नीति वाक्य
हर व्यक्ति स्वयं को अच्छा बनाना चाहता है ,किन्तु अच्छा वही बनता है , जो सदाचार ,सत चरित्र, सत आचरण को
अपनाता है।
"सांप निठुर होता है ,दुष्ट व्यक्ति भी निठुर होता है ,फिर भी दुष्ट व्यक्ति सांप की अपेक्षा ज्यादा
निठुर होता है ,क्योकिं सांप तो
औषधि मंत्र से वश में हो सकता है किन्तु दुष्ट व्यक्ति का निवारण नहीं किया जा
सकता हैं।"
"दुष्ट व्यक्ति विद्या से
भूषित होने पर भी त्यागने योग्य है , जैसे सर्प के मस्तक पे मणि होने से क्या वो भयंकर नहीं होता ?"
"परदेश में विद्या मित्र
है ,घर में माता मित्र है ,रोगी का औषधि मित्र है और मृत व्यक्ति का धर्म
ही मित्र है।"
"शरीर और गुण इन दोनों में बहुत अंतर है ,शरीर थोड़े ही दिनों तक रहने वाला है वहीँ गुण प्रलयकाल तक रहते हैं।कोयल की सुंदरता ;स्वर है ,स्त्री का सतीत्व, कुरूप का विद्या और साधुजन का क्षमा।"
"अग्नि ब्राह्मण का गुरु
है और ब्राह्मण सब वर्णों का गुरु है ,स्त्री का एक मात्रा गुरु उसका पति है और अतिथि सब का गुरु है।"
"स्वाभाविक मित्र ,आज्ञाकारी पुत्र ,मन के अनुकूल स्त्री ,हितकारी कुटुम्बी जन मिलना दुर्लभ है।"
"इस असर संसार में ;सज्जन संगती,ईश्वर भक्ति और गंगा स्नान इन तीनों को ही सार समझना चाहिए।"
"अन्न देने वाला ,भय से बचाने वाला ,विद्या पढ़ाने वाला ,जन्म देने वाला ,संस्कार करवाने
वाला ये पांच पिता होते हैं।"
"अपनी जननी ,गरूर पत्नी ,ब्राह्मण -पत्नी , राज पत्नी ,गाय ,धात्री ,और पृथ्वी ,ये सात माताएं
होती हैं।"
"विद्या के समान नेत्र
नहीं, सत्य के समान तप नहीं ,अशक्ति के समान दुःख नहीं और त्याग के समान सुख
नहीं।"
"बुद्धिमान व्यक्ति स्वयं को अजर और अमर समझ कर विद्या और धन का उपार्जन करे ,मृत्यु केश पकड़े खड़ी है यह सोच कर धर्म करे।"
"ब्रह्मज्ञानी के लिए
स्वर्ग ,वीर के लिए जीवन ,जितेन्द्रिय के लिए नारी और निर्लोभी के लिए
समस्त संसार तिनके के समान है।"
"शक्तिशाली के लिए बोझ
क्या ?
व्यापारी के लिए दूर क्या ?
विद्वान् के लिए विदेश क्या ?
और मधुरभाषी के लिए शत्रु
क्या ?"
"सत्य ने ही पृथ्वी को धारण कर रखा है ,
सत्य से ही सूर्य तपता है ,
सत्य से ही वायु चलती है ,
सब कुछ सत्य में ही स्थिर और नित्य है।"
"समुद्र में वृष्टि ,भरपेट खाये हुए को भोजन,
समृद्धवान को दान ,दिन में दीपक का प्रकाश जिनका कोई अर्थ नहीं।"
"दरिद्रता धीरज से ,करूपता अच्छे स्वाभाव से ,
कुभोजन गर्म रहने से और पुराना कपडा भी स्वच्छ होने से सोभा
पता है।"
"दरिद्र के लिए सभा और भोजन समाप्ति पे जल पीना विष के समान है। "
"जो पर स्त्री को अपनी माता के समान ,
पर धन को मिटटी के ढेले के समान ,
समस्त संसार को
अपने ही समान समझता है वास्तव में वही पंडित है।"
"समय कैसा है ?
मित्र कौन है ?
देश कौन सा है ?
आय और व्यय कितना है ?
मैं किसका हूँ ?
और मेरी शक्ति कितनी है ?
इसका हर समय विचार करना चाहिए।"
"अग्नि ,गुरु ,ब्राह्मण ,गौ ,वृद्ध ,बालक और कुमारी ,इन्हें कभी पैर
से नहीं छूना चाहिए।"
"जिनमें न ज्ञान है न शील
है न गुण है न धर्म है वे मनुष्य पृथ्वी पे चलते फिरते पशु के समान हैं।"
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