बुधवार, 6 दिसंबर 2017

!!! प्राचीन रोम के ऐसे घिनौने सच जिसे जानकर आपकी रूह तक काँप जाएगी!!!

 !!! प्राचीन रोम के ऐसे घिनौने सच जिसे जानकर आपकी रूह तक काँप जाएगी!!!

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प्राचीन रोम से जुड़े कुछ ऐसे रहस्य जो बेहद ही घृड़ित और अस्चर्या जनक है .प्राचीन रोमवासी थे तो इंसान जैसे सभी इन्सान होते है लेकिन उनके काम -काज रहन-सहनका तरीका जानवरो से भी बत्तर घोर अंधविश्वासी और बर्बर थे .
प्राचीन रोमवासी खुद के ही मूत्र(urin) से मुंह और कपडे धोते थे.वहाँ के लोगो द्वारा पेशाब इकट्ठा करना और उसे बाजार में बेचने एक बहुत बड़ा व्यबसाय था. इस पेशे को वहाँ के लोगो द्वारा वृहत पैमाने पर अपनाया जाता था जिस पर रोम की सरकार कर (टैक्स) लेती थी.ये लोग घर -घर जा कर एक बड़े से कंटेनर में लोगो की पेशाब इकसठा करते फिर बाजार में उसी पेशाब को ऊँचे दामों बेंच देते और इसी पेशाब से रोम वासी अपने दाँत और कपडे साफ करते थे .एक तरह से देखा जाये तो ये काम आपको घिनौना और हास्यास्पद लगेगा लेकिन वैज्ञानिक दृश्टिकोण से बात करे तो मूत्र में बहुत से ऐसे पोशाक तत्व मौजूद होते है जिनका एक निश्चित मात्रा में सेवन करना काफी लाभकारी है.
मूत्र काफी बदबूदार पिले रंग के liquid की तरह होता है जिसमे ऐसे बहुत से ऐसे यौगिक होते है जैसे -सोडियम ,पोटेसियम,क्लोराइड ,मैग्निसियम और कैल्शियम जैसे तत्व जो न सिर्फ दाँत और कपडे धोने में उपयोगी है बल्कि बिभिन्न तरह की बिमारिओ से लड़ने में भी सहायक साबित होते है.आधुनिकता के इस दौर में इंसान जिस तरह विभिन्न-विभिन्न प्रकार की पेट सम्बंधित बीमारियों से ग्रषित है अगर इंसान अपना मूत्र न सही जानवरो जैसे गाय ,भेद और बकरी अदि के मूत्र का रोज सुभह खली पेट थोड़ी सी मात्रा में भी सेवन करे तो बहुत सारि बीमारियों से निजात पा सकता है.
अब बात करते है एक और घिनौने सच की -प्राचीन रोमवासी बकरी के गोबर का इस्तेमाल ,एनर्जी ड्रिंक और बैंडेज के रूप में करते थे .प्राचीन रोम वासी वृहद पैमाने पर गर्मी के दिनों में बकरी के गोबर को इकट्ठा करते और उसे सूखा कर रख लेते, जरुरत पड़ने पर जैसे सरीर पर किसी भी तरह की चोट अदि लगने पर उसी गोबर को घास-फूस की जड़ीबूटियों के साथ मिला कर बैंडेज की तरह घाव के चारो तरफ लपेट लेते थे .
इस के अलावा इस सूखे हुए गोबर को सिरके के साथ उबाल कर इसका उपयोग अपनी थकान मिटने के लिए सक्ति वर्धक एनर्जी ड्रिंक की तरह ,ताकत बढ़ने के लिए पिया करते थे.
इससे भी रोचक एक और बात तत्कालीन रोमन सम्राट नीरो भी इन बकरी के गोबर से बने एनर्जी ड्रिंक को खुद भी बड़े चाव से पिता था .
अब बात करते है एक और घिनौने तथ्य की - प्राचीन रोमवासी टॉयलेट जाने से पहले अपनी जिंदगी की प्रार्थना किया करते थे. वो ऐसा क्यों करते थे इसके पीछे उनका एक अंधविश्वास था .
