1...कविता.....
भटका हूँ न जाने किस सफर का मुसाफिर हूँ .
अजनबी हूँ दो रोटी कमाने सहर आगया हूँ .
काम की तलाश में सहर
भर की खाक
छानता हूँ .
जो काम मिले बिना लाग्-लपेट करता हूँ .
लोगो की दो -चार धौस
भी सहता हूँ .
रोटी -दो रोटी खाकर
कभी-इधर तो कभी उधर कैसे भी
मुफ़लसी में ही गुजरा
करलेता
हूँ .
धन नाते और कुछ नहीं एक पोटरी
जो हर दम साथ लेकर
चलता हूँ .
चोर -उचक्कों के दर
से
अपनी पोटरी
सिने से लगा के रखता हूँ .
पोटरी में ज्यादा कुछ
नहीं
दो जोड़ी लत्ते एक ढेला
गुड़ रखता हूँ .
माँ कहती थी...
या जीवन मा तन ही है आपन सहाय
रोटी चाहे न मिले रोज बिहन्ने
गुड़ाई के साथे पानी पीजिये .
घर भितरे आप मर्जी
बहिरे बन -ठन के ही
निकलिये.
कलयुगी इस दुनिया में
आपन -पराया कोनो भेद
नाही
सबहि सम समझिये.
रोबहि भितरे
अपन पीड़ा बहिरे केहू से न कहिये .
जेहि विधि राखे राम
ताहि विधि रहिये .
विधि -विधान जान लाभ-हानि सबहि
प्रभुकृपा समझिये .
तिनका सा ये जीवन कबहु न कोऊ से बैर कीजिये .
जेहि बिधि मिले जो सबहि से राम -राम कहिये .
समझ-समझ का फेर है .
ईस्वर भी न हो साथ तभी साथ माँ होती है .
जग बैरी हो जाए माँ कभी बैरी नहीं होती है .
माँ ही है जो अपने लिए नहीं मेरे लिए जीती है .
मुझे तो माँ में ही
ईस्वर नजर आता है .
माँ की महिमा अब और न कही जाती है.
आज कोई नहीं है साथ
,
अहजान से भरा ये सफर
कही दूर खुद में भी मयासर नहीं
सिर्फ माँ याद आती है .
माँ की कही इन बातो को याद
कर मन भर आता है .
भला कौन है इस जग
में
जो ऐसी बात सिखाता है .
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1...कविता.....
प्रेम सूछम
अन्तःमन की
मनोस्थिति है
प्रेम जीवन है जीवन का मान है .
प्रेम भक्ति है ,वात्सल्य है ,करुणा है ,
प्रेम ही जीवन का श्रृंगार है .
प्रेम आश्रय है,तो कभी आलम्बन है ,
प्रेम मर्म है, प्रेम ही जीवन का सार है .
प्रेम मनोभाव की अंजलि है ,
प्रेम सूरज की छिटकी रौशनी है ,
प्रेम ही चन्द्रमा की सीतलता है .
प्रेम राग है ,विराग है ,अमृतरस की धार है,
प्रेम ही जीवन का अनुराग है .
प्रेम संयोग है तो कभी वियोग है .
प्रेम कभी आशा है तो कभी निराशा है .
प्रेम से ही जीवन ,जीवन ही प्रेम है .
प्रेम जीवन है जीवन का मान है .
प्रेम भक्ति है ,वात्सल्य है ,करुणा है ,
प्रेम ही जीवन का श्रृंगार है .
प्रेम आश्रय है,तो कभी आलम्बन है ,
प्रेम मर्म है, प्रेम ही जीवन का सार है .
प्रेम मनोभाव की अंजलि है ,
प्रेम सूरज की छिटकी रौशनी है ,
प्रेम ही चन्द्रमा की सीतलता है .
प्रेम राग है ,विराग है ,अमृतरस की धार है,
प्रेम ही जीवन का अनुराग है .
प्रेम संयोग है तो कभी वियोग है .
प्रेम कभी आशा है तो कभी निराशा है .
