हिंदी कविता
"अकार्य ही जीवन
न
व्यर्थ
करो,
यथाशक्ति प्रयत्न करो,
कर्मनिरत हो कर्म
करो
,
मत घबराओ संघर्ष
करो...
दुर्लब्द्ध
नहीं है कोई
पथ,
यदि तूने चलना
सीखा हो,
दुष्प्राय ही मिले
हासिल है,
यदि पथ से
तू भटका न
हो ,
जिन्दा है तू
अभी मरा नहीं,
शेष प्राण बांकी है
तुझमें अभी,
आलभ्य हो अवशेष
नहीं,
मानव तन हो
पशु नहीं ,
दुर्लभ हो अपर
हो,
ईस्वर का उद्धत
प्रतिरूप हो ,
उस सक्ति
की पहचान करो...
अकार्य ही जीवन
न
व्यर्थ
करो,
यथाशक्ति प्रयत्न करो,
कर्मनिरत हो कर्म
करो
,
मत घबराओ संघर्ष
करो...
ये भीरु मन
क्यों घबराता है
,
ये कौन तुम्हे
कायर कहता है
,
स्वयं अहसास नहीं,स्वयं
की शक्ति का,
वो भीरु मन
ही तुम्हे,कायर
कहता है ,
मन के अंदर
तुम अपने पड़ताल
करो,
सागर से भी
गहरा ,हिमालय से
भी ऊँचा,
अपार शक्ति छिपी है
,तुम्हारे अंदर,
एक दिव्य पुंज जल
रहा है तुम्हारे
अंदर,
सक्ति स्वरुप उस दिव्य ज्योति
का मनन करो,
अकार्य ही जीवन
न
व्यर्थ
करो,
यथाशक्ति प्रयत्न करो,
कर्मनिरत हो कर्म
करो
,
मत घबराओ संघर्ष
करो."

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