिवार को लेकर सहर की तरफ पलायन कर गया। चारो तरफ बस मुसीबतो का पहाड़ था रोजी -रोटी के साथ अब इन गरीबो के सर से  छत  भी  छिन गई थी ।

सभी मजदूरों ने आपसी  सहमति  से तैय किया की सहर से कुछ  ही दुरी पर जो झुंगी -झोपड़ी वाली बस्ती है वही पर हम लोग  भी अपनी-अपनी झुंगी तान लेंगे।

वहाँ जा कर  देखा तो चारो तरफ सिर्फ  गंदगी ,बदबू ,मच्छर  और बारिस के पानी से भरे गड्ढे और उन्ही गड्ढो के इर्द -गिर्द  लकड़ी ,कुछ मिटटी के बने टूटे -फूटे ,छोटे -छोटे  घरौंदे  जँहा रहना तो दूर की बात थी साँस लेना भी दुर्भर था।   जिसको जँहा जगह मिली  बांस के तम्बू गाड़कर ऊपर से कपडा,प्लास्टिक ,जिसके पास जो भी था डाल कर  सभी ने अपना- अपना घरौंदा तैयार कर लिया।

कुछ न सही से तो  कुछ सही ,कम से कम रात गुजारने   का एक ठिकाना तो मिल गया दिन तो कही गुजार लेते।  रात में पसु पछि या इंसान  सभी घरोँधा ही ढूढ़ते है ।

  सुखीराम के आँखों से नींद कोसो दूर थी रात भर इसी फिक्र में रहा की अब आगे क्या होगा, अपने बच्चो का पेट कैसे पालेगा ,नाम तो सुखीराम था लेकिन मन बड़ा निराश था।  सुखीराम नाम  सायद माँ- बाप ने अपने मन की तसल्ली  के लिए रखा होगा। जीवन से तो कोई सुख न सही सायद नाम में ही सुख मिल जाये लेकिन आज  सुखिया का बचा - कुचा  सुख भी उपरवाले से देखा न गया। धन के नाते एक घर था वो भी आज छिन गया।

फिर भी उसके मन में कोई शिकायत न थी शिकायत करता भी तो किससे करता  गरीबी और लाचारी में जीना तो  गरीब के लिए आदत है ,जिसे वह पीढ़ी दर पीढ़ी निभाता चला आरहा है सिर्फ  अपनी लाचारी और बेबसी को रात भर कोसता रहा।

सुबह होते ही बिना कुछ खाये बदन पे किसी  साहूकार का  दिया हुआ फटा पुराना कुरता लपेटे  जिसके  यँहा  पहले  मजदूरी करता था उसने दिए थे।  पैर में रबड़ की चप्पल  पहने  सहर की तरफ सरपट दौड़ा जा रहा था। बदन में जान नहीं उम्र भी 60 बारिस की ऊपर  होगई थी ।  पैदल चलते -चलते थक गया  फिर भी कदम रुक नहीं रहे थे। .मन में बस यही सोचता जा रहा  था दोपहर होगई तो काम कौन  देगा ,भागता-भागता  आखिर अपनी  मंजिल  तक पहुँच ही  गया।  फैक्टिरियों   के बाहर सुबह  से ही मजदूरों  की लाइन  लगी  थी  वहाँ  भी उसे निराशा हाँथ लगी किसी ने काम नहीं दिया। बदन पे फटे हुए चीथड़े लपेटे हुए बूढ़े  भिखारी  को भला काम कौन देता।  ऊपर से सकल से बीमार  लग रहा था। दोपहर हो चली  थी  कंही काम न मिला भूंख और प्यास से  दम निकला जा रहा था। कुछ  खाले लेकिन जेब में फूटी कौड़ी तक न थी।

थके  - हारे सुखीराम से  अब  चला नहीं जा रहा था।  पास में ही एक चाय- नास्ते की टपरी दिखी सोचा चलो वही चलता हूँ सायद कुछ खाने को मिल जाये।

सुखीराम  दुकान वाले से "भाईसाहब भूंख बड़ी जोरो से लगी है ,कुछ खाने को देदो ? ,बदले में बोलोगे कर दूंगा ?"

  आँखों में लाचारी और  बेबसी तो थी लेकिन भगवान के नाम का सहारा न लिया ।

दुकानदार उसकी हालत देख कर ही समझ गया  की इसके पास पैसे- वैसे तो होंगे नहीं।

दुकानदार(झिड़कते हुए )-"कुछ नहीं है खाने के लिए जाओ अपना रस्ता नापो खैरात नहीं बट रही यंहा। "

ये बाते  सुनकर सुखीराम के पेट  में आग तो पहले से ही लगी थी दिल में भी लग गई। मन ही मन कहता हुआ " नाहक़ ही इससे  मांग लिया लेकिन करू तो करू क्या , भूंख और प्यास से लगता  है प्राण- पखेरू यही उड़ जायेंगे।

