बघेली कविता
बघेली ,अवधी की उप बोली है,जो विन्धय छेत्र में बोली जाती है और अवधी तुलसी दास की भाषा है .बघेली बोलने का लहजा भोजपुरी से मिलता-जुलता है.
उम्मीद है पसंद आएगी...
..मिडिल पास नाती..
जात रहेन बागै एक दिन
सौंहै पकड़े ढर्रा.
जब कम होइगा घाम जेठ
के कर्रा.
घाम जेठ के कर्रा हम
बंधे मुड़े मुड़इठा.
छोरे-छोर बढ़े जाई हाँथ
मा लिहे डंडा.
अतने मा देखींन हमका
रामसजीमन काकू.
बइठे रहेंउ अपने चौरामा
बनवत चून तमाखू.
खड़े खड़े ओहिनठे उनकर
नाती धूर उड़ाबै.
अपने नाती के ऊँ हमसे
लागें हाल बताबै.
जबसे पढ़ै के खातिर
ईया आपन नाव लिखाइस.
पढ़ै लिखयमा भास न भद्रा
ईया हमका बिकबाइस.
पढ़तमाहि कपार फाटय,दिन
भर खेलय का दउडै .
पढै का कही देइ ता
हमहिंन का चाबय दउडै .
काहाल बताई बेटा एकर
एका चढ़ी है खूब चर्बी .
खरखर ईया लड़िका से
बनै न सौ तक गिनती.
सोचन तै की मिडिल भरे
मा मति एकर कुछ फैली.
चाल चलन बेउहार कुशलता
के सिखलाई या सैली.
चौथा भर हम पढ़े रहन
तै,ऊंच नीच सब जानी.
जेकर जइसन रिस्ता नाता
ओका ओइसन मानी.
कसके मिडिल पास होइगा
एकर हाल ता देखा.
हमरेव पांच के नयी
ऐसे बनै न हिसाब लेखा.
खाय भरे का कही दे
सब नीक-नीक चाही.
खाई के फेर दिन भर
एकई-ओकई दौड़ी.
खाय भरे का आवत घर
मा बगत है दिन भर आवारा.
दिनभरे मा लैके आवय
न एक बछियो भरे का चारा .
चुप्पे घुसी के खाै
लेत है,बगत है दिनभर छोरे चुंदी.
अपने हाँथ से दिनिहिस
न कबहुँ गोरुअन के सरफुंदी.
मानत होइ मन माही की
हम नीक नौकरी पाउब.
मिलिहि नौकर चाकर हमका
भारी मउज उड़ाउब .
कह "मिश्रा"बी.ए,म.बी.ए
पास मिलै न चौकीदारी.
तोहरे नाती का काका
कैसे मिलेगी जागा सरकारी .
सेतिन दर्जा केर तरक्की
है आजकाल मिलती.
इहेमेंके लड़िका कहत
फिरैं नौकरी कहाँ मिलती.
हर
व्यक्ति को अपना काम कठिन और रोचक लगता है, लेकिन हिंदी की सभी विधाओं में
लेखन का कार्य करता हूँ ,इसलिए मेरा अनुभव तो यही करता है ,भावपूर्ण कविता
लिखना मुश्किल और समय भी ज्यादा लगता है .कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर
दे ...
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