दुनिया का हर इंसान अपने अतीत को अपने वजूद को अपने पूर्वजो के इतिहास को जानना चाहता है : उसपर गर्व करना चाहता है और यदि इतिहास भी उतना ही गौरवपूर्ण समृद्ध हो तो इससे अच्छी बात भला क्या हो सकती है .प्राचीनकालीन इतिहास के पन्नो में सब से गौरवशाली प्राचीन और प्रामाणिक इतिहास है ;ऋग्वैदिक सभ्यता .हमारे मन में कई तरह के सवाल होते है जैसे आर्य कौन है?कहा से अये?आर्य सभ्यता क्या है?सनातन धर्म क्या है ?या कहे ऋग्वेदिक सभ्यता उनकी धार्मिक,सामाजिक,आर्थिक स्थिति आदि या और भी कई तरह के सवाल जैसे बांकी धर्मो की धार्मिक विचारधारा सनातन धर्म से किस तरह से सम्बंधित है .
आर्य सभ्यता के साक्ष्य आज से ५ हजार साल पुराने या कहें उससे भी पहले के हैं .आर्य के सम्बन्ध में जानकारी का प्रमुख श्रोत ऋगवेद है जो विश्व का सबसे प्राचीन और प्रामाणिक ग्रन्थ है और इसी ग्रन्थ के अनुसार आर्य का मतलब होता है -सत्य ,अहिंसा ,पवित्रता ,आदि गुणों को धारण करने वाला आर्य होता है जो इन चीजों को नहीं मानते थे उन्हें "अनार्य' या दस्यु कहा जाता था.
ऋगवेद में इंद्र को सब से प्रतापी देवता के तौर पर बताया गया है जो जल के देवता मने जाते थे.दूसरे सबसे महत्व पूर्ण देवता अग्नि और तीसरे महत्वपूर्ण देवता वरुण थे.आर्य मुख्यतःप्रकृति की पूजा स्तुति पाठ,यज्ञ और आहुति के माध्यम से करते थे. ऋगवेद में १०२८ पद्य है जो मंत्र और स्लोक पर ही आधारित है .
संभव है की आर्यो के प्रकृति पूजा के पीछे का धार्मिक आधार बारिश और पानी की वजह से तरह- तरह की फसल वनस्पतियो का जमींन पर उगना इसके अलावा आदिम काल से ही मानव जीवन में आग का विशेष महत्व था जैसे आग से रोशनी पैदा करना खाना पकाना आदि.
इन सब कारणो से उनके दिमाग में यह यह विचार होना स्वभाविक था की कोई न कोई प्राकृतिक सक्ति मौजूद है जो इस धरती को नियंत्रित करती है .
यह भी संभव है की इसी धार्मिक मान्यता के आधार पर त्रिदेव यानि ब्रह्मा ,विष्णु और महेश की परिकल्पना की गयी होगी क्यों की बांकी धर्म ग्रन्थ इसके बाद में लिखे गए हैऔर उस समय वैदिक काल में मूर्ति पूजा का प्रचलन नहीं था .मूर्ति पूजा का प्रचलन उत्तर वैदिक काल और गुप्त काल से माना जाता है .
अब बात करते है आर्यो की आर्थिक स्थिति के सन्दर्भ में ऋगवेदिक सभ्यता तत्कालीन उस समय की मौजूदा अन्य सभ्यता से बेहतर थी ऋग्वैदिक सभ्यता कृषि प्रधान थी गेंहू और जौ की खेती आर्य उस समय प्रमुखता से करते इसके अतिरिक्त ,मटर,सरसो और तिल खेती करते थे . सर्वप्रथम कपास की खेती भी आर्यो ने ही प्रारम्भ की थी .
अब आर्यावर्त के बारे में जानते आर्यावर्त मतलब होता है "श्रेष्ठ जनो का निवास स्थान"
आर्यो के निवास स्थान को ले कर काफी विरोधाभास है कुछ इतिहास करो का कहना है आर्य ईरान से अये कुछ कहते है जर्मनी से अये कुछ कहते है ध्रुवीय प्रदेश से आये या मध्य एशिया से सब के आपने -अपनेअलग मत है.लेकिन आर्य कहा से अये इसका कोई सटीक और स्पस्ट प्रमाण नहीं है .