अब सहा नहीं जाता चलो किसी और से मांग कर देखता हूँ , सायद कुछ मिल जाये। पास में ही एक बुजुर्ग बैठे थे ,सुखिया ने सोचा चलो इन्ही से मांगकर देखता  हु।

सुखिया रुआंसा सा चेहरा लिए  हुए " बाबूजी सुबह से कुछ खाया नहीं  मुझे भी कुछ खाने को देदो ?इसबार भगवान् के नाम का सहारा भी ले लिया  सकल तो पहले से ही भिखारियों जैसी थी।

वो आदमी "हां,मै तो  यंहा तुझे ही खिलाने ही बैठा हूँ। कोई काम- धंधा क्यों नहीं करता ?काम क्यों करेगा काम में तो मेहनत पड़ती है। भीख मांगना तुम लोगो के लिए बड़ा आसान है। हमारे देश में यही सबसे बड़ी समस्या है , कोई काम करना नहीं चाहता सब मुफ्त बैठ कर खाना चाहते है। "

 वहां बैठे कई लोगो से मदत मांगी ,मगर कुछ न मिला  सब्द बाण सुन -सुन कर सुखीराम का  मन   बड़ा व्यथित होगया।

 मिन्नते की लेकिन किसी को सुखीराम की  हालत  पर तरश न आया । सुखीराम एक बुजुर्ग के पास गया ,सोचा सायद कुछ देहिदे ,जिन्दा रहते आश न टूटे।  पास जा पहुंचा फिर से वही  बात दोहराई ,मना करने पर भी नहीं माना इस बार ढिठाई दिखते हुए  बार -बार दोहराता रहा उस बुजुर्ग आदमी के साथ वाला तरश  दिखाते हुए 'दे दो कब से मांग रहा है कौन सा रुपये -दो रुपये में इसकी तरह  गरीब हो जाओगे दुआए ही देगा। लेकिन वो आदमी जिसने ये  ज्ञान दिया खुद नहीं देसका आखिर इतना सब सुनंने के बाद उस मोटे ने अपना  मन मसोसते  हुए सुखीराम को  पैसे तो नहीं अपना झूठन देदिया ,सायद उसका पेट भर गया होगा ,ज्यादा खाने ,फेकने से अच्छा कुछ पुण्य भी कमाले ।

सुखीराम की  जान में जान आई  समोसे पर टूट पड़ा एक- दो कौर में ही में ही पूरा समोसा चट कर गया।

कुछ दूरी पर ही  पेड़ के निचे बैठा एक व्यक्ति सुखीराम को बड़े ही समानुभूति  से देख रहा था ,सुखीराम की भूंख और तड़प को देख उसने  एक और समोसा दुकान से लेकर उसके हाँथ में रख दिए। सुखीराम की आंखे उस  नौजवान की रहमदिली  देख अश्रुपूरित होगई  दुआए भी देता जा रहा और साथ ही  खाता भी जा रहा था।

उस गरीब को खाता  देख उस नौजवान का  मन बड़ा प्रफुल्लित था बांकी तो सभी अपनी -अपनी दुनिया में खोये थे।

इंसानियत क्या इस  नौजवान में  है जो अपने ही समान इंसान और हमदर्दी उस गरीब के लिए रखता था या फिर उस इन्सान के पास जो  पुण्य  के लालच  में दिल में पत्थर रख कर पैसे दिए।  खैर ये तो अपनी अपनी सोच पर निर्भर करता है।

सुखीराम  को अब जा कर लगा  सरीर में   जान  आयी फिर से काम की तलाश में निकल गया। भटकते -भटकते साम गई  लेकिन कंही काम न  मिला। थक- हार कर सोचा चलो अब घर ही लौट चलते है कल फिर देखेंगे।  सुखीराम के बदन में जान नहीं थी फिर भी  मिलो  चल  कर जाना था।  किसी कदर गिरते -पड़ते  घर पहुँचते- पहुँचते रात १० बज गए।  उधर सुखीराम की बड़ी बेटी रानी अँधेरे   में  टक -टकी  लगाए अपने बाप के घर लौटने की राह तक रही थी।  उसका मन बड़ा व्याकुल था कही से बापू आता  हुआ दिख जाये। मन  में  तरह - तरह  के  ख्याल आ  रहे  थे ,इतनी देर होगई बापू कहाँ गया  होगा , अनजान सहर है ,कही रास्ता तो नहीं भटक गया ,कही कुछ हादसा तो नहीं हो गया .ख्याली घोड़े मन  ही मन  दौड़ाये  जारही  थी  की इतने में सुखीराम झुके  हुए कंधे लेकर,पैर घसीटे हुए चला आरहा  था। ऐसा लग रहा था  मानो खुद की लास को कंधे पे  ढो कर लारहा हो। रानी  को बाहर  बैठा देख "सोई नहीं , यंहा बैठी क्या कर रही है? मुनिया और गोलू  सो  गये ? खाना  तो खिला दिया था न "एक साथ कई सवाल पूंछ डाले।

रानी "हां बापू  दोनों खा  कर सो गए .दाल तो थी नहीं चावल बस बचा था वही खिला कर सुला दिया "

सुखीराम "और तूने  खाया ?"

