बुधवार, 14 अप्रैल 2021

इस्लाम से पहले सऊदी अरब

 
Pre-Islamic Arabia

,,, 

इस्लाम से पहले का सऊदी अरब,रहस्यमय जिससे दुनिया अब तक है अनजान ........


सऊदी अरब का नाम आते ही हमारे जेहन में बेहद ही कड़े नियम कानूनवाला , अमीर और  इस्लामिक मुल्क के तौर पर आती है .क्या इस्लाम से पहले भी सऊदी अरब ऐसा ही था जैसा अब है ?नहीं ऐसा बिलकुल नहीं था ,बल्कि इसके विपरीत  स्थिति  थी. पहले वहाँ पर  न तो  कोई नियम कानून था और न ही वहाँ रहने वाले लोगो का  कोई धार्मिक आधार था .गरीब ,पिछड़े ,असभ्य, बर्बर और क्रूर थे वहाँ के लोग .इस्लाम से पहले का सऊदी अरेबिया रहस्य और रोमांच से भरपूर था .





सऊदी अरब   में  इस्लाम  से  पहले  कोई  विकशित सभ्यता  नहीं  थी  एक  बिखराव सा  था  .इतिहास  में  कोई  गहराई  नहीं  वहां  के  लोग  बिना  किसी  जीवन  मूल्य  के असभ्य  और  असमाजिक जीवन जीते थे .





पूरा  सऊदी अरेबिअ  छोटे -छोटे  कबीले  में  बटा हुआ  था और   सभी  कबीलो  का  एक  मुखिया  हुआ करता था  जिसकी जिम्मेदारी अपने लोगो की हिफाजत और बाहरी आक्रमण जैसे दूसरे कबीले से सुरक्षा करना होता था .
कबीले  के सभी  लोग   आपसी सर्वसम्मति  से  किसी एक  व्यक्ति  का ताकत व्यवहार और  गुणों  के  आधार  पर  मुखिया का चुनाव  करते  थे  .





वहाँ पर न  तो   कोई  कानून  था और न  ही  किसी  कानून  को  मानने   की  बाध्यता  थी. एक तरह से कह सकते  बर्बर  सामाजिक  स्थिति  थी  .न्याय सिर्फ  खून  के  बदले  खून  ,जान  के  बदले  जान लेना  थी  .




हर  व्यक्ति  अपने  हिसाब  से  बदला  लेने  के  लिए  स्वतंत्र  था .अपराधी और  अपराध  करने  वाला  व्यक्ति  खुद   ही निर्धारित  करता  था की  अपराध  की  सजा क्या होगी.हर  समस्या  का  समाधान  केवल  हिंसा  के  माध्यम  से  होता  था. कबीले  के  सरदार  की  जिम्मेदारी केवल बाहरी कबीलो से  सुरक्षा  और  जंग  लड़ना था आपसी मतभेद को लोग खुद ही सुलटा लेते थे  .




आप इस तरह से भी कह  सकते  है  जिसकी  लाठी  उसी  की  भैंस . ताकतवर कमजोर और गरीबो  पर  जुल्म किया करते  थे .




 पहले वहां के कबीलो में  कोई  नियम - कानून  सभा और समिति नही थी  जैसे उस समय तत्कालीन आर्यवर्त और  रोमन  साम्राजय में  था . आर्यवर्त और रोमन साम्राजय  उस समय विकशित सभ्यताए थी, वहां पर सभा   समिति , नियम  -कानून  के  माध्यम  से दोसी को  सजा दी जाती ... सउदी  अरब  में  एक  क्रूर  रिवाज  भी  था जैसे  नवजात  बच्चियों  को  दफ़नाने का ये  सब  वो  अपनी  इच्छा  के  विरुद्ध  अपनी  परम्परा  को  बनाये   रखने  और  धार्मिक  रिवाज  के कारण करते थे .




  सभी  कबीलो के   पुरुष  प्रधान  होने के कारण औरतो  को  महज  एक  वस्तु  और   सेक्स  गुलाम से जादा नहीं  समझा  जाता  था ये स्थिति तो आज भी वहाँ पर है जिससे पूरी दुनिया वाकिफ है .






पहले एक आदमी  कई  औरतो  से  विवहा  करने  के  लिए  स्वतंत्र  था और उस आदमी की मृत्यु के बाद    उसका  बेटा  अपने  पिता  की  औरतो  को  अपनी  रखैल  बना लेता  था . सिवाय  अपनी  माँ  के  जिसने  उसे  जन्म  दिया या  ये कहे  एक  पिता  की  यदि  सभी  पत्नियों  से  या  रखैलो  से  8-10 बच्चे  है , तो  अपनी  -अपनी  माँ  को  छोड़  कर  अपनी  पसंद  की सौतेली माओ  को  रखैल  बना  लेते  थे .





