गुरुवार, 19 अप्रैल 2018

कविता ये जीवन तो एक खेल है


                                         कविता


स्वयं को जीवन के आखरी दौर में रख कर जो अनुभव किया ,
वही इस कविता के माध्यम से कहने की कोशिस है .
कविता lyrical way पर है उसी way में पढ़े तो ज्यादा आनंद ले पाएंगे...


ये जीवन तो एक खेल है
जिसे  हम  नहीं खेलता कोई और  है

जीवन झूठा ,एक कोरा कागज 
कोरा ही रह जायेगा
 
जीवन रूपी  माटी  का पुतला
माटी में ही  मिल जायेगा

एक चादर ओढ़े चार कंधो में लदा
 इस दुनिया से चला जायेगा

तोड़ देगा वो हमारे सारे सपने
जब उसका मन हमसे भर जायेगा

करा-धरा सब यही रह जायेगा...

इस जीवन में क्या खोया क्या पाया
बुढ़ापा जब आया,जीवन में,ठहराव आया 

पीछे की दुनिया में अब मै लौट आया 
 बचपन,खेल-खेल में,जवानी, हसते गाते

मौज उड़ाते गुजर गई
बचपन में माँ की गोदी ही जन्नत लगती

माँ की लोरी ,माँ की थपकी
से ही आँखों में निदिया आती

थोड़ा बड़ा हुआ जब माँ का पल्लू
पकडे दिनभर पीछे-पीछे चलता

ओझल हो जाये माँ तो रो-रो के
घर सर पे उठा लेता
खेल खिलौनों को ही सब  कुछ समझा

माटी  के खिलौने में भी जीवन दिखता 
खेल -खेल में ही बचपन गुजरा



ये जीवन तो एक खेल है
जिसे  हम नहीं खेलता कोई और  है

ये जीवन झूठा ,एक कोरा कागज 
कोरा ही रह जायेगा


जीवन रूपी  माटी  का पुतला
माटी में ही  मिल जायेगा

एक चादर ओढ़े चार कंधो में लदा
 इस दुनिया से चला जायेगा

तोड़ देगा वो हमारे सारे सपने
जब उसका मन हमसे भर जायेगा
करा-धरा सब यही रह जायेगा... 


बचपन गया जवानी आई 
अवचेतन मन चेतन हो  गया 

जीवन ने एक नया आकर ले लिया
गीली मिट्टी सुखी मिट्टी में बदल गई

कॉपी-किताब में ही जीवन सिमट गया
आधी जवानी पढ़ाई-लिखाई में ही गुजरी

फिर धूप-छाव का खेल सुरु हो गया
रोजी-रोटी की खातिर खाक छानता फिरता

खुद के लिए जीने का जब  मौका आया
तो  बीबी घर ले आया 

देखते-देखते बच्चे भी हो गये 
सपने अधूरे थे,अधूरे ही रह गये

जिंदगी को कही पीछे ही छोड़ आया
बीबी-बच्चो के सपने ही अपने होगये

आधी-अधूरी जिंदगी को साथ
लेकर ही आगे बढ़ता रहा 

अपनी-दुनिया अपनी अब कहाँ रही
ज़माने की भीड़ में ही कही खोगई

माँ-बाप की तो सुध भी न रही 
रह रह के आज उनकी याद आती रही

जिंदगी जीने में एक अरसा लग गया
जिंदगी का फलसफा आज 
चंद मिंटो में ही सिमट के रह गया...

ये जीवन तो एक खेल है
जिसे  हम  नहीं खेलता कोई और  है

ये जीवन झूठा ,एक कोरा कागज 
कोरा ही रह जायेगा

जीवन रूपी  माटी  का पुतला
माटी में ही  मिल जायेगा

एक चादर ओढ़े चार कंधो में लदा
 इस दुनिया से चला जायेगा

तोड़ देगा वो हमारे सारे सपने
जब उसका मन हमसे भर जायेगा
करा-धरा सब यही रह जायेगा... 

                                                          ~धर्मेंद्र मिश्रा~

  

Share this

हिंदी उपन्यासकार ,कहानीकार ,दार्शनिक ,प्रकाशित पुस्तकें " धारणावाद ;अमूर्त दर्शन, मुहाना सीरीज , घोस्ट हंटर , दायरा ,कहानी की दुनिया ,सैर सपाटा ,आबरू ,लम्पट ,किड्स बूस्टर ,कलर मी, नोट बुक "इत्यादि। Online, e-book, paper back ,amazon, flip kart ,notion press. Podcast Audio Book; Shool bhadra vs Andh karni

0 Comment to "कविता ये जीवन तो एक खेल है "

एक टिप्पणी भेजें

Useful, valuable comments are welcome!!!