" व्यावहारिक विज्ञानं,Behavioral science"
हर प्रजाति जीव अपनी प्राकृतिक संरचना अनुसार दृश्टिगत समानता है किन्तु व्यावहारिक मूल तत्त्व ,गुण जीवन को औरो से किस प्रकार भिन्न बनाते है ,इस विषय पे गहराई से जानते है ...
हर पदार्थ element की अपनी प्रॉपर्टी अपना मूल गुण धर्म होता है , किसी कारक की उपस्थिति में मिलान मिक्स करने पर मूल गुण -धर्म , प्रॉपर्टी में बदलाव होने लगता है। कहावत proverb भी है तरबूजा तरबूजे को देख कर रंग बदलता है मिश्रित कुछ चमकीला bright रंग होजाता है।
...यदि ऐसा नहीं होता ,एक दूसरे को प्रतिकर्षित करते है इसका अर्थ ,मौजूदा पदार्थ element का गुण धर्म property, में कोई समानता नहीं है ।
उसी प्रकार मनुष्य के व्यव्हार में भी यही बात लागु होती है ,स्वतंत्र अवस्था में वह अपने अनुसार कर्म -साध्य व्यव्हार करता है।
परिस्थिति को कारण भूत solvent मानते हुए किसी और मनुष्य के संपर्क में आने पर व्यव्हार में परिवर्तन स्वाभाविक परिक्रिया हो सकता है।
ऐसा न होने पर ...इसका अर्थ means व्यव्हार एक दूसरे के अनुकूल नहीं है ...विरोध वाद - विवाद कारण स्वरुप परिलछित होता है ।
संछेप में यदि समझे मनुष्य को अपनी प्रकृति के अनुसार ही व्यक्ति का चुनाव करना चाहिए ,जो छिपे हुए गुणों में उभार लाये जीवन को बेहतर better तथा सार्थक useful बनाये।"
~धर्मेंद्र मिश्रा ~

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