प्रेम से ही जीवन ,जीवन ही प्रेम है .
1...कविता.....
बैठा था चुप चाप सा औचक ही कुछ याद आया.
याद कर उसे न जाने
क्यों रोना आया .
भूल गया था जिसको आज फिर वो याद आया .
कौन था वो अपना जिसे पीछे छोड़ आया.
हर वक्त दिल के
करीब रहता था .
मै कुछ न बोलू फिर भी दिल की बात
फट से समझ लेता था
.
दिन हो या रात हर वक़्त साथ रहता था .
कोई न हो साथ तो वो ही रहता था .
दिल के खालीपन को वो ही भरता था .
आज फिर मुझसे मिलने आया है वो.
इस भाग–दौड़ की दुनिया में क्यों भूल
गया मैं उसको क्या आज अकेला हूँ
,
इसलिए याद आया है
वो .
हमसाया है वो मेरा ,
आज अकेला हूँ इसलिए फिर याद आया है वो .
2...कविता.....
रूठी है जिंदगी मेरी कैसे कहुँ,
मुझे मनाना नहीं आता.
रो-रो के जीना मुहाल है कैसे कहूँ
अब रोना नहीं आता.
टूट के बिखर गया हूँ अंदर से कैसे कहूं ,
अब जुड़ना नहीं आता .
मीत मिले तो मिले किसी से कैसे
मुझे तो जीना ही नहीं आता .
अपना कहूँ तो कहूं किसे ,
अब कोई पास नहीं आता .
जीयूं तो जीयूं कैसे ये जिंदगी ,
जीने में अब मजा नहीं आता .
3...कविता.....
प्रेम सूछम अन्तःमन की मनोस्थिति है
प्रेम जीवन है जीवन का मान है .
प्रेम भक्ति है ,वात्सल्य है ,करुणा है ,
प्रेम ही जीवन का श्रृंगार है .
प्रेम आश्रय है,तो कभी आलम्बन है ,
प्रेम मर्म है, प्रेम ही जीवन का सार है .
प्रेम मनोभाव की अंजलि है ,
प्रेम सूरज की छिटकी रौशनी है ,
प्रेम ही चन्द्रमा की सीतलता है .
प्रेम राग है ,विराग है ,अमृतरस की धार है,
प्रेम ही जीवन का अनुराग है .
प्रेम संयोग है तो कभी वियोग है .
प्रेम कभी आशा है तो कभी निराशा है .
प्रेम से ही जीवन ,जीवन ही प्रेम है .
3...कविता.....3...कविता.....
प्रेम सूछम अन्तःमन की मनोस्थिति है
प्रेम जीवन है जीवन का मान है .
प्रेम भक्ति है ,वात्सल्य है ,करुणा है ,
प्रेम ही जीवन का श्रृंगार है .
प्रेम आश्रय है,तो कभी आलम्बन है ,
प्रेम मर्म है, प्रेम ही जीवन का सार है .
प्रेम मनोभाव की अंजलि है ,
प्रेम सूरज की छिटकी रौशनी है ,
प्रेम ही चन्द्रमा की सीतलता है .
प्रेम राग है ,विराग है ,अमृतरस की धार है,
प्रेम ही जीवन का अनुराग है .
प्रेम संयोग है तो कभी वियोग है .
प्रेम कभी आशा है तो कभी निराशा है .
प्रेम से ही जीवन ,जीवन ही प्रेम है .
नकाब पोश है सफ़ेद पोश में है जो,
झूट और फरेब
से ही बने है
वो .
दिन के उजाले में हो या रात
के अँधेरे में,
दीमक बन के देश को चाटते आरहे
है वो.
बरसो तक देश को गुमराह करने
वाले
विकाश की बातें कर रहे है वो .
देश को अपनी जागीर समझते है,
सत्ता सुख के लिए ही जीते है
वो .
खुद को देश का सेवक कहते है,
परदे के पीछे न जाने क्या-क्या
करते है वो.