आर्य यही के मूल निवासी है या कही बाहर से आये इस बात की सच्चाई को तथ्यों के माध्यम से परखने की कोसिस करते है क्योंकी उस समय की तत्कालीन परिस्थियो और मिले प्रमाणों के साक्ष्य के आधार पर देखा जाये तो सम्पूर्ण दक्षिण एशिया का भूभाग आर्यवर्त के अंतरगत आता था जिसे भारतीय उपमहाद्वीप के नाम से भी जाना जाता था .
उस समय आर्यावर्त मध्य एशिया के सम्पूर्ण भूभाग में फैला था और उसकी सीमाएं समय -समय पर बदलती रही .
आर्यवर्त पहले काबुल अफगानिस्तान के कुम्भा नदी से लेकर उत्तर भारत में गंगा नदी तक तथा कश्मीर की वादियों से लेकर नर्मदा नदी के उसपर तक या कहे मध्यभारत तक दक्षिण भारत उस समय जलमग्न था. वर्मा मामयार ,तिब्बत आदि सभी आर्यवर्त का हिस्सा थे .
१ हजार से भी ज्यादा साक्ष्य आर्य के भारतीय उपमहाद्वीप से प्रप्त हुए है और कही से नहीं .
ऋगवेद में सिंधु और सरस्वती नदी का विशेष तौर पर जिक्र है इन नदियों के किनारे स्थित मोहनजोदाड़ो और हड़प्पा वैदिक काल की प्रंमुख विकशित सभ्यता में से एक थी .पाकिस्तान के लरकाना नामक जिले में मोहनजोदाड़ो के खंडहर आज भी मौजूद है जिसे "मृतकों का टीला" कहा जाता है सायद वो सभ्यता किसी प्रकृतिक आपदा की वजह से नस्ट हुई लेकिन इतिहास से कोई स्पस्ट प्रमाण नहीं मिलता है . इस सभ्यता के नस्ट होने की कई इतिहासकारो के अपने अलग -अलग मत है .हालिया एक फिल्म भी मोहनजोदाड़ो पर बानी थी जिसमे इस सभ्यता के नस्ट होने की वजह बाढ़ दिखाया गया है जो स्पष्तः सत्य नहीं है.
अब आते है हड़प्पा सभ्यता की तरफ हड़प्पा पाकिस्तान के मांटगोमरी जिले में स्थित है जंहा से प्रचुर मात्रा में आर्य सभ्यता के प्रमाण मिले है जैसे ,गेंहू,जौ,पीतल के बर्तन ,स्वस्तिक के निसान आदि. इसी तरह और भी कई प्रमाण मिले जो अन्य जगहों से भी प्राप्त हुए है जो जादातर उत्तर भारत में स्थित है जैसे लोथल गुजरात के अहमदाबाद में भोगवा नदी के किनारे ,काली बंगा जो राजस्थान में है ,आलमगीरपुर जो उत्तर प्रदेश में है ,सुरकोतड़ा जो गुजरात के कक्ष जिले में है ,रोपड़ जो पंजाब में है ,वनमाली हरियाणा जैसी कई कई जगहो से मिले साक्ष्य आर्यो के भारतीय उपमहाद्वीप से होने का प्रमाण देते है .
अब बात आती फिर ये भ्रम कैसा ,भ्रम क्यों फैलाया गया की आर्य बहार से आये इसकी वजह है भारत में ब्रिटिश शासन काल के दौरान इतिहासकारो ने भारतीयों को भ्रमित करने और देश भक्ति की भावना को कम करने के लिए 'इंडो-आर्यन माइग्रेशन थ्योरी" दी .जिसका समर्थन वामपंथी विचार धारा वाले लोग तथा कुछ निम्न वर्गीय समुदाय के लोगो ने इस सिद्धांत को बल दिया क्योंकी इन लोगो का मानना था और आज भी यही मानना है की द्रविड़ और आदिवासी वर्ग के लोग ही यहाँ के मूल निवासी है .
