अहले -ए -सियासत -ए -हाल-ए-दिल इस तरह बया करता हूँ...
नेताओ का दर्द मेरी जुबानी,
सुनो उनकी दर्द भरी ये कहानी..
जनता मेरी सुनती नहीं ,
ये जो जनता है मेरी सुनती नहीं.
(शेर -नेता की दिल की बात जो कहते नहीं .
दर्द हमें भी होता है मगर हम कहते नहीं .
तुम जो कहते हो इसी लिये हम सुनते नहीं .)
प्रचार-प्रसार भी करते है ,
घर-घर संदेसा भी भिजवाते है.
और तो मोटर-गाड़ी भी भिजवाते है .
जो आते वो भी बिना लिये-दिये आते नहीं,
गनीमत है,वावजूद इसके सब आते नहीं.
जो आते है वो भी कहाँ सुनते है,
सुनके भी अनसुना कर देते है .
(शेर -नेता की दिल की बात जो कहते नहीं .
वक़्त अभी तुम्हारा है, हम पे जितना चाहे सितम ढालो,
तुम भी रोओगे ,ये दौर -ए-मुस्किलो का तो गुजरने दो.)
गाला फाड्-फाड् के तो हम चिल्लाते है ,
वोट हमें नहीं किसी और को दे आते है .
दम निकल जाता है हमारा भाषण दे -दे के ,
फिर भी कहते है लोग हम मेहनत नहीं करते.
(शेर -नेता की दिल की बात जो कहते नहीं ...
गुमान होगा तुम्हे ,हम नहीं तो कोई और तुम्हारी सुनेगा .
आगे कुंआ तो पीछे खायी है ,कोई नहीं है यहाँ तुम्हारा ..)
जनता जो चाहती है वही बाते तो कहते है,
बात तो हम जनता की भले की ही करते है.
काम हम भले ही नहीं करते है .
बाते तो अच्छी-अच्छी करते है .
(शेर -नेता की दिल की बात जो कहते नहीं .
अपने मतलब की बात तो तुम भी करते हो,
बेईमान तुम भी हो,हमें दोष क्यों देते हो?)
कह "मिश्रा " वोट लेने की बारी आती है,
तो नेता जी को जनता की याद आती है.
५ साल तक "नेता जी चैन की बंशी बजाते है,
चुनाव में मुँह दिखाई की रस्म निभाने आते है..
(शेर -नेता की दिल की बात जो कहते नहीं .
(देख लो ये चेहरा ,बार -बार हम तुम्हारे दरवाजे पे नहीं आएंगे,
फकत सत्ता में काबिज होजाऊं, ढूढ़ते फिरोगे,नेताजी कहाँ मिलेंगे.)
इत्तेफाक न हो मेरे अल्फाजो से तो उन्ही से जाके पूंछ लो ..
धर्मेंद्र मिश्रा
लेखक -मेरी सूछ्म अनुभूति,"सब्दारण्य "
नेताओ का दर्द मेरी जुबानी,
सुनो उनकी दर्द भरी ये कहानी..
जनता मेरी सुनती नहीं ,
ये जो जनता है मेरी सुनती नहीं.
(शेर -नेता की दिल की बात जो कहते नहीं .
दर्द हमें भी होता है मगर हम कहते नहीं .
तुम जो कहते हो इसी लिये हम सुनते नहीं .)
प्रचार-प्रसार भी करते है ,
घर-घर संदेसा भी भिजवाते है.
और तो मोटर-गाड़ी भी भिजवाते है .
जो आते वो भी बिना लिये-दिये आते नहीं,
गनीमत है,वावजूद इसके सब आते नहीं.
जो आते है वो भी कहाँ सुनते है,
सुनके भी अनसुना कर देते है .
(शेर -नेता की दिल की बात जो कहते नहीं .
वक़्त अभी तुम्हारा है, हम पे जितना चाहे सितम ढालो,
तुम भी रोओगे ,ये दौर -ए-मुस्किलो का तो गुजरने दो.)
गाला फाड्-फाड् के तो हम चिल्लाते है ,
वोट हमें नहीं किसी और को दे आते है .
दम निकल जाता है हमारा भाषण दे -दे के ,
फिर भी कहते है लोग हम मेहनत नहीं करते.
(शेर -नेता की दिल की बात जो कहते नहीं ...
गुमान होगा तुम्हे ,हम नहीं तो कोई और तुम्हारी सुनेगा .
आगे कुंआ तो पीछे खायी है ,कोई नहीं है यहाँ तुम्हारा ..)
जनता जो चाहती है वही बाते तो कहते है,
बात तो हम जनता की भले की ही करते है.
काम हम भले ही नहीं करते है .
बाते तो अच्छी-अच्छी करते है .
(शेर -नेता की दिल की बात जो कहते नहीं .
अपने मतलब की बात तो तुम भी करते हो,
बेईमान तुम भी हो,हमें दोष क्यों देते हो?)
कह "मिश्रा " वोट लेने की बारी आती है,
तो नेता जी को जनता की याद आती है.
५ साल तक "नेता जी चैन की बंशी बजाते है,
चुनाव में मुँह दिखाई की रस्म निभाने आते है..
(शेर -नेता की दिल की बात जो कहते नहीं .
(देख लो ये चेहरा ,बार -बार हम तुम्हारे दरवाजे पे नहीं आएंगे,
फकत सत्ता में काबिज होजाऊं, ढूढ़ते फिरोगे,नेताजी कहाँ मिलेंगे.)
इत्तेफाक न हो मेरे अल्फाजो से तो उन्ही से जाके पूंछ लो ..
धर्मेंद्र मिश्रा
लेखक -मेरी सूछ्म अनुभूति,"सब्दारण्य "
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