प्राचीन रोम में उस समय सार्वजनिक शौचालय हुआ करते थे जो बहुत ही बदबूदार और विभिन्न तरह के जहरीले कीड़े- मकोड़े और गंदगी से भरे होते थे .
और ऐसे में शौचालय में जाना यानि अपनी मौत को दावत देने के सामान था क्योंकी सौंच(toilet) के दौरान जब कमोड पर बैठते उस समय जहरीले कीड़े -मकौड़े कमोड के अंदर से निकल कर पीछे जो भाग उनका खुला रहता था वहाँ पर काट लेते फलस्वरूप उनकी मृत्यु हो जाती थी.
इस समस्या से निपटने तथा अपनी सुरक्षा के लिए वो लोग जादू-टोने का सहारा लेते जैसे शौचालय की दीवारों पर जादुई मंत्र ,राच्छस के चित्र और अपनी देवी फोरट्राना की तस्वीर दीवार पर उकेरते और कमोड में बैठने से पहले उन्ही मंत्रो का उच्चारण करते थे .
एक और हास्यास्पद काम करते थे सौंच(toilet) के बाद ये लोग अपने -अपने सौंच अंग या कहे गुदाद्वार को साफ करने के लिए एक स्टिक से लगी सोख्ता (spong) का इस्तेमाल सभी लोग सार्वजनिक तौर पर किया करते थे परन्तु उस स्पोंग को कभी साफ नहीं करते थे .
एक और आश्चर्य जानते है - प्राचीन रोम की औरते इंसानी खून और चमड़ी से बने फेस क्रीम और साबुन का इस्तेमाल अपने सरीर को गोरा और साफ करने के लिए किया करती थी . लेकिन वो भी किसी साधारण इंसान के सरीर से बने फेसक्रीम और साबुन का इस्तेमाल नहीं अपितु रोमन योद्धा जो यूद्ध के दौरान मारे जाते थे उनके रक्त और चमड़ी को निकाल कर एक बोतल में रख लेते फिर उससे क्रीम और साबुन तैयार किया जाता था.इसके पीछे उनका तथ्य था की वीर योद्धया के खून की शक्ति से चेहरे और बदन में जादुई निखार आता है.
रोमन योद्धा (gladitor) के खून से जुडी एक और महत्वापूर्ण बात -प्राचीन रोम के लोग मौत का खेल खेलना पसंद करते थे .इस खेल में किसी एक योद्धा की मृत्यु तै रहती थी .उन मृत योद्धाओं के सरीर से लिवर को निकल कर जितने वाला योद्धा कच्चा ही चबा जाता था .
रक्त से जुडी एक और महत्वपूर्ण बात रोमन योद्धा के रक्त का इस्तेमाल मिर्गी जैसे मर्ज के इलाज में किया जाता था .मिर्गी के मरीजों को रक्त से बना सुप पिलाया जाता था जिसे बहुत असरकारी और शर्तिया इलाज माना जाता था .
एक और घिनौने आश्चर्य को जानते है -प्राचीन रोम में एक बड़ी ही अजीब प्रथा थी जैसे की सार्वजनिक भोजन के दौरान उलटी, वोमिटिंग करने की जिससे अधिक से अधिक खा सके. जब भी कभी किसी भोज का आयोजन होता ,उस दौरान पुरा कर्यक्रम जब तक ख़त्म न हो जाये तब तक खाते रहते थे .इस लिए पेट में जगह बनाने के लिए एक बाउल में वोमिटिंग को इकट्ठा करते और फर्श पर फेक देते जिसे गुलाम और नौकर साफ करते थे .
एक और आश्चर्य जनक बात जानते है .प्राचीन रोम वासी गले में लिंगनुमा या कहे पेनिस के आकर के लॉकेट पहनते थे और इस तरह के लॉकेट तरह -तरह की डिज़ाइन में बाजार में मिलते थे जिसे मर्दो द्वारा पहनना फैशन और शुभ माना जाता था .

