सोमवार, 30 अप्रैल 2018

साइंस जमाना

साइंस केर जमाना!!!

जब से बगरा या दुनिया मा साइंस केर जमाना,
दया धरम मर्यादा न जानै,होइ गई कहाँ रवाना.

धर्म कर्म सब सुनिवे अबै ,राजनीती का जमाना,
झूट अउर अन्याय का मनाई,माने दूध बताशा.

सब विभागन मा झूठ बगरीगै अउर घूसखोरी,
सीखलिहिंन सब कोउ भरे का आपन  झोरी.

लड़िका बाप के कहाँ न मानै,महतारी का गरियामै,
आज कल के पूतऊ सास के,पकड़ी के कान उखारै.

साइंस के एमा दोख नाही बेलकुल एको जगा , 
कौन मनाई का साइंस कहै तू नंगा बागा.

कह मिश्रा बंधू मनाई है अब पशुआ के नाई,
अपने हाँथ दिनिस आपन धरम गवाईस.

मंगलवार, 24 अप्रैल 2018

जुम्मा-जुम्मा चार दिन जवानी के,modern-trand-ka-jamanahasya-kavita

1-

जुम्मा -जुम्मा चार दिन जवानी के

यही दिन है खुदा की मेहरबानी के,
खुदा की मेहरबानी से यही दिन है, 
जिंदगी के सारे  मजे लेने के .
शादी-ब्याह के चक्कर में क्यों पड़ना.
बिना शादी के ही शादी के मजे लेना .
दुनिया का तो काम ही है कहना, 
मेरी मानो सलमान खान को ही फॉलो करना .

2-
मॉडर्न ट्रेंड का जब से आया  जमाना ,
चड्डी को बिकनी कहता है जमाना .
बिकनी देख कर कहता ये जमाना,
बिकनी में जो तुम दिखती हो,
उसका क्या है कहना.
उम्र है ये जवानी की,
क्या छिपाना क्या दिखाना ,
ज़माने का तो काम है कहना,
उससे अपने को क्या लेना.
मेरी मनो बिकनी पहन कर ही कॉलेज  जाना.
3-
साड़ी- ब्लाउज का  फ़ैशन पुराना .
जींस -टॉप का आया नया जमाना .
लाज-शरम सब धोकर पीजाना .
जिंश -टॉप पहन कर खूब इतराना.
 उम्र कितनी भी हो 16 ही  बताना.
ऊँची हील की सैंडल पहन कर,
मटक -मटक के फिर तुम चलना .
मेरी मनो जीनस-टॉप पहन कर ही मार्केट जाना .
4-
देशी बीबी विदेशी ढंग .
मॉडर्न ट्रेंड का है ये रंग. 
खाना बनाने में बीबी का bp बढे.
बाहर के खाने में कोलेस्ट्रॉल बढे.
हफ्ते में ६ दिन तो बीबी डाइट से रहे.
अजीब कसम-कश में है पतिदेव.
करे तो आखिर क्या करे .
सुबह से साम तक नौकरी करे .
साम को बीबी की धौस भी सहे.
मेरी मानो पिज़्ज़ा-बर्गर ,
ऑर्डर कर के मगवा लेना.

5-
मोबाइल -लैपटॉप का है, जमाना दीवाना .
न्यू इंडिया है, डिजिटल इंडिया का है सपना.
पढ़ने लिखने के चक्कर में मत पड़ना .
नौकरी का नहीं है कोई ठिकाना .
ऑनलाइन चैटिंग का है ये जमाना.
मेरी मनो फेसबुक,वाट्स अप में,
ही टाइम पास करना .

5-
मोबाइल,कम्प्यूटर का है जमाना दीवाना,
ऑनलाइन का जब से आया ये जमाना.
सुबह-साम सब को बस एक ही काम करना,
फेसबुक और व्हाट्स अप में चैटिंग करना.
i  love you तो अब लोफर होगया,
जिसे देखो उसे i love you है कहता.
फेस बुक प्रोफाइल में अब तो हर ,
कोई सलमान खान  है लगता.
चैटिंग से ही सेटिंग  करता ,
बीबी फेस बुक में ही बुक करता.
मुँह दिखाई की रस्म भी,
 अब तो ऑनलाइन ही करता .