अब जानते है 'इंडो-आर्यन माइग्रेशन थ्योरी" में कितनी सच्चाई है वैज्ञानिको ने एक शोध के माध्यम से बताया की प्राचीन उत्तर भारतीय लोगो में और यूरेसियाई लोगो के जींस में समानता पायी गई .यूरेसियाई का अर्थ होता है यूरोप और एशिया के निवासी .
इनके जींस में तो समानता है लेकिन इस बात के कोई स्पस्ट प्रमाण नहीं है की आर्य पहले यूरोप गए या फिर यूरोप के लोग भारत पहले आये.
लेकिन तथ्यों से तो यही मालूम होता आर्य उस समय एक विकशित सभ्यता थी .भौगोलिक परिवर्तन और व्यपार के चलते आर्य ही पहले यूरोप गए होंगे .
अब आते है आर्य और द्रविड़ पर द्रविड़ यानि दक्षिण भारतीय के मूल निवासी इतिहासकार तो इन्हे आर्यो से अलग बताया है लेकिन अमेरिका और भारतीय वैज्ञानिको ने शोध में आर्य और द्रविड़ के जींस में समानता पायी दोनों ही एक ही पूर्वजो की संताने है ऐसा इनका मानना है और इस दावे के पीछे वैज्ञानिको का एक ठोस कारण भी है .वैज्ञानिको ने यह शोध कई उत्तर और दक्षिण भारतीय राज्यों में विभिन्न जाती समुदायों ,ऊँची और नीची जाती में किया और सभी में साझे अनुवांशिक सम्बन्ध पाए गए यानि एक साथ कई समुदायों के बीच सम्बन्ध 'इंडो-आर्यन माइग्रेशन थ्योरी" को पूरी तरह से नकारती है .
लेकिल अभी जो इतिहास पढ़ाया जा रहा है 'इंडो-आर्यन माइग्रेशन थ्योरी"पर ही आधारित है लेकिन भविस्य में इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता की ये शोध एक नया इतिहास लिखने का कारण बने .
अब आते है हिन्दू सब्द की ओरे जिसको लेकर कई तरह की भ्रांतिया और मिथक है .इतिहासकारो का कहना है ये शब्द अरबी और ईरानियों द्वारा दिया गया .
दूसरी तरफ भाषाविद्वानों का कहना है की सिंधु नदी के इस पार रहने वाले लोगो को ईरानी लोग हिन्दू शब्द से सम्बोधित करते थे क्योंकी "सा" का उचारण ईरानी भासा में 'ह" ध्वनि में बदल जाता है .
तथ्यों के माध्यम से इस बात में कितनी सच्चाई है जानते है.
पारसी ईरान के मूल निवासी थे और पारसी धर्म की स्थापना आर्य की एक सखा से ७०० एसवी पूर्व अत्रि कुल के लोगो से हुई थी बाद में पारसी धर्म को संगठित रूप जरथ्रुस्त ने दिया जिन्हे पारसी धर्म का संस्थापक माना जाता है और पारसी लोग इन्हे अपना भगवान् मानते है .यदि पर्सिओ को 'सा" ध्वनि के उच्चारण में समस्या होती तो संस्कृत को "हंसकृत" कहते .वर्तमान पाकिस्तान के सिंधप्रान्त को "हिन्द "प्रान्त कहते .सिंधी समुदाय के लोगो को भी "हिंदी" या "हिन्दू" कहते ."सिंधु "नदी को हिन्दू नदी कहते लेकिन ऐसा नहीं था इनको इनके मूल नाम से ही जाना जाता था .
पर्सिओ की किताबो के पूर्व भी सनातन धर्म के धर्म ग्रंथो में हिन्दू सब्द मिलत है ,जैसे ऋग्वेद में सप्तसिंधु का उल्लेख मिलता है ,सप्तसिंधु का अर्थ होता है वह भूमि जंहा आर्य रहते है .
कुछ विद्यावानो का मानना है की हिमालय से हिन्दू शब्द उसकी भौगोली पहचान की बजह से सामने आया हिमालय का पहला शब्द "ह" और उस समय सनातन धर्म में ज्योतिष शास्त्र का विशेष महत्व था जिससे चन्द्रमा का पर्यवाची शब्द "इन्दु " को मिला कर "हिन्दू" शब्द पड़ा .
