गुरुवार, 15 अप्रैल 2021

क्या संसार से आशा रखना व्यर्थ है ?

 

जीवन- जंजाल,,,,

क्या संसार में निराशा ही निराशा हाथ लगती है ? 




 संसार को क्या पड़ी सब खेल हम  ही रचा लेते है । आसा बाँधते है । इससे निराशा हाथ लगती। आस्था का अर्थ है। हम  चाहते है  भविष्य ऐसा हो। हमारी वासना के अनुकूल हमारी तृष्णा के अनुकूल। किन्तु ये विराट अस्तित्व हमारी  क्षुद्र वासनाओं के अनुकूल नहीं चल सकता। और एकाध ही कोई होता तो भी ठीक है। करोड़ों करोड़ जन उनकी अरबों खरबों वासनाएं। अगर उन सब की वासना के अनुकूल विश्व चले तो अभी  सब बिखर जाएगा  खंड खंड हो जाएगा।





 ये ब्रम्हांड बना रहेगा। इसके भीतर जो अभी संगीत है जो तारतम्य इस भीत इस जगत के भीतर अभी जो एक समायोजन। हर चीज एक दूसरे से ताल बद्ध वह सब बिखर जाएगा। हमारी व्यक्तिगत आकांक्षा के कारण अस्तित्व  उसका अनुसरण नहीं कर सकता। पूर्ण अंक के पीछे नहीं चल सकता . और हम क्या हैं ? हम छोटे से 

अंश से जिसे सागर की छोटी सी तरंग तरंग चाहे कि सागर मेरे अनुकूल चले यह कैसे होगा।




 और यही हम चाह रहे इसी असंभव का नाम?  सागर के साथ तरंग चल सकती तो जीतेगी। फिर कोई निराशा नहीं। लेकिन सागर के साथ जब तरंग चलेगी तो पहले तो आशा छोड़ देनी होगी। धन ले जाए विराट जो उसकी मर्जी।  विधि राखे राम।  कोई आसन नहीं इसलिए  कोई निराशा भी नहीं । आस्था के बीज बोए निराशा की फसल काटी।



 सफलता की आकांक्षा असफलता की खाइयों में खड्डों में गिर पड़ी । विजय चाहते हो हार सुनिश्चित है ।  गणित को ठीक से जिसने समझ लिया वह इस  विराट  सागर  में  उतर  गया  ,नहीं  डूबता  उतरता  रहा । अगर जीतना हो तो जीतने की बात ही छोड़ दें। जीतगो  तो  कोई  हारेगा , फिर तुम्हें कोई हरा नहीं सकता  ,अगर जीवन में आनंदित होना हो तो आनंद पाने की बात ही मत उठानa। आनंद की चर्चा ही मछंड है ।





 आनंद पर अपनी आसमां टिकाना  और आनंद की वर्षा हो जाएगी। एक  आदमी  ने कहा कोई मुझे हरा नहीं सकता। दूसरे  ने  कहा  देह में तो बड़े बलिष्ठ लोग हैं वे आपको हरा सकते। उस  आदमी  ने  कहा  का कोई मुझे नहीं हरा सकता क्योंकि मैं पहले से ही हारा हुआ। मुझे वो महाराजा उसके पहले मैं चारों खाने चित्त लेट जाऊं फिर वो क्या करें। हारे को कैसे हराएंगे। और जो विराट के सामने हार गया। वह जीत गया।


 


परमात्मा ...के सामने हार  वहां हारना तो विजय के हाथों से लद जाना है । मोतियों के हारों से लडजाना ।  क्या संसार में निराशा ही निराशा हाथ लगती। संसार का कुछ लेना देना नहीं है । संसार बिलकुल तक तटस्थ है । सब तुम पर निर्भर। तुम अगर जगत की अंतरतम व्यवस्था के साथ चलो तो जीत ही जीत।




