शुक्रवार, 22 जून 2018

वो बात नहीं जो पहले थी , जो है उनमे वो बात नही...Poetry


1
वो बात नहीं जो पहले थी,
जो है उनमे वो बात नही,
अब वो कांटे नहीं जो चुभ सके,
जो बचे है उन्हें कोई अकेला ही,
साफ कर रहा हो जैसे...

2
कही दूर रौशनी की एक किरण दिख रही है,
युग प्रवर्तक बन युग परिवर्तन करने,
कर्त्तव्यचुत हो कंटकाकीर्ण पथ पर,
कोई अकेले ही चल रहा हो जैसे ...

3
दुर्भेद्य को धेय कर दुर्गम पथ ,
आप प्रशस्त करते हुए ,
दुर्दम्य सहस को कोई अकेला ही,
निस्तेज कर रहा हो जैसे ...

4
राह की गंदगी को खिंचते हुए ,
अतीत की काली परछाइयों को,
समेटते हुए कोई अकेला ही ,
चला जा रहा हो जैसे...

5
शूलपाणि बन सूल से अभ्र को भेदते हुए,
सूरज के सप्तरथ पे बैठ ,
सूरज की किरणों को साथ ले,
कोई धरती पर अकेला ही दौड़ा,
चला रहा हो जैसे...
From "Meri Suchhm Anubhuti"...

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