इसके अलावा    उन  के पिता की औरतो से जो  लडकिया  पैदा होती  अपनी  -अपनी सगी  बहन  को  छोड़  कर  उनको  भी  अपनी  रखैल   बना  लेते  थे .ये बर्बर सामाजिक इस्थिति तो आज भी है बस फर्क इतना हैें  की इन  बुराईयो को अब  धर्म का अमलीजामा पहना दिया गया  है .





इन्सान  इंसान  होता है जानवर जानवर शारीरिक संरचना से लेकर प्रकृति व्यवहार ,आचरण सर्वथा भिन्न लेकिन वहाँ पर  इंसानो  और जानवरो में कोई फर्क नहीं था .
पहले औरत  और  मर्द  गुलामो  को  हथियार  और  जानवर  जैसे  ऊंट ,गधे और  घोड़ो की  तरह  बाजार  में  ख़रीदा   और  बेंचा  जाता  था और इन जानवरो के बदले भी इंसानो का बाजार में सौदा होता था .




आज भी सऊदी अरेबिया में गुलामो स्थिति वैसे  ही है लेकिन फर्क बस इतना है की बदले में जानवरो का आदान  प्रदान नहीं किया जाता  पुरुषो  को बधुआ  मजदुर की तरह  और महिलाओं को  सेक्स गुलाम की तरह इस्तेमाल किया जाता है.





 वेश्यावृत्ति तो आम बात थी  सयाद  ही कोई घर और परिवार इस इस वेश्याव्रृति के दलदल से अछूता रहा हो . उस समय इन वयस्यवृत्ति  करने  वाली  महिला  को " लेडी  ऑफ़  द  फ्लैग"  कह  जाता  था .






वो  इसलिए की  ये  महिलाये  आपने  घरो  के  बाहर   झंडा  लगा  के  रखती  थी  जिससे उनके यंहा जो ग्राहक आते थे  घर  ढूढ़ने  में  कोई  परेसानी  न  हो. झंडे अलग-अलग  तरह के  रंगो  के  होते थे .सभी  वेश्यावृति करने वाली महिलाओं  की अपनी खास तरह की  पहचान होती थी   कुल  मिला  कर  कह  सकते  है 





  Red   light   area.



इस्लाम  से  पहले  सऊदी  अरब  के  लोग   पढ़ना  लिखना नहीं  जानते थे  उनकी  संस्कृति पूरी तरह  मौखिक थी लेकिन कविता  पोएट्री  का  विशेष  महत्व  था  पोएट्री  वाकपुटता और  कल्पना  पर  आधारित  होती  थी इन  कविताओं  में  ज्ञान  का  आभाव  था किस्से  कहानी  की  तरह  होती  थी  और इन कविताओ के माध्यम से  लोगो  का  मनोरंजन  कियाकरते  थे .





इन   कविताओ  में  "Golden ods " नाम    की  एक    खास  कविता थी  जिसे सात  कविताओ  से मिला  कर  बनाया गया था इन कविताओं का सऊदी अरब के इतिहास में बहुत ही महत्वपूर्ण और प्रभावशाली माना जाता है .




इस  कविता  के  सन्दर्भ  में  कहा  जाता  है की इसे बाद  में  काबा  में  खुदवा  दिया  गया  जिससे  बांकी  लोगो  को  इस  कविता  से  बेहतर रचना   करने  की  प्रेरणा मिल  सके .




  इस्लाम से पहले सऊदी अरेबिया के लोग धर्म को लेकर एक मत  नहीं थे काफी  बिखराव सा था यहूदी  और  ईसाई धर्म को मानने वालो से पहले वहाँ  बहुदेववादी ,मूर्तिपूजक ,पेड़ ,पौधे  और  जानवरो  की  पूजा  करने  वाले  लोग  थे .




हर जनजाति  और  कबीले  के  लोग  अपने  अलग -अलग  धार्मिक  विश्वास और  इच्छा के अनुसार   मूर्तिपुज  जीव जन्तुओ   की  पूजा  किया  करते  थे .



मूर्ति  पूजा  को  लेकर  कबीलो  के  बीच  कोई  एक  सामान  वैचारिक  मत  नहीं  थे , जैसा  की  उस  समय  भारतीय  उपमहाद्वीप  में   सनातन धर्म को मानने वाले लोग प्रकृति की पूजा,पशु पूजा  उत्तरोत्तर गुप्त काल से  मूर्तिपूजा का  भी प्रचलन प्रारम्भ होगया था  लेकिन  यहाँ पर जादातर लोगो की धार्मिक मान्यतायो में समानता थी .