2g 3g ,न न प्रकार के घोटाले
करते है,
ठिकरा किसी और के सर पे फोड़ते
है वो .
धर्म के तराजू में सब को तोलते
है,
जाति-मजहब के नाम पे बाटने
का ,
खेल -खेला करते है वो .
वोट के लिए कभी-कभी हिन्दुओं
का,
वरना मुसलमानो का ही नुमाइंदा,
कहलवाना पसंद करते है वो.
हमसे मिले तो मिश्रा जी राम
-राम ,
मौलवी जी के घर बिरियानी भी,
खाकर आते है वो .
मंदिर गेरुया वस्त्र पहन
कर जाते है,
मस्जिद में चादर चढ़ा कर भी
आते है वो .
राम को मिथ कहने वाले
राम भक्त बनके घूमते है वो
.
गरीबो का खून चूसने वाले,
गरीबो का मसीहा बने फिरते है
वो .
4...कविता.....
चलता रहा है चलता रहेगा,
ये खेल यूँ ही चलता रहेगा.
क़यामत की भीड़ है ,
भीड़ में कब तक तू चलता रहेगा.
चल सके तो अकेला ही चल ,
रह-गुजर-बसर अकेला ही कर ,
जिंदगी सफर है,कोई न दे साथ
,
तो भी अकेला ही चलना पड़ेगा.
अँधेरा है तो अँधेरे में ही
चलना पड़ेगा ,
अंधेरे में ही जिंदगी को टटोलते
हुए
आगे बढ़ते रहना पड़ेगा .
न उम्मीद है तो नाउम्मीदी में
भी ,
आगे बढ़ते रहना पड़ेगा ,
जिंदगी है सफर है जिन्दा रहना
है ,
तो चलना ही पड़ेगा .
न काम कोशिशे होगी तू नहीं,
खामोसी से अपनी मंजिल की ,
तरफ कदम ताल बढ़ता
चल.
राह की दुस्वारियों से सबक
लेते हुए
रुक -रुक कर ही सही आगे बढ़ता
चल .
ये सफर नहीं जिंदगी का इतना आसान
,
घट-घट पे लेगी तेरा इंतहान.
गिर गया तो फिर कभी न उठ सकेगा,
आसान नहीं ढूढ़ना यहाँ अपनी
पहचान .
टूट के बिखर गया तो फिर कही
न मिलेगा,
तेरा कदमो के निशान...
5...कविता.....
1-मै भी जिंदा हूँ मुझे भी
जीने का हक़ दो ,
अमीर-अमीर कब तक रहेगा ,
गरीब-गरीबी में कब तक मरेगा
,
लोक -लाज मर्यादा की आड़ में
,
कब तक अमीरो के जुल्म सहेगा,
समाज की इन बेड़ियों से अब मुझे,
आजाद होने दो .
2-गरीबी की जंजीरो से जकड़े
मेरे पाँव,
कब खोलोगे -हा बोलो तुमसे ही
कहता हूँ,
सदियों की गुलामी से कब मुझे
आजाद करोगे,
कब तक तुम महलो में हम झोपड़
में रहेंगे ,
कब तक तुम दूध-मलाई हम बासी
रोटी खाएंगे .
3-तुम्हारे अधिकार-अधिकार हमारे
क्या कोई अधिकार नहीं ,
क्या हम इंसान- इंसान नहीं
,
अपने अधिकारों के लिए तो फन
फैलाये खड़े होजाते हो,
हम करे तो सटराग अलापते हो
,
हमारी मेहनत पर अपना अधिकार
जमाते हो,
काम निकलने पर हमी को आँख दिखाते
हो ,
तुम्हारे अधिकार -अधिकार ,हमारे
अधिकार -अधिकार नहीं ..
4-तुम्हारे अत्याचारों को हम
कब तक सहते जायेंगे ,
उठी हुंकार जो सिने में ज्वालामुखी
बन फट जायेंगे,
फिर हमी हम रहेंगे तुम कही
नहीं रह जाओगे ,
एक नए युग का आगाज हम फिर करेंगे
.
