सोमवार, 2 अप्रैल 2018

हिंदी कविता

   चुप-चाप खामोश से क्यों बैठे हो?  

जीवन में एक नया उमंग जोश और उत्साह से भर देने वाली कविता ...



"चुप-चाप खामोश से क्यों बैठे हो
ऊपर आसमानो में क्या देखते हो

दीपक बुझा के उम्मीदों का क्या ढूढ़ते हो
योँ आँखों में पानी भर के क्यों बैठे हो

मन कहता है तुम हार गये हो
इसमें क्या नहीं बात कहते हो 

हारा  कौन नहीं इस जग में 
तुम अकेले नहीं इस जग में 

ये हार नहीं सीख है जीवन की
आस है सांस है जब तक जीवन की

तुम अपने अंदर झांक कर देखो
दिन है तो सूरज की तरफ देखो 

रात है तो चाँद की तरफ देखो 
इनसे अब तुम कुछ सीखो 

तेज है कितना सूरज में 
रौशन है ये जग सूरज से 

उसको भी ये मालूम नहीं 
जग का कोई कोना बचा नहीं

वो सक्ति मिली है तुमको
उस सक्ति को तुम पहचानो

तप जाने पर ही रौशन होंगे
पहले स्वयं जलना सीखो 



चुप-चाप खामोश से क्यों बैठे हो
ऊपर आसमानो में क्या देखते हो ...

बुझ जाये उम्मीदों का सूरज तो
चाँद से भी तुम कुछ सीखो 

चाँद की रौशनी में सीतलता है 
जो मन को ठंडक पहुँचता है  

धीरे -धीरे है चलता रहता 
राही को है राह दिखाता 

तिमिर हटाता जाता
पथ प्रशस्त करता जाता

ये जग सारा रौशन चाँद और सूरज से
लेते नहीं फिर भी कुछ इस जग से


जीवन को तुम सत्य से जानो 
किस अर्थ जन्मे पहले ये जानो 



निष्काम भाव से अब अपना कर्म करो
कर्म फल की इच्छा तुम क्यों करते हो 


कर्म करने के ही अधिकारी हो
कर्तव्य पथ पे तुम अडिग रहो

दुस्तर से दुस्तर कार्य भी तुम अब कर जाओ
दुर्लभ उपलच्छ भी हासिल है अब तुम उठ जाओ


चुप-चाप खामोश से क्यों बैठे हो
ऊपर आसमानो में क्या देखते हो ...

                                               ~धर्मेंद्र मिश्रा

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