इस तथ्य के पीछे एक ठोस कारण है उस समय सम्पूर्ण आर्यवर्त में केवल वैदिक धर्म को मानाने वाले लोग थे और कोई धर्म नहीं था इसलिए हिन्दू सब्द सम्पूर्ण आर्यवर्त के लोगो के लिए प्रयोग में लाया गया .इसका अर्थ इतिहासकारो के इस दावे में भी कोई सच्चाई नहीं .
अब बात करते है सनातन धर्म की-सनातन धर्म प्रकृत की पूजा पर आधारित धर्म है इस धार्मिक फिलॉसफी को मानने वाले लोग मूर्ति पूजा नहीं करते जैसे आर्य समाज के लोग . हिन्दू धर्म जो सनातन धर्म के ससिद्धांतो के साथ -साथ मूर्ति पूजा पर भी यकीं रखते है जिसके अंतर्गत सभी वेद, पुराण और उपनिषद और बांकी धर्म ग्रन्थ सम्लित है .
सनातन एक धर्म है जो नियमो और सिध्यांतो पर आधारित है जबकि हिन्दू एक सब्द है जो बाद में संस्कृति का रूप लेलिया .कालांतर में गुप्त काल से लेकर अब तक बिभिन्न संस्कृति ,धर्म और सभ्यता को हिंदी अपने आप में समाहित कर सम्पूर्ण भारतीय सभ्यता का प्रतिनिधित्व करती है और ये सब्द आज सम्पूर्ण समाज का परिचायक है .
इसलिए हिन्दू को एक धर्म के नजरिये से देखना और विरोध करना सर्वथा अनुचित है हिन्दू सभ्यता में ,मूर्तिपूजा करनेवाले ,बौद्ध,जैन ,इस्लाम, सिक्ख ,परषि और यहूदी सभी समाहित है ,यदि कोई दूसरे धर्म को मानने वाला व्यक्ति सनातन धर्म का विरोध करता है तो वह अपने धर्म की मूल भावना से भटक जायेंगे और वो भला कैसे कुछ तथ्यों के माध्यम से समझते है
सनातन का अर्थ है जिसका न आदि है न अंत इस तत्व को ही सनातन कहा गया है .यह सास्वत है .सदा के लिए सत्य है .जिन बातो का सास्वत महत्व है वही सनातन है जैसे सत्य सनातन है.
ईस्वर सनातन है,आत्मा सनातन है,मोक्ष सनातन है और इस सत्य के मार्ग को बताने वाला सनातन धर्म भी सत्य है .
सनातन धर्म ईस्वर ,आत्मा,और,मोक्ष को तत्व से यानि अंतरात्मा,इंद्रियों और ध्यान से जानने का मार्ग बताता है .
मोक्ष की अवधारणा भी सनातन धर्म की देंन है जो बौद्ध और जैन धर्म के प्रमुख सिद्धांतो में से एक है . मोक्ष का अर्थ होता है अपनी अंतरात्मा से ईस्वर को जानना जिसके बाद इंसान जन्म और कर्म के बंधन से मुक्त हो जाता है .
मोक्ष एकनिष्ठा ,ईस्वर के प्रति समर्पण का भाव ,ध्यान,मौन,तप, और यम नियम के अभ्यास और जागरण द्वारा ही पाया जा सकता है इसके अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग नहीं है .
अब इस्लाम और ऋगवेद में क्या सम्बन्ध है जानते है -
ऋग्वेद में सम्पूर्ण विश्वा को आर्य बनाने का सन्देश दिया गया है और कुरान में भी कुछ ऐसा ही कहा गया है जैसे पुरे मानव समाज का इस्लामीकरण करना .