एक और दिलचस्प बात वहाँ के लोगो द्वारा कहा  जाता  है की   इस्लाम  के  पहले  प्रोफेट  इब्राहिम  और  उनके   बेटे  इस्माइल   ने  मिलकर  काबा  को  मक्का  में  बदल  दिया  था और  "पन्थोन" नमक  जगह  पर  360 मूर्तियों  को  स्थापित  किया  जो  पत्थर  और  लकड़ी  की  बनी  हुई   थी  .






सऊदी  अरब से  यहूदीयो का  नाता  बहुत पुराना है बात 70 a.d के अास  पास की है जब  रोम  ने    जेरुसलम  जो  फिलिस्तीन  में  है को  तबाह  कर  दिया  था उसके  बाद  यहूदी  लोग  फिलिस्तीन  और  सीरिया  से  भाग  कर  सऊदी  के  'हिजाज'  नमक  सहर  में  आकर  बस गए जहाँ पर सिर्फ रेत  ही रेत था. वहाँ पर  पहले  से  गरीब  और  जनजातीय  लोग  रहा  करते  थे और  इनका  कोई  ठोस  धार्मिक  आधार  न  होने  के  कारण यहूदी लोग  उनका धर्मांतरण  का  काम  भी  करने लगे  .






इसके साथ -साथ यहूदी  लोगो ने समय के साथ  उस  रेतीली  जमीन  को  रहने  लायक  उपजाऊ  बनाया  और  हिजाज  को  एक  समृध्यसाली   सहर  के तौर पर   स्थापित  किया जिसके  अंतर्गत 'मक्का 'और  'अतरिब' जैसे  प्रमुख  व्यपारिक  केंद्र आते थे.इसके  बाद  यहूदी  धीरे - धीरे सऊदी  के  दूसरे  सहर  -हयबर ,फाड़ा ,और  उम् -उल -औरा  में  जाकर  बसने  लगे और सऊदी अरब में अपना प्रभाव ज़माने लगे .





यहूदी   पहले  से  ही  मेहनती  और  उन्नत विचारधारा के थे और ये  बात पूरी दुनिया जानती है इसका  असर  इजराइल  में साफ तौर पर  देखा जा सकता  है की  किस  तरह  रेतीली  जमीं  पर  खेती  कर  इजराइल को एक  समृध्यासाली  और विकशित देश बना  दिया ,जो आज पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल और आदर्श  है .







यहूदियों की बढ़ती ताकत को देखते हुए  रोमन साम्राज्य भी  सऊदी  अरब  में अपने पाव पसारने लगा . उस समय  रोमन   साम्राजय  एक  बहुत ही  शक्तिशाली   साम्राज्य  था  ,जो  ईसाई  धर्म  से सम्बन्ध रखता था  .रोमन  लोगो  ने  विस्तारवादी  निति  के  तहत  सऊदी  के  उत्तर  में  इस्थित '  घसाना'  नामक  सहर   पर  आक्रमण  कर  अपने  कब्जे में  लेलिया  जहाँ पर  पहले  से  जनजातीय  और  गरीब  लोग  एक  कबीले  के  तौर  पर  रहा करते   थे .




रोमन  साम्राजय  के  लिए  उन्हें  हराना  और  उनकी  जमींन   पर  कब्ज़ा  करना   कोई  मुश्किल  काम  नहीं  था  . वहाँ  पर  अपना  कब्ज़ा  ज़माने  के  बाद  वहाँ के लोगो  को  लालच  देकर  ,अत्याचार  और  बल  पूर्वक  धर्मपरिवर्तन  भी करने लगे .





धीरे  –धीरे  अपनी  संख्या  बढ़ाते   हुए  उस  समय  सऊदी  के  विकशित और  समृद्ध शाली सहर  'हिजाज '  और  नजरान को  अपना  निशाना   बनाया जहाँ  पर  यहूदियों  की  अच्छी-खासी तादात  थी.
इसका  मतलब  यहूदी  जिनसे  अपनी  जान  बचा  कर  भागे  थे फिर  से  वही  स्थिति  पैदा  हो गई  फिर से नयी जंग की शुरुआत लेकिन  अब  यहूदी  भी  पहले  से  काफी  मजबूत  स्थिति  में  थे . 





