मंगलवार, 29 मई 2018

अँधेरे में चलना कोई गुनाह नहीं

!!!प्रायोगिक रचना है कविता गजल दोनों के भाव समावेशित है !!!



अँधेरे में चलना कोई गुनाह नहीं!


दिन के उजाले में भी जहाँ लोग अँधेरा तलाशते है,
मुश्किल सफर है मालूम है ,गिर के सम्भलने का,
हुनर मुझे आता है...
ठोकरे खाके ही सम्भला हूँ,
अँधेरे में चलना मुझे आता है .
अँधेरे से अब मुझे डर लगता नहीं !
अँधेरे में चलना कोई गुनाह नहीं!
मुसाफिर हूँ, मुश्किल डगर का ,
बेख़ौफ़ होके चल रहा हूँ,
दिन हो या रात बस चल रहा हूँ  .
हौसला हो तो तुम भी चलो मेरे साथ,
मै तो अँधेरे में भी चलता हूँ ,
सुबह होने का इंतजार करता नहीं !
अँधेरे में चलना कोई गुनाह नहीं!
परवाह हो तुम्हे गर ज़माने की,
तो भीड़ में हो जाओ.
पर्दानशी आँखों में जहाँ मुड़े राह ,
वही तुम भी मुड़ जाओ,
मै तो अकेला ही चल रहा हूँ ...
भीड़ की ओट में छिपना मेरी फितरत नहीं !
अँधेरे में चलना कोई गुनाह नहीं!
बदनसीब कहता ये जमाना,
जो अँधेरे में है चलता...
दौर देखे कई,लोग आते रहे जाते रहे,
किसी नसीब वाले का भी मुस्तकिल ,
जहान मैंने कभी देखा नहीं !
अँधेरे में चलना कोई गुनाह नहीं!

प्रकाशित रचना है ...
Esi Tarh ki aur Kavitaye padhne ke liye ...MeriSuchham Anubhooti ,Online Download kar padh sakte hai .

रविवार, 20 मई 2018

अकार्य ही जीवन न व्यर्थ करो



  हिंदी कविता 


 

Wisdom_Path_Peaceful_life_Poety_of_life

  
"अकार्य ही जीवन व्यर्थ करो,
यथाशक्ति  प्रयत्न करो,
कर्मनिरत हो कर्म करो ,
मत घबराओ संघर्ष करो...
दुर्लब्द्ध नहीं है कोई पथ,
यदि तूने चलना सीखा हो,

दुष्प्राय ही मिले हासिल है,
यदि पथ से तू भटका हो ,

जिन्दा है तू अभी मरा नहीं,
शेष प्राण बांकी है तुझमें अभी,

आलभ्य हो अवशेष नहीं,
मानव तन हो पशु नहीं ,
दुर्लभ हो अपर हो,

ईस्वर का उद्धत प्रतिरूप हो ,
उस  सक्ति की पहचान करो...

अकार्य ही जीवन व्यर्थ करो,
यथाशक्ति  प्रयत्न करो,

कर्मनिरत हो कर्म करो ,
मत घबराओ संघर्ष करो...

ये भीरु मन क्यों घबराता है ,
ये कौन तुम्हे कायर कहता है ,

स्वयं अहसास नहीं,स्वयं की शक्ति का,
वो भीरु मन ही तुम्हे,कायर कहता है ,

मन के अंदर तुम अपने पड़ताल करो,
सागर से भी गहरा ,हिमालय से भी ऊँचा,

अपार शक्ति छिपी है ,तुम्हारे अंदर,
एक दिव्य पुंज जल रहा है तुम्हारे अंदर,

सक्ति स्वरुप उस दिव्य ज्योति का मनन करो,

अकार्य ही जीवन व्यर्थ करो,
यथाशक्ति प्रयत्न करो,
कर्मनिरत हो कर्म करो ,
मत घबराओ संघर्ष करो."

~धर्मेन्दा  मिश्रा~

बुधवार, 16 मई 2018

जीवन संतुलन, Life changing Wisdom Path

                                !!! जीवन संतुलन !!!


Life_changing_wisdom_path

 


मन में सेवा भाव रखना ही एक तरह का विकार है.नकारात्मक  ऊर्जा का संचार करता है,सेवा भाव रखने  वाले मनुष्य के अंदर  स्वयं के प्रति श्रेष्ठता  की भावना पनपने लगती है. 


मन में सेवा का भाव ,किसी की सेवा करना,दीन दुखियों की मदत करना ,एक जीव आत्मा का दूसरे जीवात्मा के प्रति लगाव होना स्वाभाविक है .यह एक प्रकृति प्रदप्त भाव है ,हमारा कर्त्तव्य* है.


जो हमें अनिवार्यत: करना चाहिए,यदि हम अपने कर्तव्य से विमुख होते है ,केवल मात्र जीवन में लेने का भाव रखते है ,समाज को, प्रकृति को कुछ देते नहीं जो की हमारे  जीवन और प्रकृति में असंतुलन का भाव (स्थितिज ऊर्जा,आगे विस्तार से वर्णित है )पैदा करती  है.