शुक्रवार, 17 नवंबर 2017

कविता.....भटका हूँ न जाने किस सफर का मुसाफिर हूँ..


1...कविता.....


भटका हूँ न जाने किस सफर का मुसाफिर हूँ  .
अजनबी हूँ दो रोटी कमाने सहर आगया  हूँ .
काम की तलाश में  सहर भर की खाक
छानता हूँ  .
जो काम मिले बिना लाग्-लपेट करता  हूँ .
लोगो  की दो -चार धौस भी सहता हूँ .
रोटी -दो रोटी खाकर
कभी-इधर तो कभी उधर कैसे भी
 मुफ़लसी में ही गुजरा करलेता
 हूँ .
धन नाते और कुछ नहीं एक पोटरी
 जो हर दम साथ लेकर चलता हूँ .
चोर -उचक्कों के दर  से
अपनी पोटरी
सिने से लगा के रखता हूँ .
पोटरी में ज्यादा  कुछ नहीं
दो जोड़ी लत्ते एक ढेला
गुड़ रखता हूँ .
माँ कहती थी...
या जीवन मा तन ही है आपन सहाय 
रोटी चाहे न मिले रोज बिहन्ने
गुड़ाई के साथे पानी पीजिये .
घर भितरे आप मर्जी 
बहिरे बन -ठन के ही  निकलिये.
कलयुगी इस दुनिया में  
आपन -पराया  कोनो भेद नाही
सबहि सम समझिये.
रोबहि भितरे
अपन पीड़ा बहिरे केहू से न कहिये .
जेहि विधि राखे राम
ताहि विधि रहिये .
विधि -विधान जान लाभ-हानि सबहि
प्रभुकृपा समझिये .
तिनका सा ये जीवन कबहु न कोऊ से बैर कीजिये .
जेहि बिधि मिले जो सबहि से राम -राम कहिये .
समझ-समझ  का  फेर  है  .   
ईस्वर भी न हो साथ तभी साथ माँ होती है .
जग बैरी हो जाए माँ कभी बैरी नहीं होती है .
माँ ही है जो अपने लिए नहीं मेरे लिए जीती है .
मुझे  तो माँ में ही ईस्वर नजर आता है .
माँ की महिमा अब और न कही जाती है.
आज कोई नहीं है  साथ ,
अहजान से भरा  ये  सफर 
कही दूर खुद में भी मयासर नहीं
सिर्फ माँ याद आती है .
माँ की कही इन बातो को याद
कर मन भर आता है .
भला  कौन  है इस  जग में
जो ऐसी बात सिखाता है .
http://swargvibha.in/newforums/2018/01/02/1181/

1...कविता.....


प्रेम सूछम  अन्तःमन  की मनोस्थिति है
प्रेम  जीवन है जीवन का मान है .
प्रेम भक्ति है ,वात्सल्य है ,करुणा है ,
प्रेम ही  जीवन का श्रृंगार  है .
प्रेम आश्रय  है,तो कभी आलम्बन है ,
प्रेम मर्म  है, प्रेम ही जीवन का सार है .
प्रेम मनोभाव की अंजलि है ,
प्रेम सूरज की छिटकी रौशनी  है ,
प्रेम ही चन्द्रमा की सीतलता है .
प्रेम राग है ,विराग है ,अमृतरस की धार है,
प्रेम ही जीवन का अनुराग है .
प्रेम संयोग है तो कभी वियोग है .
प्रेम कभी आशा है तो कभी निराशा है .
प्रेम से ही जीवन ,जीवन ही प्रेम है .


1...कविता.....


बैठा था चुप चाप सा औचक ही कुछ याद आया.
याद कर उसे  न जाने क्यों रोना आया .
भूल गया था जिसको आज फिर वो याद आया .
कौन था वो अपना जिसे पीछे छोड़ आया.
हर  वक्त  दिल  के करीब  रहता  था .
मै कुछ न बोलू फिर भी दिल की बात
फट से  समझ  लेता  था .
दिन हो या रात हर वक़्त साथ रहता  था .
कोई न हो साथ तो वो ही रहता  था .
दिल के खालीपन को वो ही भरता था  .
आज फिर मुझसे मिलने आया है वो. 
इस  भागदौड़  की  दुनिया  में  क्यों  भूल 
गया  मैं उसको  क्या  आज  अकेला  हूँ ,
इसलिए   याद  आया  है वो .
हमसाया है  वो मेरा ,
आज अकेला हूँ इसलिए फिर याद आया है वो .

2...कविता.....

रूठी है जिंदगी मेरी कैसे कहुँ,
 मुझे मनाना नहीं आता.
रो-रो के जीना मुहाल है कैसे कहूँ
अब रोना  नहीं आता.
टूट के बिखर गया हूँ अंदर से कैसे कहूं ,
अब जुड़ना नहीं आता .
मीत मिले तो मिले किसी से कैसे
मुझे  तो जीना ही नहीं आता .
अपना कहूँ तो कहूं किसे ,
अब कोई पास नहीं आता .
जीयूं  तो जीयूं  कैसे ये जिंदगी ,
जीने में अब मजा नहीं आता .
 3...कविता.....

