रविवार, 7 अक्टूबर 2018

ऊंट किस करवट बैठेगा,आगामी चुनाव के मद्देनजर चुनावी विश्लेषण

            ऊंट किस करवट बैठेगा...आगामी चुनाव के मद्देनजर चुनावी विश्लेषण... 


"मप्र  चुनाव  में  राफेल  डॉलर की  बाते  जैसे आँख मरना, होठ हिलाना और मामला सेट होजाना.
राहुल गाँधी का चुनाव प्रचार करना जैसे गरजे बरषे बादल ,जमीं पे आते आते हवा में ही सूख जाना .
कमल नाथ का प्रचार करना जैसे लाल दन्त  मंजन की रिब्रांडिंग करके,पतंजलि से बेहतर बताना ..."
मप्र  चार जोन में बटा है ,जो विविधिता से भरा हुआ है  खान पान बोली ,जाति प्रतिसत अलग अलग है ,जहाँ एक सी रड़नीति कारगर नहीं हो सकती है .



उदाहरण ...विंध्य छेत्र,ग्वालियर के समीपवर्ती जिले जहाँ  sc/st act...मामला गरम है,सवर्णो की  वोट की स्थिति ऐसी है जैसे "सोमबारी बाजार में माल रेडी के भाव",जिसका कारण sc /st कानून ,पदोन्नति में आरछण. आरछण को लेकर बढ़ता  सवर्णो आक्रोश ,बेरोजगारी ,शिवराज सिंह की गलत बयानी ,जो रायता फैल चुका है .बीजेपी कुछ भी करे उसका कोर वोट बैंक उसके पाले से निकल कर फाउल रेंज पे खड़ी है. बीजेपी को  गोल पोस्ट में डालने के  अब मूड में है ,जिसका लाभ  कांग्रेस ,सपाक्स और अन्य बांकी दल उठाएंगे.



बीजेपी के लिए राहत की बात ये है की मप्र  सहित बांकी चुनावी राज्जो में पहली बार कुछ नए समीकरण तैयार होरहे है ,sc/st और अन्य पिछड़ा वर्ग मतदाता का रुझान बीजेपी की तरफ जाने के संकेत है  ,sc /st एक्ट, आवास और उज्वला,जैसी योजनाओ से उनके अंदर एक विश्वास बनता दिख रहा है .जिसका लाभ आज तक कांग्रेस और बहुजन उठाती रही है ,लेकिन वर्तमान स्थिति इसके उल्ट है .परिवर्तन परिस्थिति के अनुसार बदलते है और इस बदलते समीकरण में कांग्रेस के लिए अवसर बन सकता है ,खोने के लिए तो कुछ है नहीं ," नए सिरे से उसे खुद को पुराने ढर्रे से हट कर एक नई राह बनाने की अवस्य्क्ता* है.



बिना गठबंधन के भी वो फिर से सत्ता में वापिस आ सकता है,बशर्ते सही समय में सही पत्ते खोले ,व्यक्ति और रड़नीति समय के हिसाब से फंक्शन करे,जनता का फिर से  विस्वास जितने की जरुरत है न की राहुल गाँधी की ताजपोशी .


"बदलते परिवेश के साथ हालात को बदलना और हालत से समझौता करना एक कुसल रणनीतिक की पहचान है ,एक बार बाजी अपने हाँथ में आजाने पर किसी पर भी दाव लगाया जा सकता है..."
 विषय पर लौटता हूँ ...दूसरा उदाहरण मालवा ,निमाड़ में किसान नाराजगी को भुनाना ,प्रमुख जिलों में व्यापम के मुद्दे को हवा देना ,भृष्टाचार ,जिसपर कांग्रेस को विशेष ध्यान देने की जरुरत है ,व्यपम को छोड़ कर १५ साल में कांग्रेस एक भी भृष्टाचार  को सामने ला पाने में विफल रही है .रोजगार मुद्दा एक केंद्रीय विषय है जिसपर कांग्रेस को सिर्फ बाते ही नहीं एक ब्लू प्रिंट बनाने की जरुरत है.



अगर कांग्रेस को सत्ता पे फिर से काबिज होना है तो बाबा रामदेव की तरह ,आँख भी मारना ,होठ भी हिलाना ,वक़्त पड़े तो अपनी ब्रांडिंग के लिए चुनावी  दंड बैठक भी लगानी पड़ेगी(विशेष संदर्व में ये बात है)... 15 साल के जख्म को कुरेद कुरेद कर ,हर जख्म के लिए अलग अलग मरहम का डेमोंस्ट्रेशन देना पड़ेगा...समय बदला है मार्केटिंग के तौर तरीके बदल गये है .


फायदा नहीं फीचर पर अब लोग ज्यादा ध्यान देते है ,बाबा के प्रोडक्ट को लोग फीचर देखकर ही तो खरीदते है...बाबा का प्रोडक्ट के कॉम्पोनेन्ट पर विशेष जोर होता है .दन्त साफ हो या न हो लोग यही सोचते है ,दन्त अंदर से मजबूत होरहे है ,लम्बे समय तक टिकाऊ रहेंगे. कांग्रेस के नेता  बाबा की तरह हर कला में माहिर हो या न हो अपने आपको ढाल ले तो एक बेहतर विकल्प दे सकते है एक सुनहरा मौका है उनके पास...


मप्र में बीजेपी हो या कांग्रेस शिवराज सिंह  के अलावा और किसी नेता की छवि सर्वत्रिक नहीं है ,लेकिन जैसा की मैंने पहले कहा ,छवि एक महत्वपूर्ण  कारक है ,व्यक्तिगत और व्यापारिक ब्रांडिंग के परिपेच्छ में  लिहाजा शिवराज सिंह की छवि एक नकरत्मक बनती दिख रही है जिसका लाभ ज्योतिरादित्य सिंधिया उठा सकते है .मप्र की जनता उनकी कार्य पद्द्ति से वाकिफ तो नहीं है लेकिन एक सकारत्मक छवि है ,अपने दृढ़निश्चय और कर्मठता से सकारात्मक असर पैदा कर माहौल को कांग्रेस के पछ में कर सकते है...



"चुनावी पृष्ठ भूमि पर अपनी पुस्तक "शब्दारन्य"  में "चरणवन्दन समारोह" नाम से एक लघु उपन्यास लिखा है जो  दो भागो में है जिसका पहला भाग ही प्रकाशित किया है जो खास तरह की रड़नीति पर आधारित है . राजनीतिक व्यक्तियों केलिए एक बेहतर आईडिया ,डायलॉग  पंच  चुनावी स्पीच के लिए फायदेमंद हो सकता है..."

                                                                                                                                         धर्मेंद्र मिश्रा ...

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