जैसे वृछ का काम ,फल और ऑक्सीजन देना है,जोकि उसका कर्तव्य है .इंन्सान का कर्तव्य इनके प्रति सहिष्णुता,सुरच्छा का भाव रखना आदि जोकि आवश्यक है प्रकृति संतुलन के लिए .


.प्रकृति संतुलन को विस्तार से समझने की कोशिश करते है .चराचर जगत में मौजूद हर एक जीव ,निर्जीव प्रकृति में सामंजस्य के लिए परोछ और अपरोछ तौर पर उत्तरदायी है .

सजीव और निर्जीव दोनों ही पदार्थ ऊर्जा से बधे हुए है ,परन्तु ऊर्जा को परिवर्तन करने की सक्ति केवल  सजीव पदार्थ(जो जीवन धारण करता है ) के पास है,जिनके अंदर चलायमान ऊर्जा मौजूद है.


विज्ञानं की भाषा में ऊर्जा दो तरह की होती है. स्थितिज ऊर्जा और गतिज ऊर्जा ,ऊर्जा को नष्ट  नहीं किया जासकता ,इन दोनों ही अवस्थाओं में केवल परिवर्तनीय है.और परिवर्तन की सक्ति चलायमान ऊर्जा ,जिसे हम जीव आत्मा भी कहते है ,पर निर्भर है .



इन दोनों ही उर्जाओ के मध्य संतुलन आवश्यक है,परन्तु वर्तमान में चलायमान ऊर्जा द्वारा  ,जैसे तेजी से बढ़ता सहरीकरण,वनो का धीरे -धीरे कम होना,नदियों ,जलाशयों के जल का   दूषित होना ,अपव्यय ,जलीय परिस्थिति तंत्र से सजीव ऊर्जा का कम होना, जमीन के अंदर मौजूद स्थीजित ऊर्जा  Static Energy को  बहार निकालना ,स्थितिज ऊर्जा के संचय को बढ़ावा देरही है, जिससे प्रकृति में असंतुलन पैदा होना स्वाभाविक  है .

स्थितिज ऊर्जा के आधीन चलायमान ऊर्जा का होना .


पृथ्वी को भीषण तबाही की तरफ मोड़ रही है.स्थितिज ऊर्जा गुण-दोष से रहित एक निर्पेच्छ ऊर्जा है .जो चराचर जगत में व्याप्त है और   (पृथ्वी Earth  के बाहर सम्भवता 99% फीसदी भाग में यही ऊर्जा विस्तारित है,हमारी आकाश गंगा के बाहर कुछ और भी ऐसे गृह है जहाँ सजीव ऊर्जा विद्यमान है )
 सजीव ऊर्जा द्वारा बनाये गये सुरच्छा घेरे(ओज़ोन परत  ,Ozone Layer) को तोड़ने में समर्थ है . 


और ये घेरा Boundery  टूटना  अव्स्यम्भावी* Impossible  है.परन्तु लम्बे समय तक " इससे टाला जा सकता है.और यह  संभव है यदि हम अपने आचरण,यम नियम द्वारा सजीव ऊर्जा ,चलायमान ऊर्जा को प्रखर ,ओजस्वी रूप प्रदान कर स्थिज ऊर्जा के प्रति बढ़ती ंनिर्भरता को कम कर सके. ,हमें स्वाध्यन Self Study   की आवश्यकता  है ,स्वध्यन से हमारे अंदर आत्म ज्ञान का भाव आता है,हम स्वयं को जानने लगते है .


जब हम स्वयं को जान जाते है ,अपनी ऊर्जा की सक्ति(Capacity of Energy) को पहचान जाते है तब हमारे अंदर स्वतः ही  हर एक सजीव जीव आत्मा के प्रति समानता का भाव आजाता है.जो प्रकृति में संतुलन पैदा करती है .
              "यदि जीवन में स्वाध्यन का भाव हो तो नर्क को भी स्वर्ग बनाया जा सकता है "
 

"धर्मार्थ किया जाने वाला कोई भी कार्य ,भोजन ,फल आदि का वितरण करने का वीडियो या फोटो लेकर उसका प्रचार -प्रसार करना ,अहंकार को जन्मता है ."

                              

सोमवार, 7 मई 2018

संविदावाले गुरु जी,कविता

  

संविदावाले गुरु जी,कविता



संविदावाले गुरु जी पढ़ा रहे थे क्लास में की
गंगा जी कहाँ से निकल कर कहाँ समाती है .

उद्गम से संगम और संगम से उद्गम तक,
गंगा मैया कैसे और कहाँ जाती है .

बच्चे बेचारे चौथा और पचमा के का जाने,
गंगा कहाँ से निकल कर कहाँ जाती है . 

ऊ ता इहौ न जाने की गंगा आय का,
छेरी की पढिया की जंगल की हांथी है .