रानी(झिड़की देते हुए) " ऐसे काहे पूंछ रहे हो  ,माँ  के गुजरने  के बाद  मैंने  बिना  तुम्हे  खिलाये  कभी  खाया  है जो आज खायूँगी, जगह बदल गई इसका मतलब ये थोड़े ही अपना धरम भी भूल गई। "

प्यार से फटकार लगाते हुए -चलो बाहर  पानी रखा है हाँथ-मुँह  धो कर पहले खा लो  बांकी बाते बाद में करना। "

सुखीराम का  भूंख  के मारे  बुरा हाल था जितना बाहर अँधेरा उससे कही जादा अँधेरा तो उसकी आँखों  में छाया था। जल्दी -जल्दी हाँथ धोकर अपनी झोपड़ी की अंदर जमीन में ही खाने बैठ गया।

सुखीराम"हां ला जल्दी से ला ,आज तो लगता है भूंख के मरे जान ही निकल जाएगी। "

रानी ने अपनी  पीठ सुखीराम की तरफ करते हुए जिससे उसको पता न चल सके की भगौने में कितन  चावल बचा  है। बाप को  भूंख  से तड़पता देख ,भगौने में जितना भी चावल था पूरा का पूरा थाली में परोस दिया।

 रानी थाली आगे बढ़ते हुऐ "लो खाओ सुबह से पता नहीं कुछ खाया भी है की नहीं "उसके शब्दों   में प्यार  भरी उलाहना थी।

सुखीराम "चल तू भी अपने लिए निकाल ले ?"

रानी"नहीं बापू तू खा ले मै बाद में खा लुंगी। "

सुखीराम"बाद में कब खायेगी रात की एक पहर तो बीत गई ?"

रानी-(झिड़की देते हुए ) "मैंने कहा न , तू खाले बहस न कर "

सुखीराम "तू जिद बहुत  करती है ,बिलकुल अपनी माँ पे गई है,लेकिन मै तेरा बाप हूँ सब समझता हूँ। "

सुखीराम को सब समझ आगया भगौने में कुछ होगा तो खायेगी।

सुखीराम ने  थोड़ा सा ही खाया और आधा थाली में छोड़ दिया डकार लेते हुए "मेरा तो इतने में ही पेट भर गया अब मै न खायूँगा अब तू खा या फेक दे मै तो चला सोने। "

सुखिया को रोना आरहा था लेकिन बेटी के सामने रोना उसे ठीक न लगा । बेटी  से  बिना नजरे  मिलाये सीधे बाहिर  चला आया और फूट -फूट  कर खूब रोया। गरीब का सब से बड़ा और एकमात्र यही तो  सहारा है जिससे उसे राहत मिलती है,दिल हल्का कर लेता है । बड़े ही निराश और हताश मन से जैसे सब कुछ ख़त्म हो गया हो । आसमान की तरफ टक -टाकी लगाए कुछ देर तक शून्य भाव से देखता रहा  फिर कभी खुद को कोसता  तो कभी अपनी गरीबी को कोसता हुआ अपनी झुंगी में लौट आया। तीनो  बच्चे एक ही चटाई में फटा चादर ताने सो रहे थे।  .सुखीराम अपने बच्चो के पास जाकर उनके सिराहने बैठ कर  सर पे   हाँथ फेरते हुऐ ,लोरी गुन-गुनने लगा जो अक्सर उसकी लुगाई बच्चो को सुलाते हुऐ सुनाया करती थी।  अपने बच्चो  को प्यार से सहलाता भी जा रहा था और रो  भी रहा था उसके लिए तो सारा संसार यही थे।   कुछ देर बाद सुखीराम भी बगल में  लेट गया लेकिन नीद आँखों से कोसो दूर थी। भूंखे पेट नीद कहाँ , सोचा चलो पेट भर पानी ही पी लेते है, सायद नींद आजाये  लेकिन पेट की आग फिर भी न शांत हुई ,कुछ  देर करवटे बदलता रहा ,लेटा नहीं जा रहा था ,तो उठ कर बैठ गया और पूरी  रात बैठे- बैठे ही गुजार दी।

 अगले  दिन  फिर काम  की तलाश में निकल  गया लेकिन बदकिस्मती थी की पीछा छोड़ने का नाम न ले  रहे  थी । कभी किसी दिन  काम  मिलता तो कभी कोई काम न  मिलता । सुखीराम की जर्जर हालत देख कर कोई मेंहनत का काम   देने को   तैयार न होता।

दिन बा दिन सुखीराम की हालत और गंभीर होती जा रही थी। उसके लिए बच्चो का  भरण  -पोषण बड़ा  ही मुश्किल  जान   पड़ता। इन सब  से उसकी बड़ी  बेटी रानी  भी अनजान न थी।

