धर्म-युद्ध छिड़ा है बंगाल में,कविता
धर्म-युद्ध छिड़ा है बंगाल में,
नरभछी फिर जाग उठे ,
छुद्र रक्त इनका पानी करने ,
कौन-कौन जायेगा बंगाल...
अमन की बाते करने वालो ,
ये नरभछी अब रहम के काबिल नहीं ...
ये वही नरभछी की औलादे है ,
जिसने तुम्हारे पुरखो का रक्त बहाया था ..
मर-मिटे तुम्हारे पुरखे,
इन बुजदिलो से कभी डरे नहीं...
ये नरभछी अब रहम के काबिल नहीं ...
ये वही नरभछी की औलादे है ,
जिसने तुम्हारे पुरखो का रक्त बहाया था ..
मर-मिटे तुम्हारे पुरखे,
इन बुजदिलो से कभी डरे नहीं...
सहीद होगये,मगर सर झुकाया नहीं .
.रक्त से सींचा था इस धरा को,
तब जाके तुम चैन से सोपाते हो .
याद कर अब तू उनको,
रक्त में अपने उबाल भर .
समय नहीं ये सोचने का ...देर न कर तू ..
नहीं फिर तू .. पछतायेगा .उठ.. अब तू खड़ा होजा .. ?
अब न उठा तो ,तू ... नपुंसक कहलायेगा...
क्या तू नपुंसक कहलायेगा ?
क्या तू इस तोहमत के साथ जी पायेगा?
आने वाली पीढ़ी को सच बता पायेगा ?
नहीं तो ..सुनी माँगे,दर्द से बिलखते
बच्चे ,बूढ़े ,और जवान ,बहते हिंदूंओ के,
रक्त का कतरा-कतरा ,तुमसे कहता है,
कौन -कौन इन नरभछियों का
सर- कलम करने आएगा बंगाल...
आएगा बंगाल....?
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