शनिवार, 14 जुलाई 2018

वो गुजर गया जो जमाना...कविता


...कविता...
वो गुजर गया जो जमाना,
इतिहास का पन्ना बन गया.
हकीकत के आईने में एक किरदार ,
आज भी नजर आता है,
गहे बगाहे रोज ही वो सुर्ख़ियों में
रहता है.
मजमा लगा के दिल्ली दरबार *में,
सारे दरबारी* जब इकठा  होते है.
तू तू मै मै न वो तेरा न वो मेरा,
कोई पैरोकार न उसका फिर भी ,
 चर्चे होते है .
वो मक़ाम मिला उसे जो न मिला,
जंग-ए-आजादी के सिपहसालारों को.
वो कर गया जो कोई न कर गया,
गोडसे  मरा नहीं अमर होगया...
आप का ह्रदय से आभार ,अपने बहुमूल्य समय का कुछ हिस्सा हमें देने के लिए ...यह एक अस्तरीय रचना है ...ऐसा बिलकुल भी  नहीं ,इस रचना में ,यति ,गति ,विराम ,मात्रा व्यवस्थित करने की चेष्टा नहीं की है , अपितु भाव को सब्दो के माध्यम से लय और तुक में बांध दिया है .
उद्देश्य...
"साहित्य समाज का निचोड़ तथा वर्तमान द्वारा भविष्य को दिया गया अमूल्य धरोहर है "

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