एक दिन साम  को रानी के मन में जो बहौत दिनों से चल रहा था बोल दिया "बापू मै भी कल से काम पर जाउंगी यहाँ  से महज  दो -तीन किलोमीटर  की दुरी  में एक फैक्ट्री  है ,जिसमे इस  मोहल्ले  की बहुत सारी औरते काम करने जाती  है ,मै  भी उन्ही के साथ कल  से काम पर जाया करुँगी। "

सुखीराम "तू काम पर जाएगी तो इन बंदरो को कौन संभालेगा "गोलू  और  मुनिया के कान  खींचते हुए।

रानी"ये मुनिया अब इतनी छोटी न है की ,अपना और गोलू  का ख्याल न रख सके "

सुखीराम को रानी का काम पे जाना ठीक  नहीं लग रहा था ,अनजान सहर है ,जवान बेटी कुछ ऊंच -नीच न होजाये ,लिहाजा बात  टालने की कोशिस कर रहा लेकिन रानी  तो रानी  ही थी  जिद पे अड़ गयी तो अड़ गई। फिर वो कहा मानने वाली थी। .

रानी "मै तो कल  से जा रही हूँ बस "

सुखीराम अनमने मन से"जा तेरी जो मर्जी कर ,मुझसे पूंछा क्यों करती है जब तुझे आपने मन की ही करनी होती है। "

रानी "हँसते हुए बापू  तू  कितना  अच्छा  है।  फिकर  न कर सब ठीक होजायेगा ,ऊपरवाले ने चाहा तो तुझे  कभी काम पर नहीं जाना पड़ेगा  मै धीरे -धीरे सब संभल लुंगी। "

अगले दिन सुभह -सुभह ही रानी बांकी औरतो के साथ  फैक्ट्री की तरफ निकल गई जँह पर एक  बहुमंजिला इमारत में काम चल रहा था।

फैक्ट्री के बाहर  ही सुपरवाइजर सभी मजदूरों की एंट्री कर रहा था , मजदूर लाइन से  क़तर में  एक- एक कर अपनी एंट्री करवाते जा रहे थे। .रानी अपनी बारी आने पर सुपरवाइजर के पास पहुंचते  ही अपना नाम  बताया । सुपरवाइजर अपनी भौंहे उठाते हुए रानी को घूरने लगा।

अपलक कुछ देर नखसिख तक किसी जौहरी के मानिंद तरासने  लगा।   गोल चेहरा ,उभरता हुआ सरीर , कमल की तरह जवानी अभी खिलना सुरु ही हुई थी।  सुपरवाइजर अपनी  कामोत्तेजना में पूरी तरह से गिन्न पलके झपकाते  हुए" आज पहली बार आई हो लगता है ?"

रानी - हां साहब, मुझे भी काम पर रख लो ?"

सुपरवाइजर "क्यों नहीं , क्या नाम बताया ?"

रानी -अपना नाम बताते हुए ,'रानी। "

सुपरवाइजर मस्का  लगते हुए "बड़ा ही सुन्दर नाम है, तू काम भी मस्त करेगी ? अपनी कनखिया उमड़ते हुए "है की नहीं ?"

रानी हँसते हुए  "हां , साहब। आप बहुत ही मजाकिया इन्सान मालूम होते है। "

सुपरवाइजर फिर से मस्का लगाते हुए "तुम हो ही इतनी खूबसूरत की तारीफ करते तो बनता है। कल से एक काम और करना आँखों में काजल और होंटो पर लाली भी लगा कर आना , तुम्हारी खूबसूरती में चार- चाँद लग जायेगा। "

रानी हँसते हुए "ठीक है साहब ,जैसा आप बोलो। "उसे क्या पता  इस इन्सान के अंदर एक भेड़िया छुपा बैठा है। रानी आपने काम पर लग गई  उसे  गिट्टी और ईंटा ढोने के काम पर लगा दिया। काम बहुत मेहनत का था लेकिन रानी मन से उत्साहित और खुस थी उसे अपनी जिम्मेदारी का अहसास था।  वो भी मर्दो  की तरह अपने परिवार के लिए जीना चाहती थी,  काम काना चाहती थी।  खुद तो न पढ़ सकी लेकिन अपने  दोनों  छोटे भाई -बहन को पढ़ना और उनकी अच्छे से परवरिश करना चाहती थी। अपने बूढ़े  बाप  के बोझ को कम करना  चाहती थी।  रानी और मजदूरों से कही ज्यादा और अच्छा काम करने की कोसिस करती जिससे किसी को कोई शिकायत का मौका न मिले।

दिन इसी तरह बीतते रहे  हफ्तों बीत  गए  उधर सुपरवाइजर की कोशिस भी जारी थी, रानी को किसी कदर  अपने जाल में फ़साने की। भरसक कोशिस कर रहा था  लेकिन रानी उसकी बातो को अनसुना कर आपने काम में लग जाती।

इधर सुखीराम भी बड़ा खुश था रानी इतना तो कमा लेती थी  की घर खर्च आसानी से चल जाता।  सुखीराम अब कही काम पर न जाता दिन भर चिलम तम्बाकू पिता बच्चो के साथ खेलता और हंसी  - ठिठोली  करता  पड़ा  रहता।