यहूदी   खेती  के  साथ  –साथ  हथियार  भी  बनाने  का  भी  कारोबार करते थे ,जिसमे उनका एकाधिकार था .ईसाइयो  के  लिए  यहूदियों  को  हराना अब  आसान  नहीं  था,  और इस तरह  वर्षो  तक  उनके  बीच संघर्ष  चलता  रहा  जब  तक  सऊदी अरब का  इस्लामिकरण  नहीं होगया  .





 सऊदी  में  बहुदेववादी ,यहूदी , और  ईसाई  के  अलावा  "हिन्दीकस"  नामके   धर्म  को  मानने  वाले  लोग  भी रहते  थे  जो  पारसी  सिद्धांत  'द्वैततवाद '  पर  आधारित  था .यह धर्म   दो  ईस्वर  की  परिकल्पना  पर  आधारित था ,एक  ईस्वर  वो  है  जो  सत्य  का  साथ  देने  वाले  लोगो  के  साथ  रहते है  दूसरा  जो  बुरे  कर्म  और  असत्य  का  देवता है  .






अब रुख करते है , उस  धर्म  की ओर  जिससे  आगे  चल  कर  इस्लाम  का  उदय  माना  जाता  है .
Monotheists "  ,एक  इस्वर  वादी   इस  धर्म  को  मानने  वाले  लोगो  की  संख्या  उस  समय  सऊदी  में  बहुत  कम  थी  .पुरे  अरब  भूभाग  पर  ज्यादा  तर  यहूदी ,ईसाई ,और  मूर्ति पुजको की  संख्या  थी .





ये  लोग  एक  कुनबे  एक  परिवार  तक ही  सीमित   थे .ये  लोग   इब्राहिम   को  अपना  प्रोफेट,मसीहा   मानते  थे  जिन्हे  इस्लाम  का  पहला  पैगमर  मन  जाता  है  और आगे चल कर इन्ही के परिवार  में  मोहम्मद साहब  का  जन्म  हुआ .  इस  परिवार  से  एक   और  प्रोफेट  हुए  जिनका  नाम  'आली इब्बन  आबि तालिब'  था .,भविष्य  में  और भी कई  खलीफा  इस समुदाय से  पैदा हुए जैसे    'अबू  हासिम'  आदि.





अब सऊदी  अरब  में  उस समय व्यपार  और  अर्थ व्यवस्था में यहूदियों का विशेष योगदान था .
यहूदियों  की  आर्थिक  स्थिति  बांकी  कबीलो  के  मुकाबले  काफी  बेहतर  थी.  यहूदी  लोग  जादातर   हिजाज  नामक सहर में  रहते थे  जो  उस  समय  सऊदी की  आर्थिक  राजधानी  थी .यहूदी  खेती  के  साथ -साथ  हथियार  भी  बनाते ये  लोग  पूंजीपति ,धनी और  समर्द्ध थे  ब्याज  में पैसा  देने  का  काम   करते  थे .




गरीब  लोगो  को  पैसा  उधर  में  देते  और  उनसे  इतना  ब्याज  वसूलते  जिससे  वो  लोग कभी   कर्ज  से  मुक्त  ना   हो  पाएं .200 फीसदी  से  लेकर  400 फीसदी  तक  ब्याज  वसूला करते थे .इस  वजह  से  अमीर   और  अमीर ,गरीब  और  गरीब  होते  गए .




हिजाज  के  मक्का  में  रहने  वाले  ज्यादा  तर  लोग  व्यापरी  थे  जो   ठण्ड  के  दिनों  में  यमन  और   गर्मियों  में  सीरिया  जा  कर  व्यपार  करते  थे.



सऊदी  लोगो  के  बहरीन  और  इराक  से  भी  अच्छे व्यपारिक ताल्लुकात थे.
यहाँ  से  ये  लोग  व्यपार  के  लिए  अपने  साथ .खजूर ,कम्बल ,ऊंट , भेड़ के  बालो  से  बने  कम्बल ,इत्र,खुसबूदार  मसाले  और  जड़बुटी, लेकर  जाते  और  बदले  में  ऑलिव  आयल ,हथियार ,कॉफ़ी ,फल  और  अनाज  लाते थे .





इस्लाम धर्म की स्थापना के बाद सऊदी अरब से प्राचीन सऊदी सभ्यता और ऐतिहासिक इमारतों को पूरी तरह से नस्ट कर दिया गया  फिर  भी  वहाँ पर  कुछ  खँडहर  आज  भी  मौजूद  है  जंहा   लोग  सायद  ही  जाते  है.


ref.Article by Dharmendra mishra  book Alekh Sangrah ...



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