रविवार, 22 अप्रैल 2018

मिडिल पास नाती बघेली कविता


            बघेली कविता

बघेली ,अवधी की उप बोली है,जो विन्धय छेत्र में बोली जाती है और अवधी तुलसी दास की भाषा है .बघेली बोलने का लहजा भोजपुरी से मिलता-जुलता है.
उम्मीद है पसंद आएगी...


        ..मिडिल पास नाती..

जात रहेन बागै एक दिन सौंहै पकड़े ढर्रा.
जब कम होइगा घाम जेठ के कर्रा.
घाम जेठ के कर्रा हम बंधे मुड़े मुड़इठा.
छोरे-छोर बढ़े जाई हाँथ मा लिहे डंडा.   
अतने मा देखींन हमका रामसजीमन काकू.  
बइठे रहेंउ अपने चौरामा बनवत चून तमाखू.
खड़े खड़े ओहिनठे उनकर नाती धूर उड़ाबै.
अपने नाती के ऊँ हमसे लागें हाल बताबै.
जबसे पढ़ै के खातिर ईया आपन नाव लिखाइस.
पढ़ै लिखयमा भास न भद्रा ईया हमका बिकबाइस.
पढ़तमाहि कपार फाटय,दिन भर खेलय का दउडै .
पढै का कही देइ ता हमहिंन का चाबय दउडै .
काहाल बताई बेटा एकर एका चढ़ी है खूब चर्बी .
खरखर ईया लड़िका से बनै न सौ तक गिनती.
सोचन तै की मिडिल भरे मा मति एकर कुछ फैली.
चाल चलन बेउहार कुशलता के सिखलाई या सैली.
चौथा भर हम पढ़े रहन तै,ऊंच नीच सब जानी.
जेकर जइसन रिस्ता नाता ओका ओइसन मानी.
कसके मिडिल पास होइगा एकर हाल ता देखा.
हमरेव पांच के नयी ऐसे बनै न हिसाब लेखा.
खाय भरे का कही दे सब नीक-नीक चाही.
खाई के फेर दिन भर एकई-ओकई दौड़ी. 
खाय भरे का आवत घर मा बगत है दिन भर आवारा.
दिनभरे मा लैके आवय न एक बछियो भरे का चारा .
चुप्पे घुसी के खाै लेत है,बगत है दिनभर छोरे चुंदी.
अपने हाँथ से दिनिहिस न कबहुँ गोरुअन के सरफुंदी. 
मानत होइ मन माही की हम नीक नौकरी पाउब.
मिलिहि नौकर चाकर हमका भारी मउज उड़ाउब .
कह "मिश्रा"बी.ए,म.बी.ए पास मिलै न चौकीदारी.
तोहरे नाती का काका कैसे मिलेगी जागा सरकारी .
सेतिन दर्जा केर तरक्की है आजकाल मिलती.
इहेमेंके लड़िका कहत फिरैं नौकरी कहाँ मिलती.

हर व्यक्ति को अपना काम कठिन और रोचक लगता है, लेकिन हिंदी की सभी विधाओं में लेखन का कार्य करता हूँ ,इसलिए मेरा  अनुभव तो यही करता है ,भावपूर्ण कविता लिखना मुश्किल और समय भी ज्यादा लगता है .कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर दे ...
     

गुरुवार, 19 अप्रैल 2018

कविता ये जीवन तो एक खेल है


                                         कविता


स्वयं को जीवन के आखरी दौर में रख कर जो अनुभव किया ,
वही इस कविता के माध्यम से कहने की कोशिस है .
कविता lyrical way पर है उसी way में पढ़े तो ज्यादा आनंद ले पाएंगे...