आखिर एक दिन सुपरवाइजर को अपनी हैवानियत दिखाने का मौका मिल ही गया।

बारिश बड़े जोरो से होरही थी आस्मां पूरी तरह से कला तूफान सा मंजर था।  सुपरवाइजर ने काम रुकवा दिया।

उसे लगा अब इससे बढ़िया मौका फिर नहीं मिलेगा उसने सभी मजदूरों को जाने के लिए कहा " आज काम न होपायेगा ,सभी अपने घर जा सकते है। " उनके साथ रानी भी जाने लगी ,उसने धीरे से रानी को रुकने के लिए बोला,जिससे बांकी लोगो को सुनाई न दे।

सुपरवाइजर रानी से "तुम कहां जा रही हो, मेरी रानी तुम्हे  थोड़े  ही न बोला जाने के लिए ,तुम्हारे लिए तो बहुत सारा काम है ,तुम रुको इनको जाने दो ,इन सब की मजदूरी तो आज की काट ली जयेगी लेकिन तुम्हे तो पूरी की पूरी मिलेगी , आज  आराम से मेरे पास बैठो तनिक  दो  चार  बाते  हमसे  भी  तो  कर  लो ,ऐसा  मौका  बार -बार  रोज  थोड़े  ही  न  मिलेगा ,पानी  हल्का  हो जायेगा  तो  मै खुद  ही  तुम  को  तुम्हारे घर तक छोड़  आयूंगा। "

रानी "समझ तो गई इसने मुझे क्यों रुकने लिए कहा। मन ही मन  इसकी  नियत सही न लग रही ,सुपरवाइजर से  सीधे सख्त लहजे में पूंछते हुए "साहब इधर -उधर की बाते न करो काम बताओ अभी वो लोग जादा दूर न गए होंगे ,ऐसी  बाते करोगे तो मै  न रुकूंगी।"

सुपरवाइजर अपने चिरपरिचित अंदाज में हँसते हुए  "हां -हां ,तुम तो नाराज होगई थोड़ा शांति  तो रखो जब देखो बस काम –काम असली वाला काम तो आज ही है ,उपरवाले ने तुम्हे मजदूरी करने के लिए थोड़े ही  बनाया। "

रानी "साहब  काम  नहीं  करुँगी  तो  खायूँगी  क्या  .दो छोटे  भाई  बहन  है ,बुड़ा बाप  उनके  लिए  तो  मै  ही   सहारा  हूँ। "

सुपरवाइजर "तू  तो  बड़ी  होशियार  भी  है  ,मै  तो  तुम्हारी  और   मदत  करना  चाहता  हूँ ,तुम  पैसो  की  फ़िक्र  मत  करो   मै  हूँ  न. ?" लेकिन  तुम्हे  भी  मेरे  लिए  कुछ  करना  होगा ,ये  कहते –कहते रानी  का हाँथ  पकड़ लिया।

रानी गुस्से  से  "मै  सब  समझती हूँ  साहब  ,आप  क्या  चाहते  है  आप  सकल  से  भोले दीखते  हो ,अंदर  से  उतने  ही  कमीने हो । "

सुपरवाइजर को घूरते हुए उसके हाँथ को तेजी से झटक दिया और वहाँ से जाने लगी।

पीछे से  सुपरवाइजर ने उसका हाँथ पकड़ कर खींचते हुऐ अपनी अपनी आगोश में ले लिया।

सुपरवाइजर ने उसको कस कर पकड़ लिया  जिससे वो खुद को उसके चंगुल से छुड़ा न सके।

सुपरवाइजर बहसियो की तरह  बेतहासा  रानी के पुरे बदन को चूमने लगा ,पुरे सरीर में जँहा मन मर्जी हाँथ घुमाने लगा। रानी  जोर -जोर से रोये जा रही थी पूरी ताकत के साथ उसका विरोध भी कर रही थी।  खुद को छुड़ाने की बहुत कोसिस की लेकिन कामयाब न होसकी। जैसे  ही  सुपरवाइजर ने रानी के कपडे  उतरने की कोशिस की रानी के अंदर अचानक न जाने कहा से गजब की ऊर्जा का संचार होने लगा  पूरी ताकत से  अपनी  कोहनी  सुपरवाइजर के पेट में मारा जिससे वो बहसी  सीधे जमीं पे आगिरा लेकिन अपनी पकड़ ढीली न की उसको साथ लेकर निचे फर्श पर ही गिर गया। रानी ने अपना साहस न खोया उसके चंगुल से खुद को छुड़ाने  के लिए जल बिन मछली की तरह तड़प रही थी । अपना हाँथ,पैर, सर सब कुछ चला रही थी।

