Sex Culture
देह व्यपार की ये सब से मंडी और कही नहीं अपने ही देश के मध्य में इस्थित मध्य प्रदेश में है .मध्य प्रदेश के रतलाम ,मदसौर ,नीमच और बुंदेलखंड रीजन के कुछ छेत्रो में जैसे ग्वालियर ,शिवपुरी ,मुरैना जैसे जिलों के हाइवेज से सटे इलाकों में लगती है .साथ ही देह व्यपार की ये मंडी, इन जिलों से लगे राजस्थान के सीमावर्ती जिलों में भी है .
वैसे तो मंदसौर ,और नीमच अफीम की वजह से प्रदेश में फेमस है और देश का सब से बड़ा अफीम उत्पादक छेत्र भी है . इसके अलावा एक और बजह से मशहूर है , वो वजह है " बछड़ा" और "बेड़िया " समुदाय के लोगो , जिनके लिए वेश्यावृति ही सब कुछ है ,जिस्म बेंच कर पेट पालने में इन्हे कोई संकोच नहीं देह व्यपार सिर्फ पेट पलने के लिए नहीं करते बल्कि परम्परा के नाम पर करते है .
"बछड़ा "और "बेड़िया" समुदाय के लोगो का देश- दुनिया से कोई बासता नहीं .
यहाँ जिस्म कौड़ियों के भाव बिकते है ,महज १००,२०० रुपये में . यहाँ लड़किया पैदा होने पर मातम नहीं ,खुसिया मनाई जाती है . १२ साल से लेकर ३५ साल उम्र तक की औरते जिस्म फरोसी की धंधे में लगी हुई है.
यहाँ बाप बेटी के लिए ,पति पत्नी के लिए ग्राहक ढूढ़ता है और इन्ही पैसो से अपना घर चलते है.यहाँ मर्द काम नहीं करते अपनी बहन और बेटियों के जिस्मफरोसी से जो पैसा मिलता है उन्ही पैसो से नसे में धुत्त रहते है .
इस समुदाय के जादातर मर्द कुंवारे रहते है क्योकि यहाँ पर शादी के लिए लड़की वाले दहेज़ नहीं देते बल्कि लड़के वाले देते है ,जिसकी कीमत चुकाना सब के बस की बात नहीं ,दहेज़ की रकम लाखो में होती है अनुमानतह १० से १५ लाख तक होती है .
अब विस्तार से जानते ,देश के इस कड़वी हकीकत के बारे में .
सब से पहले बात करते है "बछड़ा" समुदाय के लोगो के बारे में ,इस समुदाय के लोग जादातर ,रतलाम ,मंदसौर और नीमच से निकलने वाले highway से सटे आस पास के गावो में रहते है ,ये लोग देह व्यपार का धंधा आज से नहीं कर रहे बल्कि ,कई सदियों से कर रहे है .इस समुदाय के बारे में कहा जाता है की इन्हे अंगेजो द्वारा बसाया गया था .अंग्रेजो ने अपनी पहली सैनिक छावनी मध्य प्रदेश के नीमच में ही बनायीं थी और बाछड़ा समुदाय की औरते अंग्रेज सैनिको की हवस मिटाने का काम करती थी ,और तभी से ये समुदाय इस धंधे में संलिप्त है.
इसके बाद बछड़ा समुदाय नीमच से लगे जिलों में जैसे ,मंदसौर और रतलाम में धीरे -धीरे बसते चले गए .
आज इस समुदाय के तकरीबन पांच सौ से भी ज्यादा परिवार है जो ३५ से भी ज्यादा गावो में फैले हुए है .एक survey के मुताबिक ६००० के आस पास इनकी संख्या है जिसमे तकरीबन तीन हजार महिलाये है
और इन महिलायो में 45 फीसदी महिलाये जिस्मफरोसी का धंधा करती है .
इन महिलायो के बारे कुछ रोचक बाते जानते है ,जैसे की इस समुदाय की महिलायो को दो वर्गो में बाटा गया है .
जो महिलाये शादी कर अपना घर बसाती है,उन्हें" बट्टावाडी" कहते है और जो महिलाये वेश्या वृत्ति करती है उन्हें "खेलवाड़ी" कहते है और ये फैसला इनकी माँ पर निर्भर करता है की कौन सी बेटी की शादी करना है और कौन सी बेटी को वेश्यावृत्ति की धंधे में उतारना है .
हर परिवार की लिए ये जरुरी होता है की कम से काम एक लड़की वेश्यावृत्ति करे, कोई चाह कर भी इस धंधे से खुद को अलग नहीं कर सकता .
एक सामाजिक परंपरा के मुताबिक इनकी कुल देवी जिसे ये लोग " नरीमाता" कहते है ,के सामने सपथ लेना होता है की कौन सी बेटी वेश्यावृत्ति करेगी .
अब बात करते है "बेड़िया" समुदाय के लोगो की -
इस जनजाति की संख्या जादातर ,चम्बल रीजन ,जैसे ग्वालियर ,शिवपुरी,मुरैना ,और राजस्थान में जयपुर से लगे highway के सटे इलाकों में और भरतपुर जिलों में रहती है ."बेड़िया" जनजाति पहले नाचने -गाने का काम करती थी ,लेकिन समय के साथ इनकी रोजी- रोटी का जरिया छीन गया और इनकी मज़बूरी ने वेश्यावृति के पेशे का रूप लेलिया अब इस देह व्यपार के धंधे को परंपरा के नाम पर करते है .
ये लोग "बाछड़ा" समुदाय के लोगो की तरह अपने घर पर देहव्यपार का धंधा नहीं करते बल्कि दूसरे देश में तस्करी कारते है तथा मुंबई जैसे बड़े -बड़े महानगरों में इस समुदाय की औरते धंधा करती है, जिससे इस समुदाय की अच्छी खासी आमदनी हो जाती है .
इस जनजाति की अनुमानित संख्या १७००० के आसपास पास है, जिसमे ८००० महिलाये है और आधे से भी जादा महिलाये देह व्यपार के धंधे में संलिप्त है .
सरकार का रवईया भी इस समुदाय के प्रति उदासीन रहा,इनके पास न तो bpl कार्ड है और न ही इस समुदाय के लोगो को "बेड़िया" जानजाती से होने की वजह से कोई काम देता है .
इनके बच्चो को पढ़ने के लिए स्कूल में दाखिला तक नहीं मिलता ,मिलता भी है तो इन्हे इतना प्रताड़ित किया जाता है की छोड़ने पर मजबूर हो जाते है .
बेड़िया जनजनजाति की बेड़िया कैसे टूटेगी ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा लेकिन
इस देश में एक तरफ जंहा सभ्यता और संस्कृति का विकाश हुआ वही साथ ही साथ देह व्यपार का धंधा भी फलता फूलता रहा और इसी सभ्य समाज में " बेड़िया" और "बाछड़ा" समुदाय भी रहते है यही इनकी हकीकत है .
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