रविवार, 7 नवंबर 2021

collapsing Democracy


                 मोदी का कहर चरमराता लोकतंत्र 





क्या मोदी लोकतंत्र के गले की फंस है ?

जिनके कहर से लोकतंत्र बुरी तरह से कराह रहा है  ?


भारतीय  मीडिया का  खबर को बाज़ार मे बेचना ही लछय है ,

समाज मे असुरछा की भावना प्रबल कर  सत्ता के साथ संतुलन बना कर पूंजी बाज़ार मे पकड मजबुत करना ? 

जो भी कारण  हो किन्तु  देश के अनुरुप व्यवहारिक कदाचित नही है । 

देश अर्थिक और सामरिक कई तरह की विपदाओं से दो चार है । सत्ताधारी सरकार पर सवालिया निशान है  ।समस्या को दबा देना या   टाल देना निराकरण नही ,अवश्मभवी   गंभीर चुनौती को निमंत्रण  है  ।




सरकारी समर्थन के नाम प्रसार  प्रसार संस्थानो द्वारा जनसमूह की अवहेलना सर्वथा अनिष्टकारी    है । 

सरकार के अनुरूप मिडिया पूरी तरह ढल चुकी है ,प्रपोगेंडा  चलन में  है ,जनता लोकतंत्र से नदारद है।




ब्रांड कैमपेनिंग मैनेग्मेंट(Brand campaigning Management ) वाले   ब्रान्डेड जुते चप्पल कपडे पहने उससे पहले अपनी सोच  भी तो  ब्रान्डेड  करे ,जिसे उसे भी  लगे किसी ब्रान्डेड सोच वाले ने पहन रखा है ।




 

ठीक है हर व्यक्ति का अपना कही ना कही व्यक्तिगत निजी निहित स्वार्थ होता है।रूलिंग गार्मेंट  से सीधा टकराव नही चहता है ।लेकिन  जागरुकता कर्तव्य बोध हर  व्यक्ति ,समाज में  अपने  देश के प्रती होना ही  चाहिये।मसला पछ और विपछ का नही है,  उनसे सवाल करेंगे भी तो क्या वे कभी उसका जबाब  देंगे ?





उनके पास कोई जबाब हो तो देंगे । वे स्वयं ही सवाल और जबाब है।  सही और गलत के चुनाव मे स्वछंद सरकार स्वात: को ही प्रमाणित करती है।

आप सही को सही गलत को गलत तभी कह पायेंगे जब आप स्वयं मे सही हो ,स्वयं कटघरे मे खडे होकर न्याय की कुर्शी पर  बैठे व्यक्ति से सवाल नही कर सकते करेंगे भी तो कोई लाभ नही होगा ।




निर्णय कर्ता यदि दोषी है तो जनता ही उसे कटघरे मे ला सकती  है। उसकी निरंकुश तानासाही आसक्ति पर रोक लगा सकती है ।

जनतंत्र मे जनता का प्रस्ताव अध्यादेश की तरह होना चाहिये, जो सरकार की निरंकुशता पे अंकुश लगाने केलिए बाध्य करे ।





सरकार को जब तक यह बोध नही होगा वह गलत है ।सही होने की सम्भावना  छीण  है ।सभ्य समाज के पुरोधा पत्रकार दुसमन मुल्को  की मिट्टी पलीद करने मे दिन रात एक कर देते है। लेकिन उन्हे यह दिखाई नही पड्ता ,उनके अनुसार उनसे अपेछाकृत कमतर  सोच वाले  अपने मुल्क के मसाईल ,अवाम के प्रती जागरुक है।दिन रात आपने वजीर को लताड़ा लगाते है।ये अलग बात है उनपर अलोचना का कोई असर होता नही ।किन्तु सहर्ष मन से स्वीकार की भावना होनी चाहिये।






 अपनी अछ्म्यताओ सीमाओ को जनता के सामने रखना चाहिये जो वे करते भी है ।यह सरकार की नैतिक जिम्मेदारी है ,कमी होना बुरी बात नहीं किन्तु उसे दूर करने का सार्थक प्रयाश होना चाहिए न की एक कमी को छुपाने केलिए सौ झूठ का सहारा लेना चाहिए ।




 सरकार को नैतिकता    का अह्सास  दिलाएगा कौन  ?मेरी बिल्ली  मुझी से म्याऊँ ,मेरा खाओ ,मुझि  को आंख दीखाओ । नही वो अपको अपनी कमाई से नही खिलाते किसी और का हक छीन कर आपको अपने   फायदे    केलिए इस्तेमाल करते है ।




 मीडिया को तात्कालिक फायदा तो होगा  ,जो समंदर मे कुछ बँद की तरह है,लेकिन सरकारी खजाना ना मीडिया का है ,ना सरकार का है ,जनता का है जो विकाश से वांछित है ।

कमाई वाले हाँथ ज्यादा होंगे तो फायदा भी ज्यादा होगा और सबका  होगा ।




इसके लिये ये ओछी  गले मे  पट्टा डालने की राजनीती से विलग होना पडेगा ।देश की खाओ,देश की बात करो  सायद सरकारी  कृपा से वांछित होजाओ,किन्तु आत्म उन्नति के मर्ग पे अंगे बढ चलोगे ।

सरकार को उसकी जिम्मेदारी के प्रति सचेत करे,यदि सरकार अलोचना को नजरअंदाज करती है ।जनता के पास जाये । सरकार देश केलिए है,देश सरकार केलिए नही है ।




 देश के समग्र विकाश   केलिए व्यापक परिवर्तन   की आवस्यकता है जो नौकरसाही राज मे सम्भव नही है ।

भविष्य मे यदि नौकर साही व्यवस्था  के स्थान पर अन्य व्यवस्था  लागू  की  जाएगी तो उस बदले हुए स्वरुप में  जनभागीदारी प्रमुखता से   होगी ।

                                                                                                                          ~धर्मेंद्र मिश्रा 


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