प्रेम सूछम  अन्तःमन  की मनोस्थिति है
प्रेम  जीवन है जीवन का मान है .
प्रेम भक्ति है ,वात्सल्य है ,करुणा है ,
प्रेम ही  जीवन का श्रृंगार  है .
प्रेम आश्रय  है,तो कभी आलम्बन है ,
प्रेम मर्म  है, प्रेम ही जीवन का सार है .
प्रेम मनोभाव की अंजलि है ,
प्रेम सूरज की छिटकी रौशनी  है ,
प्रेम ही चन्द्रमा की सीतलता है .
प्रेम राग है ,विराग है ,अमृतरस की धार है,
प्रेम ही जीवन का अनुराग है .
प्रेम संयोग है तो कभी वियोग है .
प्रेम कभी आशा है तो कभी निराशा है .
प्रेम से ही जीवन ,जीवन ही प्रेम है .
  3...कविता.....

नकाब पोश है सफ़ेद पोश में है जो,
झूट  और फरेब  से  ही  बने है  वो .
दिन के उजाले में हो या रात के अँधेरे में,
दीमक बन के देश को चाटते आरहे है वो.
बरसो तक देश को गुमराह करने वाले
 विकाश की बातें कर रहे है वो .
देश को अपनी जागीर समझते है,
सत्ता सुख के लिए ही जीते है वो .
खुद को देश का सेवक कहते है,
परदे के पीछे न जाने क्या-क्या करते है वो.
2g 3g ,न न प्रकार के घोटाले करते है,
ठिकरा किसी और के सर पे फोड़ते है वो .
धर्म के तराजू में सब को तोलते है,
जाति-मजहब के नाम पे बाटने का ,
खेल -खेला करते है वो .
वोट के लिए कभी-कभी हिन्दुओं का,
वरना मुसलमानो का ही नुमाइंदा,
कहलवाना पसंद करते है वो.
हमसे मिले तो मिश्रा जी राम -राम ,
मौलवी जी के घर बिरियानी भी,
 खाकर आते है वो .
मंदिर गेरुया वस्त्र पहन कर जाते है,
मस्जिद में चादर चढ़ा कर भी आते है वो .
राम को मिथ कहने वाले 
राम भक्त बनके घूमते है वो .
गरीबो का खून चूसने वाले,
गरीबो का मसीहा बने फिरते है वो .

4...कविता.....


चलता रहा है चलता रहेगा,
ये खेल यूँ ही चलता रहेगा.
क़यामत की भीड़ है ,
भीड़ में कब तक तू चलता रहेगा.
चल सके तो अकेला ही चल ,
रह-गुजर-बसर अकेला ही कर ,
जिंदगी सफर है,कोई न दे साथ ,
तो भी अकेला ही चलना पड़ेगा.
अँधेरा है तो अँधेरे में ही चलना पड़ेगा ,
अंधेरे में ही जिंदगी को टटोलते हुए
आगे बढ़ते रहना पड़ेगा .
न उम्मीद है तो नाउम्मीदी में भी ,
आगे बढ़ते रहना पड़ेगा ,
जिंदगी है सफर है जिन्दा रहना है ,
तो चलना ही पड़ेगा .
न काम कोशिशे होगी तू नहीं,
खामोसी से अपनी मंजिल की ,
तरफ कदम  ताल  बढ़ता चल.
राह की दुस्वारियों से सबक लेते हुए
रुक -रुक कर ही सही आगे बढ़ता चल .
ये सफर नहीं जिंदगी का इतना आसान ,
 घट-घट पे लेगी तेरा इंतहान.
गिर गया तो फिर कभी न उठ सकेगा,
आसान नहीं ढूढ़ना यहाँ अपनी पहचान .
टूट के बिखर गया तो फिर कही न मिलेगा,
तेरा कदमो के निशान...


