मोदी और ट्रम्प की जुगलबंदी क़े मायने
समय के साथ भारत और अमेरिका के रिस्तो में जो धुंद,खटास थी मिटती जा
रही है देख कर तो ऐसा ही लगता है ,दोनों देशो के रिस्तो में नई गर्माहट
देखने को मिल रही है .कल तक जो देश भारत को सिर्फ अपने फायदे के लिए
इस्तेमाल कर रहा था आज बराबरी का दर्जा देने को तैयार
है .इसकी वजह है भारत का दक्षिण एशिया में बढ़ता प्रभाव ,अफगानिस्तान
,बांग्लादेश,श्रीलंका ,भूटान और मम्यार जैसे देशो से भारत ने ना सिर्फ
सम्बन्धो में प्रगाढ़ता दिखाई है बल्कि सक्रिय भूमिका भी निभा रहा है .ये
बात अमरीका को भली भाती पता है यदि चीन के बढ़ते कदम को
रोकना है,आतंकवाद से लड़ना है , तो भारत को साथ ले कर चलना पढ़ेगा, एक प्रमुख
बजह ये भी है अफगानिस्तान में अमेरिका की नाकामयाबी जो अमेरिका के लिए
दुखती रग की तरह है ,२६/११ के बाद अमेरिका को लस्कर-ऐ-तोइबा
,तालिबान,हक्कानी नेटवर्क ,जैसे आतंकी संगठन के खिलाफ जंग में
माकूल सफलता न मिलपाना ,इन आतंकी संगठनों का प्रभाव काम होने की वजाये दिन
बा दिन बढ़ता ही जाना . इराक और सीरिया जैसे देशो को तो प्रत्यक्ष और
आप्रत्यक्ष तौर पर isis जैसे आतंकी संगठन ने आपने कब्जे में ले लिया है
.रूसी और अमेरिकी सैनिक मैदान में है आतंक की जाड़े उखाड़ने
के लिए भारी मात्रा में गोला और बारूद का इस्तेमाल किया जा रहा है. दोनों
ही मुल्क दुनिया में बादशाहत कायम करना चाहते है .इस होड़ में कौन आगे
जायेगा ये तो वक्त ही बताएगा लेकिन इन सब के बाबजूद अमरीका ने लस्कर -रे
-तोइबा संगठन का प्रमुख आतंकी ओसामा बिन लादेन को मरने
में सफल रहा लेकिन आतंकवादी संगठन की जड़े अभी भी फल- फूल रही है .अमेरिकी
सेना का संघर्ष अभी भी अफगानिस्तान , सीरिया और इराक में जारी है .तब से
लेकर आज तक हजारो अमरीकी सैनिक मरे गए,भारी आर्थिक छति भी हुई ,ये ऑपरेशन
बराक ओबामा की सबसे बढ़ी नकामबी की रूप में सामने
आई .इसकी झलक हॉलीवुड की हालिया प्रदर्शित फिल्म वार मशीन में भी देखने को
मिलती है .
इस फिल्म में बताया गया है की अफगानिस्तान को ले कर ओबामा की कोई ठोस
रड़नीती नहीं थी ,वहा की हालात को सुधरे बगैर सैनिको की कमी करना ,जरुरी
सुभिदाये मुहैय्य न करवा पाना ,ओबामा को एक फेकू और भासड बाज बतायाजना जो
सिर्फ बड़ी -बड़ी बाते करते है कुल मिलकर फिल्म का
उद्देश्य ओबामा की छवि को धूमिल करना ,डेमोक्रेटिक पार्टी की हार प्रमुख
वजह में से एक है .अमेरिका में लोगो का ट्रम्प के समर्थन की एक बजह ये भी
है ,ट्रम्प की मुस्लिम बिरोधी छवि ,दुनिया में बढ़ते isis का प्रभाव
,इस्लामिक कट्टरता की प्रति सख्त रवईया ये बाते ट्रम्प
की राष्ट्रपति बनाने की बाद साफ देखि जा सकती है ,ट्रम्प बराक ओबामा की
नाकामयाबी के अपनी ताकत बनाना चाहते है ,ओबामा से भी बड़ा लीडर खुद के साबित
करना चाहते है .ट्रम्प खुद एक बिज़नेस मैन है और भारत को एक बहुत बड़े बाजार
के तौर पर देख रहे,एशिया में यदि अपने पैर जमाना
है ये सब
बिना भारत को साथ लिए ये संभव नहीं.भारत के अफगानिस्तान के साथ हर
तरह क़े आर्थिक और सामरिक ताल्लुकात बहुत अच्छे है,भारत अफगानिस्तान के
आर्थिक प्रगति के किये हर संभव मदत कर रहा है ,ये बात अमेरिका की
अफगानिस्तान निति के लिए फायदे मंद साबित हो सकती है .अफगानिस्तान
से आतंकवाद की जड़ उखाड़ना है ,अफगानीयो का दिल जितना है तो भारत के साथ ही
बढ़ाना होगा ,भारत को भी पता है उसका भी हित इसी में निहित है,भारत के लिए
भी पाकिस्तानी आतंकवादी और चीन का बढ़ता प्रभाव प्रमुख समस्या है , मोदी और
ट्रम्प की अमरीका में हुई मुलाकात इसी भावि
रड़नीति की ओर इशारा करती है .
धर्मेंद्र मिश्रा
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