मणिधारी सर्प और कल मुहा बिल्ला
एक समय की बात है
दिलबाग वन बहुत
से चूहों से भरा
पूरा था, जहाँ शिकार
हो वहां शिकारी
का होना स्वाभाविक
था।
उसी वन में कलमुहा नाम
का एक बिल्ला भी रहता था।उसका बड़ा आतंक था बेवजह
मनोरंजन के लिए भी चूहों का शिकार
करता। वहीं चूहों ने मिलकर राय मश्वरा किया, कलमुहे के भय और आतंक से
बचने का एक
ही उपाय है, इसे जितनी जरुरत
हो हम इसे उतने चूहे दे दिया
करें।
कलमुहे को भी चूहों का ये
प्रस्ताव पसंद आया, भाग-दौड़ से अच्छा है, बैठे बिठाए शिकार खुद चल कर
आएगा, खायेगा और मौज करेगा।
कलमुहे को जब भूंख लगती
एक बड़े से टीले पे चढ़ कर उद्घोषणा
करता "दो चूहे, चार चूहे हाजिर हों। " जब जितनी भूंख
होती फरमान जारी कर देता।
ऐसे ही
उसके मजे से
दिन कट रहे
थे। एक दिन भोजन और
शिकार की तलाश
में बटला नाम का
एक सयाना करायट मणिधारी
बूढ़ा सर्प आधमका, कलमुहे का
तमाशा देख कर
मन ही मन
विचार करने लगा ; इसने तो अच्छा
सिस्टम बना रखा है,
उसे भी कुछ
ऐसा ही करना
चाहिए लेकिन ये चूहे उसकी
बात ऐसे मानेगे
नहीं ,कलमुहे से सीधा
भिड़ गया तो कहीं
खुद भी न शिकार
हो जाए ,सो कुछ ऐसी
योजना बनानी पड़ेगी, सांप भी बच
जाए और चूहे भी
अंदर हो जाएँ।
इन्हें डरा
कर नहीं, मुर्ख बना कर
इनका शिकार करना
चाहिए । मन ही मन
योजना बनाने लगा।
एक दिन
कलमुहा मुफ्त का माल हजम
कर चूहों को
खा पी कर वर्जिश करने
निकल गया, उसके गुफा के
पास टीले पे बटला
मणि चमकाते हुए फन फैलाकर लहरा
लहरा कर नाच
गाना करने लगा।
चूहे भी बड़े कौतुहल से उसकी तरफ देखने लगे , आपस में काना फूसी करने लगे;
ये कौन है,
कहाँ से
आ गया, है तो भयंकर
लेकिन सज्जन मालूम पड़ता
है।
तभी बटला, चूहों
से “ तुम्हें उस
कलमुहे से डरना
नहीं चाहिए, मैं तुम्हें
बचाऊंगा, मजाल उसकी जो
तुम्हें नुकशान पहुंचाए ।
जब तक मैं जिन्दा
हूँ, उस कलमुहे को
तुम्हारे पास भी
नहीं फटकने दूंगा, चलो मेरे साथ ।"
चूहे पहले से
ही डरे थे, कैसे भी कर
के उस कलमुहे
से निजात पाना
चाहते थे सो
उन्हें बटले पर
विश्वास कर लिया, चूहों को
भी लगा, ये इतना भयंकर
है इसके रहते
वो कलमुहा हमारे
पास भी नहीं
फटकेगा।
बटला के पीछे- पीछे
चलने लगे।
बटला एक
बड़े से झाड़
के पेड़ के
पास रुक गया, जहाँ उसने बहुत
सी बामियाँ बना
रखा था।
बटला, चूहों
से “ अब तुम
लोग इन बामियों
में आराम से रहो
और मैं
पेड़ पर से
तुम्हारी रक्षा करूँगा।
सभी चूहे उन
बामियों में सरसरा
के घुस गए।
अब बटला का
पेट बड़ा था
सो उसे चूहे
भी ज्यादा लगते
थे, दर्जनों चूहे
रोज ही खा
जाता, आराम से पेड़
पे चढ़कर करवटे बदलते लेटा रहता।
कई दिन हुए
चूहों की संख्या
लगातार घटती ही जा
रही थी, चूहे अब डर के
मारे बामी से निकलना
ही बंद कर दिया, वहीँ दुबके रहते।
दिन दो दिन हुए जब चूहे बामी
से निकले ही नहीं , बटला ने सोचा
कुछ गड़बड़ तो
नहीं कहीं चूहे
भाग तो नहीं
गए।
जैसे ही बटला
बामी में घुसा सभी
चूहे भरभरा के
बाहर की ओर निकल भागे …कलमुहा पहले
से ही चूहों
की तलाश में
मारा मारा फिर
रहा था। भूंख
के मारे बुरा
हाल था।
चूहों को देख
कर उनकी तरफ
भागा , पीछे से बटला
भी उसे आता
दिखा , कलमुहा समझ गया
इसी की वजह
से उसका शिकार
हाँथ से निकल
गए।
आव देखा न
ताव बटला पे
टूट पड़ा , थे तो दोनों
शिकारी न ये
कम न वो
कम , एक दूसरे पे सीधा
हमला करने की हिम्मत
न हुई।
घात लगा कर
एक दूसरे के
इर्द - गिर्द फिरने लगे ,
एक
कदम आगे लेते
तो दो कदम
पीछे खिसकाते।
ऐसे ही घंटों
चलता रहा।
बटला बूढ़ा होने
की वजह से
जल्दी ही थक गया,
सोचा
इससे जान छुड़ाई
जाए ,कलमुहे को फुसलाते
हुए “ शिकारी -शिकारी हम आपस
में क्यों कर रहे लड़ाई, चलो दोस्ती कर लो भाई ?"
कलमुहा “ बड़ा
धूर्त है तू
मेरा शिकार ले
भागा ,पूंछता है लड़
क्यों रहे हैं। ”
बटला ,हँसते
हुए “ शिकार तो
बहुत दूर निकल
गए, अब हाँथ
नहीं आने वाले। "
कलमुहा मन
ही मन; साला
ये चूहे फिर
हाँथ से निकल
गए इसकी वजह से, अब
इसे ही खा
कर अपनी भूंख
मिटाया जाए। बटला से “ ठीक
कहा भाई तुम ने
अब पानी
पी कर ही काम
चलाना पड़ेगा। "
सामने नदी में
पानी पीने के लिए आगे
बढ़ा , बटला ने
सोचा चलो वो
भी थोड़ा पानी
पी कर थकान मिटा ले।
बटला पानी पीने
के लिए जैसे ही अपनी मुंडी
पानी में डालता
हैं ,पीछे से
कलमुहे ने गर्दन
मरोड़ दी।
खा पी कर वहीँ चटकारे लेते हुए ;साला शेर के मौसे से पंगा लेता है।
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