गुरु जी बताये रहे गंगा जी अमरकंटक से,
निकल के सतपुड़ा जंगल में विलुप्त होजाती है .

भोपाल,जबलपुर ,रायपुर छुहिया औ,
रेवा का पर करि चचाई में समाती है .

दोहा

"खिड़की से इतना सुन हेडमास्टर जैसूर,
आये अंदर ताव से देखिन आँखि घूर ".

मूरख का पढ़ा रहे हो स्कूल का ऐसे ही चलेगी,
दो नवा का ज्ञान नहीं मास्टरी का ऐसे ही चलेगी.

गंगा जी अमरकंटक से कैसे निकलेगी,
एतनि बड़ी गंगा कूड़ा मा कैसे रहेगी.

हमका बताबा कब ऋषिकेश,हरिद्वार,
काशी,पटना इलाहाबाद ,में बहेगी.

हिमालय से निकल कर कब फैली,
कब जमुना जी से संगम करेगी.

गुरु जी बोले या संविदा के वेतनिया मा,
गंगा जी  जइसन चाहे ओइसन बहेगी.

जब तक न बढे हमार वेतनिया,
गंगा जी मध्य प्रदेशय मा बहेगी.

शुक्रवार, 4 मई 2018

पती गमाईहा बीबी सहर वाली,बघेली कविता

बघेली कविता है,रसास्वादन करे !!!
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पती गमाईहा बीबी सहर वाली,
ब्याह लाया बीबी अंग्रेजी वाली.

दहेज़ में चीजे अजीब-अजीब सी थी लाई,
ये सब उसकी मम्मी जी ने थी भिजवाई .

साजो श्रृंगार सब भड़वा-बर्तन,
फ्रिज कूलर भी साथ थी लाई . 

गांव वाले देख कर भौचक्का रह गये,
चले जब कूलर तो कलेजा काँप जाये.

बहु सहर वाली देख के गन्न हुए मेहमान,
बहु बेचारी बेखबर उनकी बातन से अंजान.

सुबह एक दिन बहु जी करती रही कोलगेट,
अतने माँ देखिस उनकर देवर छोटकौना.

मंजन कइके रख दिहिन बहुजी ,
चली गयी अंदर उड़सामय बिछौना.
अतने मा मौका पायिस छोटकौना,
चिखमयमा मीठ लगा कोलगेटउना.

चिखत-चिखत आधा कैदिहिस कोलगेट छोटकौना,
देखिस जब भौजी ये क्या कर रहे हो तुम छोटकौना.
बहुत मीठ लगा भौजी या तोहार कोलगेटउना,
भौजी दिहिस एक चटकन  खींच के कनौना.
छोटू बिचारु भागे छिल्लाय केरे,
रोवत-रोवत पहुंचे जाय खेतौना .

हमारे भाई के  को कई दिहिस गाल -लाल,
कह मिश्रा बंधू केकर सामत है आयी आज.

ओतय मारय लाग्,हमका भौजी,
भईया या तू का कई लाये हो काज.

कहे मारिस बताव ता पहिले छोटकौना,
या मेहरिया के का अतनी बढ़िगय सान .

दुइ अच्छर पढ़ी का लिहिस या मेहरिया,
अउतय बघारय लाग् या आपन ज्ञान.

रोवा न तू ओखा हम सबक सिखाउब,
सानमा ओखे आज हम आगी लगाउब.

तव-तव मा बड़काउ हर-बरदा ढील चले,
कंधे मा हर राखि केरे बरदा हाँकि चले .

राखिस हर जोर से पूँछिस मेहरारु सेन्हि,
कहे मारे  छोटकौना हमा का किनिहिस .

कह बीबी जी तुम ही कहो ये क्या बात है,
कोलगेट भी क्या कोई खाने की चीज है.

बड़कू अपने गांव के मुखिया जमींदार,
पढ़े-लिखे सबसे अधिक है चौथा पास.

कोलगेट देखींन फेर चाखिन.
खाये के बाद थोड़ा मुस्काईन.

अरे याता बहुत मीठ है बड़कू जी बोले,
सुखय काहे खाये,तै है अबे बहुत भोले .

रोटी माँ चुपड़ी के कहे न खाये छोटकौना,
जा रोसँइया से रोटीता लईआव छोटकौना.

भौजी से ओमा कोलगेट चुपरावा,
थोड़ का तै खा बांकी हम खई ,

परा सगला खेत जोते का फे हम जाई.
मेहरारू बोली इसे अइसे नहीं खाते,

बड़कू जी बोले ता फेर कैसे है खाते.
इसे कूंची में रख के दाँत में लगते,
साथ-साथ इसे हिलाते भी है जाते .
इससे दाँत हो जाते है जैसे मोती,
इसे लगाने से सड़न नहीं है होती.
कह बड़कउनु इसे कूंची में कैसे है खाते,
कोलगेट नहीं पर कूंची हम खा जायेंगे.
इससे भी विचित्र हुआ था हाल,
बड़कऊ जब गए थे ससुराल.