ये जीवन तो एक खेल है
जिसे  हम  नहीं खेलता कोई और  है

जीवन झूठा ,एक कोरा कागज 
कोरा ही रह जायेगा
 
जीवन रूपी  माटी  का पुतला
माटी में ही  मिल जायेगा

एक चादर ओढ़े चार कंधो में लदा
 इस दुनिया से चला जायेगा

तोड़ देगा वो हमारे सारे सपने
जब उसका मन हमसे भर जायेगा

करा-धरा सब यही रह जायेगा...

इस जीवन में क्या खोया क्या पाया
बुढ़ापा जब आया,जीवन में,ठहराव आया 

पीछे की दुनिया में अब मै लौट आया 
 बचपन,खेल-खेल में,जवानी, हसते गाते

मौज उड़ाते गुजर गई
बचपन में माँ की गोदी ही जन्नत लगती

माँ की लोरी ,माँ की थपकी
से ही आँखों में निदिया आती

थोड़ा बड़ा हुआ जब माँ का पल्लू
पकडे दिनभर पीछे-पीछे चलता

ओझल हो जाये माँ तो रो-रो के
घर सर पे उठा लेता
खेल खिलौनों को ही सब  कुछ समझा

माटी  के खिलौने में भी जीवन दिखता 
खेल -खेल में ही बचपन गुजरा



ये जीवन तो एक खेल है
जिसे  हम नहीं खेलता कोई और  है

ये जीवन झूठा ,एक कोरा कागज 
कोरा ही रह जायेगा


जीवन रूपी  माटी  का पुतला
माटी में ही  मिल जायेगा

एक चादर ओढ़े चार कंधो में लदा
 इस दुनिया से चला जायेगा

तोड़ देगा वो हमारे सारे सपने
जब उसका मन हमसे भर जायेगा
करा-धरा सब यही रह जायेगा... 


बचपन गया जवानी आई 
अवचेतन मन चेतन हो  गया 

जीवन ने एक नया आकर ले लिया
गीली मिट्टी सुखी मिट्टी में बदल गई

कॉपी-किताब में ही जीवन सिमट गया
आधी जवानी पढ़ाई-लिखाई में ही गुजरी

फिर धूप-छाव का खेल सुरु हो गया
रोजी-रोटी की खातिर खाक छानता फिरता

खुद के लिए जीने का जब  मौका आया
तो  बीबी घर ले आया 

देखते-देखते बच्चे भी हो गये 
सपने अधूरे थे,अधूरे ही रह गये

जिंदगी को कही पीछे ही छोड़ आया
बीबी-बच्चो के सपने ही अपने होगये

आधी-अधूरी जिंदगी को साथ
लेकर ही आगे बढ़ता रहा 

अपनी-दुनिया अपनी अब कहाँ रही
ज़माने की भीड़ में ही कही खोगई

माँ-बाप की तो सुध भी न रही 
रह रह के आज उनकी याद आती रही

जिंदगी जीने में एक अरसा लग गया
जिंदगी का फलसफा आज 
चंद मिंटो में ही सिमट के रह गया...

ये जीवन तो एक खेल है
जिसे  हम  नहीं खेलता कोई और  है

ये जीवन झूठा ,एक कोरा कागज 
कोरा ही रह जायेगा

जीवन रूपी  माटी  का पुतला
माटी में ही  मिल जायेगा

एक चादर ओढ़े चार कंधो में लदा
 इस दुनिया से चला जायेगा

तोड़ देगा वो हमारे सारे सपने
जब उसका मन हमसे भर जायेगा
करा-धरा सब यही रह जायेगा... 

                                                          ~धर्मेंद्र मिश्रा~

  

सोमवार, 2 अप्रैल 2018

हिंदी कविता

   चुप-चाप खामोश से क्यों बैठे हो?  

जीवन में एक नया उमंग जोश और उत्साह से भर देने वाली कविता ...