 आस्था और आस्था के दीये जलने लगे। दिपावली हो जाएगी। ऐसे दीये जलेंगे जो कभी बुझते नहीं।  विजय पताकाएं शास्वत में उठेंगी अहंकार को परमात्मा के चरणों में चढ़ा दें। हां  अगर चाहो अहंकार जीते। तो बुरे पिटोगे । जितना बड़ा अहंकार होगा उतनी  ज्यादा पिटाई  होगी । अहंकार के अनुपात में ही पिटाई होगी।  





 जो इतनी हारे इतनी असफलताएं इतने विषाद हमारे  जीवन में आते हैं ये हमने  ही पुकारे। ये हमने  ही  आमंत्रित किए। ये अहंकार चुम्बक की तरह इनको खींचता है । इसीलिए तुम्हारी अलग आकांक्षा क्या आसन। क्या हम   अगर अलग होते तो आकांक्षा अलग हो सकती थी आसा अलग हो सकती थी।




 तुम विराट के साथ एक हो ही। जिसे कोई पत्ता वृक्ष का अपनी निजी आकांक्षा रखता तो मुश्किल में पड़ेगा। जब दक्ष नाचे आवाज़ में उस पत्ते को नाचना नहीं अभी वो विश्राम कर रहा है और जब बस शांत है और हवाएं नहीं बैठ रही तब उस पत्ते को नाचना उसका विश्राम पूरा हो गया। 




वो कभी ब्रश के साथ अपने को पाएगा नहीं और जब दक्षिणी नाच लाये तो पत्ता कैसे नाचेगी। और जब वृक्ष नाच रहा है तो पत्ता अपने को नाचने से कैसे रोक पाएगा। हर घड़ी पत्ते को निराशा हाथ लगी। हर घड़ी ऐसा लगेगा कि सारा नियोजन मेरे विपरीत है। सब मेरे दुश्मन। कोई हमारा   दुश्मन नहीं सिवाय हमारे  और कोई मेरा  मित्र  नहीं  सिवाय  मेरे ।





 अगर अहंकार गिरा दूं तो मै ही  अपना  मित्र हूँ । अगर अहंकार को उठाये  रखु  तो  मै  ही  मेरे  सत्रु   लेकिन अपने को दोष कोई देना नहीं चाहता। हम हमेशा कोशिश करते हैं कि कोई और मिल जाए जिसके कंधे पर हम अपने सारे दोस  का बोझ रख दे। तो हमने अच्छे अच्छे शब्द गढ़ लिए मूढ़ता  हम  करे  और  दोष  संसार  का   




संसार ...

को छोड़ दे  लेकिन मूढ़ता हमारे  भीतर इस संसार छोड़ के जहां भी जाओगे मूढ़ता  साथ रहेगी। हम   जो भी करोगे उसी में मूढ़ता होगी। हम  पूजा करोगे तो मूढ़ता होगी हमारी   पूजा तुम्हारी मूढ़ता से ही निकलेगी ना ? हमारा  अहंकार  कहा  जायेगा  ,जीवनसंगनी  की  भांति  ,कभी  दाये  ,कभी  बाये ,कभी  पीछे  साथ  ही  चलने  वाली  है।  .


Share this

हिंदी उपन्यासकार ,कहानीकार ,दार्शनिक ,प्रकाशित पुस्तकें " धारणावाद ;अमूर्त दर्शन, मुहाना सीरीज , घोस्ट हंटर , दायरा ,कहानी की दुनिया ,सैर सपाटा ,आबरू ,लम्पट ,किड्स बूस्टर ,कलर मी, नोट बुक "इत्यादि। Online, e-book, paper back ,amazon, flip kart ,notion press. Podcast Audio Book; Shool bhadra vs Andh karni

0 Comment to " क्या संसार से आशा रखना व्यर्थ है ?"

एक टिप्पणी भेजें

Useful, valuable comments are welcome!!!