दिन के उजाले में भी जहाँ लोग अँधेरा तलाशते है,
मुश्किल सफर है मालूम है ,गिर के सम्भलने का,
हुनर मुझे आता है...
ठोकरे खाके ही सम्भला हूँ,
अँधेरे में चलना मुझे आता है .
अँधेरे से अब मुझे डर लगता नहीं !
अँधेरे में चलना कोई गुनाह नहीं!
मुसाफिर हूँ, मुश्किल डगर का ,
बेख़ौफ़ होके चल रहा हूँ,
दिन हो या रात बस चल रहा हूँ .
हौसला हो तो तुम भी चलो मेरे साथ,
मै तो अँधेरे में भी चलता हूँ ,
सुबह होने का इंतजार करता नहीं !
अँधेरे में चलना कोई गुनाह नहीं!
परवाह हो तुम्हे गर ज़माने की,
तो भीड़ में हो जाओ.
पर्दानशी आँखों में जहाँ मुड़े राह ,
वही तुम भी मुड़ जाओ,
मै तो अकेला ही चल रहा हूँ ...
भीड़ की ओट में छिपना मेरी फितरत नहीं !
अँधेरे में चलना कोई गुनाह नहीं!
बदनसीब कहता ये जमाना,
जो अँधेरे में है चलता...
दौर देखे कई,लोग आते रहे जाते रहे,
किसी नसीब वाले का भी मुस्तकिल ,
जहान मैंने कभी देखा नहीं !
अँधेरे में चलना कोई गुनाह नहीं!
प्रकाशित रचना है ...
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