6...कविता.....1-
वो बात नहीं जो पहले थी,
जो है उनमे वो बात नही ,
अब वो कांटे नहीं जो चुभ सके,
जो बचे है उन्हें कोई अकेला ही ,
साफ कर रहा हो जैसे.
2-
कही दूर रौशनी की एक किरण दिख रही है,
युग प्रवर्तक बन युग परिवर्तन करने,
कर्त्तव्यचुत हो कंटकाकीर्ण पथ पर,
कोई अकेले ही चल रहा हो जैसे .
3-
दुर्भेद्य को धेय कर दुर्गम पथ ,
आप प्रशस्त करते हुए ,
दुर्दम्य सहस को कोई अकेला ही,
निस्तेज कर रहा हो जैसे .
4-राह की गंदगी को खिंचते हुए ,
अतीत की काली परछाइयों को,
समेटते हुए कोई अकेला ही ,
चला जा रहा हो जैसे.
5-
शूलपाणि बन सूल से अभ्र को भेदते हुए,
सूरज के सप्तरथ पे बैठ ,
सूरज की किरणों को साथ ले,
कोई धरती पर अकेला ही दौड़ा,
चला आ रहा हो जैसे.
7...कविता.....
तिनका -तिनका जोड़ के अपनी कस्ती बनाता
जाऊँ ,
चीर सीना सागर का आगे बढ़ता जाऊँ.
सारंग सामान उठती सिंधु
लहरियाँ से भी न
घबराऊँ ,
तुफानो में
भी अपनी कस्ती लहराऊँ.
सागर की गहराई से
मोती चुन कर
लाऊँ ,
अपनी छतरी हिम
-किरीट से भी
ऊपर लहराऊँ.
दुर्गम पथ , प्रभंजन से
भरा सफर,
फिर भी
चलता जायूँ -चलता जाऊँ
.
तिनका-तिनका अलग
हो जाऊँ,मिट्टी-पानी में मिल जाऊँ,
लहू
से उत्कष
की नयी परिभाषा गढ़ता जाऊँ.
8...कविता.....
तोय निर्मल -सी उज्जवल
,उर उतरत जाय
।
हेन सुभ्र भासिते ,अंग-अंग दमकत
जाय ॥
अमिय-पियूष सी रसभरी,मद छलकाती
जाय ।
कर कमल सामना,कोकिल कूकत जाय
॥
बल्लारी-सी देह
कमानी,वात चलत
लचकत जाय ।
चारु तनु की
स्वामिनी ,ओज चंद्र-सा भाय
॥
अतुल-अनोखा रूप धरि,अभ्र सामाना
उड़त जाय ।
व्योम उदंड-सी
गर्जत,दीप्त-प्रभा
चमकाय ॥
9...कविता.....
चलो उठो बढ़ते
चलो ,
हौसले बुलंद
करते चलो .
हर हो या
जीत हो ,
अपनी
राह चलते चलो
.
चलो उठो लहू
में उबाल भरो,
वक़्त जाया न
करो.
ये जीवन अनमोल
है,
वक़्त रहते
ही काम पूरा
करो .
वक़्त का नमाजी
बन सेहेर की
पहली किरण संग, आगे बढ़ते चलो.
राह की हर
मुश्किलों को तुम
,
अपने हौसले
से पस्त करते
चलो .
तिमिर के अंधकार
को अपने अंदर
की आग से
रौशन करते चलो
.
हौसले को पंख
मिले न सही,
गिरते -पड़ते ही
सही आगे बढ़ते
चलो .
http://swargvibha.in/forums/viewtopic.php?f=2&t=66475&sid=cd590682ce8d94595a1104d9f992cdd9
http://swargvibha.in/forums/viewtopic.php?f=2&t=66451&sid=eb242ac6039881ab3105c226047b04f1
मै भी जिंदा हूँ..
http://swargvibha.in/forums/viewtopic.php?f=2&t=66651&p=116585&sid=622d4cb35d46c756095638d33b9bd88e#p116585
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