ऋग्वेद में आर्य को ईस्वर पुत्र से सम्बोधित किया गया है ठीक उसी प्रकार इस्लाम के प्रवर्तक पैगम्बर मोहम्मद साहब ने अपने आप को अल्लाह का सच्चा मसीहा कहा जिनका काम भटके हुऐ नीच और अधम लोग जो गलत काम करते है उनको सही रास्ता दिखना है .कुरान के अनुसार ईसाई धर्म के प्रवर्तक ईसामसीह भी अल्लाह के पैगम्बर है जिन्हो ने अल्लाह की पेशकस को ठुकरा दिया और अल्लाह की सत्ता पर यकीं नहीं किया .इस तथ्य के आधार पर कहा जा सकता है की इस्लाम को मानने वाले लोग मुसलमान और इस्लाम को ना मानने वाले लोग "काफिर" हुऐ ,जिस प्रकार सनातन धर्म के सिद्धांतो पर चलने वाले लोग आर्य और न चलने वाले लोग अनार्य हुए .
ऋग्वेद के अनुसार जो लोग परमतत्व और परमेस्वर को नहीं मानते वे लोग असत्य में गिरते है और मृत्युलोक के अंधकार में पड़ते है.
कुछ ऐसा ही कुरान में भी है जो अल्लाह पर यकीं नहीं करते उसकी सत्ता को नहीं मानते वो लोग जहन्नुम को प्राप्त होते है और कई तरह की यातनाये पाते है.
ऋग्वेद के अनुसार सम्पूर्ण जगत की उत्त्पति परब्रह्म यानि एक इस्वर से हुई पूर्ण ब्रह्म से सम्पूर्ण जगत की उत्पत्ति होने पर भी ब्रह्म की पूर्णता में कोई कमी नहीं आती अर्थात ईस्वर शेष रूप में भी पूर्ण है .
कुरान में भी यही बात कहता है सम्पूर्ण जगत की उत्पत्ति अल्लाह से हुई,वह अपने आप में पूर्ण और समर्थवान और दोष से रहित है.
ऋग्वेद में जाती और संप्रदाय के आधार पर तो कोई भेद नहीं है लेकिन गुण ,कर्म ,और स्वाभाव आदि से इंसानो को दो भागो में बांटागया है -पहला "आर्य"दूसरा "अनार्य" या दस्सू कहा गया है .
आर्य वो लोग होते थे जो परिश्रम से अपना कल्याण करते है दूसरी तरफ अनार्य या कहे दस्सू जो भ्रष्ट स्वार्थी और दुसरो को हानि पहुंचने वाले होते है इसीलिए आर्य यानि श्रेस्ट मनुस्य ही भूमि और पदार्थ पाने के काबिल है इसका मतलब धरती पर मौजूद सभी प्रकार की सुख -सुविधाओं के उत्तराधिकारी केवल आर्य है .कुरान के अनुसार जो अल्लाह को मानते है यानि इस्लाम के नियमो का पालन करते है वही लोग अल्लाह के करीब और धरती पर मौजूद समस्त पदार्थ,सुख - सुविधाओं के भोग के अधिकारी है .
सनातन धर्म और उसकी धार्मिक अवधारणा के आधार पर ये बात साफ है की बांकी धर्मो के धार्मिक सिद्धांत और विचारधारा इसी धार्मिक के इर्द- गिर्द घूमती है .
इतिहास और उस समय की मौजूदा परिस्थि . धर्म ग्रंथो के आधार पर एक और निष्कर्ष निकल कर सामने आता है की धर्म को इंसानो के बीच प्यार , सहिष्णुता भाईचारा बढ़ने और उनको संगठित कर फिर उनपर धर्म को शासन का आधार बनाया गया.
आर्य ऋषि और विद्वानों द्वारा सबसे पहले धर्म की परिकल्पना की गई फिर इसे शासन का आधार बनाया इसके सुखद परिणामो से प्रभावित होकर बाकि धर्म के विद्वानों ने अपने समर्थ के अनुसार धर्म को जानने की कोसिस की होगी .
महान दार्शनिक नास्त्रोदय ने धर्म के सन्दर्भ में एक बात कही थी धर्म अफीम की तरह होता है लोगो को धीरे -धीरे पिलाओ और उनपे राज्य करो और यही सब चीजे हम वर्तमान में परिलक्छित होते देख रहे है .