इतने में रानी को बगल में पड़ा  ईंट का एक टुकड़ा  दिखा बड़ी कोशिस  के बाद हाँथ किसी कदर उस टुकड़े तक पहुँच गया । रानी ने उस ईंट के टुकड़े को  सुपरवाइजर  के सर पे देमारा।  सुपरवाइजर दर्द से कराहते हुए अपना सर पकड़ कर बैठ गया। इस सीना -झपटी में रानी के कपडे तो  पूरी तरह से फट चुके थे फिर भी  जो कपडे बचे थे उन  चीथड़ों को समेटते हुए वहाँ से भागी।  विनास काले विपरीत बुद्धि निचे की तरफ भागने की बजाये  उस बहुमंजिला इमारत  में  ऊपर की तरफ भागने लगी उधर सुपरवाइजर का  दर्द जैसे ही कम हुआ इधर उधर देखने लगा .रानी को वहां न पाकर इमारत  की  सीढ़ियों से इधर -उधर देखने लगा .इतने में ऊपर की सीढ़ियों से एक पत्थर गिरा। सुपरवाइजर समझ गया ऊपर की ओरे भाग रही है।

सुपरवाइजर भी ऊपर की तरफ भगा रानी बमुश्किल 5 माला  ऊपर ही जा पायी होगी की इतने  में  रानी को पीछे से धर दबोचा और जमीन में पटक दिया । फिर क्या मासूम की चीख ,आँखों से बहते आंसूं ,लाचारी ,बेबसी ,जिस्म को भेडियो  की तरह नोचता  वो हैवान।  उस गरीब कमजोर लड़की की इज्जत तार- तार हो गई।

हैवानियत का भूत सर से उतरते ही सुपरवाइजर फिर अपनी दोरंगी चाल चलने लगा  मिमियाते हुऐ   "रानी मुझे माफ़ कर दो गलती होगई,मैंने ये सब नशे की हालत में किया वरना तुम तो जानती हो मै कितना अच्छा आदमी हूँ,तुम्हे कुछ नहीं होगा ,तुम्हे जितने पैसे चाहिए मै तुम्हे दूंगा लेकिन तुम कभी किसी से  कुछ कहना मत। "  प्यार  से उसके सर को  हाँथ से सहलाने लगा।

रानी पूरी ताकत से उसके गाल पर  एक थप्पड़ जड़ते हुए "तू   दरिंदा ,बहसी  ,सैतान  है,मै तुझे छोड़ूगी नहीं  ,तुम्हे तो मै  जेल में बंद करवायुंगी। 'गुस्से में न  जाने  क्या - क्या  कह गई .अपने  फटे  कपड़ो  को उठाते हुए वहाँ से भागने लगी। रानी को भागता देख सुपरवाइजर घबरा गया ऐसा लगा मानो काटो तो खून नहीं सारा मामला उल्टा पड़ गया  "अब क्या करे इसे यंहा से जिन्दा  जाने देना ठीक नहीं। "मन ही मन  बेचैन हुए  जा रहा था ऐसा लगा जैसे नींद से जगा हो । रानी के पीछे -पीछे भागने लगा ,रानी बमुश्किल १ माला ही निचे उतर पाई थी  की उस वहसी ने  पकड़ ही लिया।  रानी खुद को छुड़ाने की नाकाम कोशिस करती रही  सुपरवाइजर ने ऊपर से ही रानी को धक्का  देदिया और देखते ही देखते रानी का सरीर निचे फर्श  पर  जिसपर कंक्रीट की सतह थी सरीर छत -विछत उसके चारो तरफ  सिर्फ खून ही खून था।

सुपरवाइजर ऊपर से  निचे की तरफ भगा लाश को हिला डुला कर  तसल्ली करने लगा।  अभी जिन्दा  है या मर गई और जब उसे पूरी तरह से इत्मीनान होगया  की साँस चलना  बंद होगई लाश के पास ही बैठ कर सोचने लगा की अब इसे कैसे  ठिकाने लगाया जाये ।

चारो तरफ नजर दौड़ाई सामने कुछ ही दूरी  में दिवार के पास एक गड्ढा  दिखा जंहा  पर अभी कंक्रीट का फर्श  नहीं था । .वो जगह उसे सही  लगी लाश दफ़नाने के लिए। लाश को उठा कर उस गड्ढे में डाल दिया और उसके बाद मशीन से गिट्टी , रेत,और सीमेंट का मसाला तैयार कर  गड्ढे को पूरी तरह से पाट दिया जिससे  किसी को कुछ  पता न  चल सके ।

सुपरवाइजर को ये सब करते- करते  साम होगई थी।  उधर सुखीराम बेटी के घर लौटेने  की राह देख रहा था मन ही मन बड़बड़ा रहा था "आज इतनी देर होगई अभी तक लौटी  क्यों  न  ,पहले तो कभी ऐसा न करती  ,सूरज  ढलने  से पहले ही आजाती थी। चलो  सुरतिया से चल  कर पूंछता  हूँ  सायद  उसको  पता हो  आखिर  उसी के साथ तो  जाती है उसे जरूर पता होगा। ये सोचते -सोचते सुरतिया की झोपड़ी  जा  पहुंचा .सुरतिया उसी के गॉव  की थीं ,और रिश्ते में सुखीराम की भौजी लगती थीं।

सुखीराम  "रनिया अभी तक नहीं आयी भौजी ,मुझे तो बड़ी फिकर हो रही है ,पहले कभी ऐसा न हुआ तुम्हे तो  पता  होगा कहाँ गई होंगी ?"