"चुप-चाप खामोश से क्यों बैठे हो
ऊपर आसमानो में क्या देखते हो

दीपक बुझा के उम्मीदों का क्या ढूढ़ते हो
योँ आँखों में पानी भर के क्यों बैठे हो

मन कहता है तुम हार गये हो
इसमें क्या नहीं बात कहते हो 

हारा  कौन नहीं इस जग में 
तुम अकेले नहीं इस जग में 

ये हार नहीं सीख है जीवन की
आस है सांस है जब तक जीवन की

तुम अपने अंदर झांक कर देखो
दिन है तो सूरज की तरफ देखो 

रात है तो चाँद की तरफ देखो 
इनसे अब तुम कुछ सीखो 

तेज है कितना सूरज में 
रौशन है ये जग सूरज से 

उसको भी ये मालूम नहीं 
जग का कोई कोना बचा नहीं

वो सक्ति मिली है तुमको
उस सक्ति को तुम पहचानो

तप जाने पर ही रौशन होंगे
पहले स्वयं जलना सीखो 



चुप-चाप खामोश से क्यों बैठे हो
ऊपर आसमानो में क्या देखते हो ...

बुझ जाये उम्मीदों का सूरज तो
चाँद से भी तुम कुछ सीखो 

चाँद की रौशनी में सीतलता है 
जो मन को ठंडक पहुँचता है  

धीरे -धीरे है चलता रहता 
राही को है राह दिखाता 

तिमिर हटाता जाता
पथ प्रशस्त करता जाता

ये जग सारा रौशन चाँद और सूरज से
लेते नहीं फिर भी कुछ इस जग से


जीवन को तुम सत्य से जानो 
किस अर्थ जन्मे पहले ये जानो 



निष्काम भाव से अब अपना कर्म करो
कर्म फल की इच्छा तुम क्यों करते हो 


कर्म करने के ही अधिकारी हो
कर्तव्य पथ पे तुम अडिग रहो

दुस्तर से दुस्तर कार्य भी तुम अब कर जाओ
दुर्लभ उपलच्छ भी हासिल है अब तुम उठ जाओ


चुप-चाप खामोश से क्यों बैठे हो
ऊपर आसमानो में क्या देखते हो ...

                                               ~धर्मेंद्र मिश्रा

रविवार, 1 अप्रैल 2018

धर्म-युद्ध छिड़ा है बंगाल में,कविता


धर्म-युद्ध छिड़ा है बंगाल में,कविता



धर्म-युद्ध छिड़ा है बंगाल में,
नरभछी फिर जाग उठे ,
छुद्र रक्त इनका पानी करने ,
कौन-कौन जायेगा बंगाल... 

अमन की बाते करने वालो ,
ये नरभछी अब रहम के काबिल नहीं ...
ये वही नरभछी की औलादे है ,
जिसने तुम्हारे पुरखो का रक्त बहाया था ..
मर-मिटे तुम्हारे पुरखे,
इन बुजदिलो से कभी डरे नहीं...

सहीद होगये,मगर सर झुकाया नहीं .
.रक्त से सींचा था इस धरा को,
तब जाके तुम  चैन से सोपाते  हो .
याद कर अब तू उनको,
रक्त में अपने उबाल भर  .
समय नहीं ये सोचने का  ...देर न कर तू ..

नहीं फिर तू .. पछतायेगा .उठ.. अब तू खड़ा होजा .. ?
 अब न उठा तो ,तू ... नपुंसक कहलायेगा...
क्या तू नपुंसक  कहलायेगा ?
क्या तू इस तोहमत के साथ जी पायेगा?
 आने वाली पीढ़ी को सच बता पायेगा ?
नहीं तो ..सुनी माँगे,दर्द से बिलखते
बच्चे ,बूढ़े ,और जवान ,बहते हिंदूंओ के,
रक्त का कतरा-कतरा ,तुमसे कहता है,
कौन -कौन इन नरभछियों का 
सर- कलम करने आएगा बंगाल...
आएगा बंगाल....?