 5...कविता.....
1-मै भी जिंदा हूँ मुझे भी जीने का हक़ दो ,
अमीर-अमीर कब तक रहेगा ,
गरीब-गरीबी में कब तक मरेगा ,
लोक -लाज मर्यादा की आड़ में ,
कब तक अमीरो के जुल्म सहेगा,
समाज की इन बेड़ियों से अब मुझे,
आजाद होने दो .
2-गरीबी की जंजीरो से जकड़े मेरे पाँव,
कब खोलोगे -हा बोलो तुमसे ही कहता हूँ,
सदियों की गुलामी से कब मुझे आजाद करोगे,
कब तक तुम महलो में हम झोपड़ में रहेंगे ,
कब तक तुम दूध-मलाई हम बासी रोटी खाएंगे .
3-तुम्हारे अधिकार-अधिकार हमारे क्या कोई अधिकार नहीं ,
क्या हम इंसान- इंसान नहीं ,
अपने अधिकारों के लिए तो फन फैलाये खड़े होजाते हो,
हम करे तो सटराग अलापते हो ,
हमारी मेहनत पर अपना अधिकार जमाते हो,
काम निकलने पर हमी को आँख दिखाते हो ,
तुम्हारे अधिकार -अधिकार ,हमारे अधिकार -अधिकार नहीं ..
4-तुम्हारे अत्याचारों को हम कब तक सहते जायेंगे ,
उठी हुंकार जो सिने में ज्वालामुखी बन फट जायेंगे,
फिर हमी हम रहेंगे तुम कही नहीं रह जाओगे ,
एक नए युग का आगाज हम फिर करेंगे .
   6...कविता.....
1-
वो बात नहीं जो पहले थी,
जो है उनमे वो बात नही ,
अब वो कांटे नहीं जो चुभ सके,
जो बचे है उन्हें कोई अकेला ही ,
साफ कर रहा हो जैसे.
2-

कही दूर रौशनी की एक किरण दिख रही है,
युग प्रवर्तक बन युग परिवर्तन करने,
कर्त्तव्यचुत हो कंटकाकीर्ण पथ पर,
कोई अकेले ही चल रहा हो जैसे .
3-

दुर्भेद्य को धेय कर दुर्गम पथ ,
आप प्रशस्त करते हुए ,
दुर्दम्य सहस को कोई अकेला ही,
निस्तेज कर रहा हो जैसे .
4-राह की गंदगी को खिंचते हुए ,
अतीत की काली परछाइयों को,
समेटते हुए कोई अकेला ही ,
चला जा रहा हो जैसे.
5-
शूलपाणि बन सूल से अभ्र को भेदते हुए,
सूरज के सप्तरथ पे बैठ ,
सूरज की किरणों को साथ ले,
कोई धरती पर अकेला ही दौड़ा,
चला आ रहा हो जैसे.





7...कविता.....


तिनका -तिनका  जोड़  के  अपनी  कस्ती  बनाता जाऊँ ,
चीर   सीना  सागर  का  आगे   बढ़ता  जाऊँ.
सारंग सामान उठती सिंधु लहरियाँ से भी  घबराऊँ ,
तुफानो  में भी अपनी  कस्ती  लहराऊँ.
सागर  की  गहराई  से मोती  चुन  कर लाऊँ ,
अपनी छतरी हिम -किरीट से भी ऊपर लहराऊँ.
दुर्गम  पथ  , प्रभंजन  से भरा    सफर, 
फिर  भी चलता  जायूँ  -चलता  जाऊँ .
तिनका-तिनका अलग हो जाऊँ,मिट्टी-पानी में मिल जाऊँ,
लहू  से  उत्कष की  नयी  परिभाषा  गढ़ता  जाऊँ.
8...कविता.....

तोय निर्मल -सी उज्जवल ,उर उतरत जाय       
हेन सुभ्र भासिते ,अंग-अंग दमकत जाय ॥
अमिय-पियूष सी रसभरी,मद छलकाती जाय       
कर कमल सामना,कोकिल कूकत जाय
बल्लारी-सी देह कमानी,वात चलत लचकत जाय ।      
चारु तनु की स्वामिनी ,ओज चंद्र-सा भाय ॥
अतुल-अनोखा रूप धरि,अभ्र सामाना उड़त जाय       
व्योम उदंड-सी गर्जत,दीप्त-प्रभा चमकाय   

9...कविता.....
चलो उठो बढ़ते चलो ,
हौसले बुलंद करते चलो .
हर हो या जीत हो , 
अपनी राह चलते चलो .
चलो उठो लहू में उबाल भरो
वक़्त जाया करो.
ये जीवन अनमोल है, 
वक़्त रहते ही काम पूरा करो .
वक़्त का नमाजी बन सेहेर की
पहली किरण संग, आगे बढ़ते चलो.
राह की हर मुश्किलों को तुम ,
अपने  हौसले से पस्त करते चलो .
तिमिर के अंधकार को अपने अंदर  
की आग से रौशन करते चलो .
हौसले को पंख मिले सही,
गिरते -पड़ते ही सही आगे बढ़ते चलो .


HINDI POETRY LINK -
http://swargvibha.in/forums/viewtopic.php?f=2&t=66475&sid=cd590682ce8d94595a1104d9f992cdd9 

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मै भी जिंदा हूँ..

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