सुरतिया"हम लोग तो दुपहरिया में ही  आगये रहे बारिस के चलते ,आज साइट  में काम बंद पड़गया  था न। .मैंने देखा नहीं सोचा वो भी पीछे-पीछे  आ रही होगी। "

इतना सुनते ही सुखीराम के पैर कापने लगे  ,कही मेरी बच्ची को कुछ हो तो नहीं गया होगा। घर से लालटेन उठाई और जल्दी -जल्दी फलाँग भरते हुए फैक्ट्री की तरफ भगा जंहा रानी काम करती थी। सांसे  फूल  रही थीं फिर भी रुकने का नाम न ले रहा था  .रस्ते में रानी -रानी चिल्लाता जा रहा था। फैक्ट्री पहुंच कर हर जगह  छान मारा  लेकिन उसकी  रानी कही  नहीं मिली । चारो तरफ बस  अँधेरा  बारिस का  सोर और एक बेजान उखड़ी हुई आवाज रानी नाम का सोर बारिश और फ़िज़ा के बीच दब कर रह गई ।

                                                                                                ~ धर्मेंद्र मिश्रा

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गुरुवार, 14 सितंबर 2017

Script cum Article on India's'biggest prostitution community.

                                            Sex Culture


देह व्यपार की ये सब से मंडी और कही नहीं  अपने ही देश के मध्य में इस्थित मध्य प्रदेश में है .मध्य प्रदेश के रतलाम ,मदसौर ,नीमच और बुंदेलखंड रीजन के कुछ छेत्रो में जैसे ग्वालियर ,शिवपुरी ,मुरैना जैसे जिलों के हाइवेज से सटे इलाकों में  लगती है .साथ ही देह व्यपार  की ये मंडी, इन जिलों से लगे  राजस्थान के सीमावर्ती जिलों में भी है .

वैसे तो मंदसौर ,और नीमच अफीम की वजह से प्रदेश में फेमस है और देश  का सब से बड़ा अफीम उत्पादक छेत्र भी  है . इसके  अलावा एक और बजह से मशहूर है , वो वजह है " बछड़ा" और "बेड़िया " समुदाय  के लोगो ,  जिनके लिए वेश्यावृति ही सब कुछ है ,जिस्म बेंच कर पेट पालने में इन्हे कोई संकोच  नहीं देह व्यपार सिर्फ पेट पलने के लिए नहीं करते बल्कि परम्परा के नाम पर करते है .

"बछड़ा "और "बेड़िया" समुदाय के लोगो का  देश- दुनिया से कोई बासता  नहीं .

यहाँ जिस्म कौड़ियों  के भाव बिकते है ,महज १००,२०० रुपये में . यहाँ लड़किया पैदा होने पर मातम नहीं ,खुसिया मनाई जाती है . १२ साल से लेकर ३५ साल उम्र तक की औरते जिस्म फरोसी की धंधे में लगी हुई है.

यहाँ  बाप बेटी के लिए ,पति  पत्नी के लिए ग्राहक  ढूढ़ता है और इन्ही  पैसो से अपना घर चलते है.यहाँ मर्द काम नहीं करते अपनी बहन और बेटियों के जिस्मफरोसी से जो पैसा मिलता है उन्ही  पैसो से नसे में धुत्त   रहते  है  .

इस समुदाय के  जादातर मर्द  कुंवारे रहते है क्योकि यहाँ पर शादी  के लिए लड़की वाले दहेज़ नहीं देते बल्कि लड़के वाले देते है ,जिसकी कीमत चुकाना सब  के बस की बात नहीं ,दहेज़ की  रकम लाखो में होती है अनुमानतह १० से १५ लाख तक होती है .

अब विस्तार से जानते ,देश के इस कड़वी  हकीकत के बारे में .

सब से पहले बात करते है "बछड़ा" समुदाय के लोगो के बारे में ,इस समुदाय के लोग जादातर  ,रतलाम ,मंदसौर और नीमच से निकलने वाले highway से सटे आस पास के गावो में रहते है ,ये लोग देह व्यपार का धंधा आज से नहीं कर रहे बल्कि ,कई सदियों से कर रहे है .इस समुदाय के बारे में कहा जाता है की  इन्हे अंगेजो द्वारा बसाया गया था .अंग्रेजो ने अपनी पहली सैनिक छावनी मध्य प्रदेश के नीमच में ही बनायीं थी और बाछड़ा समुदाय की औरते  अंग्रेज सैनिको की हवस मिटाने  का काम करती थी ,और तभी  से ये समुदाय  इस  धंधे  में संलिप्त  है.
इसके बाद बछड़ा समुदाय नीमच से लगे जिलों में जैसे ,मंदसौर और रतलाम में धीरे -धीरे बसते चले  गए  .
आज इस समुदाय के तकरीबन  पांच सौ  से भी  ज्यादा परिवार है जो ३५ से भी ज्यादा गावो  में फैले  हुए  है .एक survey के  मुताबिक ६००० के  आस पास इनकी संख्या  है जिसमे  तकरीबन तीन हजार  महिलाये है
और इन महिलायो  में 45 फीसदी महिलाये जिस्मफरोसी का धंधा करती  है .

