"प्रेम अंतरात्मा का अप्रकट भाव है, अप्रत्यछ जीवन भी है .प्रेम जीवन की रसधार है,प्रेम जीवन के उद् भीज का कारण और चरम स्खलन भी है"
जो हमें दिखाई नहीं देता लेकिन बढ़ता उसी तरह है ,जिस प्रकार एक सामान्य जीव देह का विकाश होता है .विस्तार से जानते है ...
प्रेम और जीव देह की परस्पर ,और समान्तर समानता क्या है . अप्रकट जीव देह कैसे है ,इस विषय में अपनी "सूछ्म अनुभूति " व्यक्त करने का प्रयाश करता हूँ , हालाकी प्रेम जीव देह का भी भाव है ,श्रष्टि का कारण और आधार भी प्रेम ही है ,प्रेम की व्याख्या करना एक बड़ा ही मुश्किल कार्य है ,इस विषय पर जितनी भी बात की जाये कम है,फिर भी मेरी जितनी समझ है कम सब्दो में विचार प्रकट करने की कोशिश करता हूँ ...
शिशु के जन्म लेने के बाद उसके माता -पिता द्वारा हर समय नजर रखते है ,कही उसे,सर्दी ,गर्मी ,तो नहीं लग रही ,शिशु के मनोभाव को समझने की कोशिश करते है .ठीक उसी प्रकार जब दो विपरीत लिंगो के मध्य प्रेम पनपता है ,तब दोनों एक दूसरे की छोटी छोटी बातो पर ,व्यवहार पर नजर रखते है ,एक दूसरे के मनो भाव को समझने की कोशिश करते है .सुरूआती अवस्था में यह एक शिशु की तरह बड़ा ही नाजुक होता है ,जरा सी भी विपरीत परिस्थिति सहन नहीं कर सकता है.
अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करने लगता है ,अपने अस्तित्व्य की रच्छा * करने में समर्थ नहीं पता ,अगर बहरी परिस्थि अनुकूल न हुई तो शिशु रूपी प्रेम पुष्प का अंत हो जाता है .तात्पर्य माता पिता द्वारा शिशु के समुचित देख भाल न करना .उसी प्रकार प्रेम भी शिशु अवस्था में स्वयं की सुरछा करने में असमर्थ है .इसके अलावा शिशु और प्रेम दोनों के उत्तरोत्तर वृद्धि के लिए ,शिशु का जीव देह के प्रति आसक्त भाव और प्रेम में निः छलता उतनी ही आवश्यक है .परिस्थितियां कितनी भी अनुकूल हो ,यदि दोनों के आधार उर्वर नहीं है ;तो कितना भी सिंचित करे दोनों का विकाश संभव नहीं होपाता है .
फिर जैसे- जैसे शिशु बालक बनता है ,माता पिता द्वारा समय समय पर ललन पालन किया जाता है,भार थोड़ा कम लगता है, उसी प्रकार प्रेम भी बढ़ता है ,
,हर समय फिकर करने की जरुरत नहीं पड़ती ,प्रेम के अंदर विश्वास धीरे धीरे पनपने लगता है .
बालक जैसे जैसे युवा अवस्था में प्रवेश करता है ,अपने कार्य स्वयं करने लग जाता है ,माता पिता का दायित्व देख -रेख करना और दिशा -निर्देशन करना होता है .उसी प्रकार प्रेम का आधार भी मजबूत होता जाता है,प्रेम में समर्पण का भाव आजाता है,वृछ की भांति दोनों पुष्पित और पल्लवित होने लगते है ..
पग डंडी से चल कर जीवन और प्रेम रूपी गाड़ी हाई वे पर आजाती है ..गाड़ी में समय समय पर ब्रेक लगाकर बस समंजश्य बनाने की आवश्यकता पड़ती है.
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