 इन महिलायो  के  बारे कुछ रोचक  बाते जानते   है ,जैसे की इस समुदाय की महिलायो  को दो वर्गो में बाटा गया है .
जो महिलाये शादी कर  अपना घर  बसाती है,उन्हें" बट्टावाडी"  कहते है और जो महिलाये वेश्या वृत्ति करती है उन्हें "खेलवाड़ी" कहते है और ये फैसला  इनकी माँ  पर निर्भर  करता  है की  कौन सी बेटी की शादी  करना है और कौन सी बेटी को वेश्यावृत्ति की धंधे में उतारना है .

हर परिवार की लिए ये जरुरी होता है की कम से काम एक लड़की वेश्यावृत्ति करे, कोई  चाह कर भी इस धंधे से खुद को अलग नहीं कर सकता .
एक सामाजिक परंपरा के  मुताबिक इनकी कुल देवी जिसे  ये लोग " नरीमाता"  कहते है ,के  सामने सपथ लेना होता है की कौन सी बेटी वेश्यावृत्ति करेगी .

अब बात करते  है  "बेड़िया" समुदाय के लोगो की -

इस  जनजाति की संख्या जादातर ,चम्बल रीजन ,जैसे ग्वालियर ,शिवपुरी,मुरैना ,और राजस्थान में  जयपुर से लगे  highway के सटे इलाकों में  और भरतपुर जिलों में रहती है ."बेड़िया" जनजाति पहले नाचने -गाने का काम करती थी ,लेकिन समय के साथ इनकी रोजी- रोटी का जरिया  छीन गया और  इनकी मज़बूरी ने वेश्यावृति के पेशे का रूप लेलिया अब इस देह व्यपार के धंधे को परंपरा के नाम पर करते  है .

ये लोग "बाछड़ा" समुदाय के लोगो की तरह अपने घर पर  देहव्यपार का धंधा नहीं करते बल्कि दूसरे देश में तस्करी कारते है तथा मुंबई जैसे बड़े -बड़े महानगरों   में इस समुदाय की औरते धंधा करती है, जिससे इस समुदाय की अच्छी खासी आमदनी हो जाती है .

इस जनजाति की अनुमानित संख्या १७००० के आसपास  पास है, जिसमे ८००० महिलाये है और आधे से भी जादा महिलाये देह व्यपार के धंधे में संलिप्त है .
सरकार का  रवईया भी  इस समुदाय  के प्रति उदासीन रहा,इनके पास न तो bpl कार्ड है और न ही इस समुदाय के लोगो  को "बेड़िया" जानजाती से होने  की वजह  से कोई काम देता है .
इनके बच्चो को पढ़ने के लिए स्कूल में दाखिला तक नहीं मिलता ,मिलता भी है तो इन्हे इतना प्रताड़ित किया जाता है की छोड़ने पर मजबूर हो जाते है .
बेड़िया जनजनजाति की बेड़िया कैसे टूटेगी ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा लेकिन
इस देश में एक तरफ जंहा  सभ्यता और संस्कृति का विकाश हुआ वही साथ ही साथ देह व्यपार का धंधा भी फलता फूलता रहा  और इसी सभ्य समाज  में " बेड़िया"  और "बाछड़ा" समुदाय भी रहते है यही इनकी  हकीकत है .






 

सोमवार, 11 सितंबर 2017

शुक्रवार, 8 सितंबर 2017

Anti reservation campaign for political party.

1-अपना  फर्ज  मत  भूलो  आरक्षण के दंश को मत  झेलो  .
2-साथमिल कर संघर्ष करो देश को आरक्षण मुक्त करो .
3-जन अभियान चलना है ,आरक्षण मुक्त भारत बनाना है .
4-आरक्षण एक गंदगी है ,इसकी करो सफाई ,चलो साथ मिलकर लड़े भाई .
5-हमें तोड़ने वाले खुद टूट जायेंगे ,भारत को आरक्षण  मुक्त बनाएंगे .
6-सवर्ण का नारा है ,आरक्षण मुक्त भारत बनाना है .
7-आपने अधिकार को पाना है,अपने जमीर को जगाना है .
8-आरक्षण मुक्त भारत का करो sankalp और नहीं है कोई  दूसरा विकल्प .
9-उठो, लड़ो ,रुको मत ,लक्ष्य पूरा होने तक डटे रहो .
10-आरक्षण मुक्त भारत की संकल्पना  .