इस्लाम धर्म दुनिया के नवीनतम धर्मो में से है , इस धर्म की स्थापना 6 वी शताब्दी के मध्य पैगम्बर हजरत मोहम्मद द्वारा सऊदी अरब के मक्का में की गई थी . महज चौदा सौ सालो के अंदर इस्लाम ने इतनी तेजी से वृद्धि किया की आज दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा जनसँख्या वाला धर्म बन गया है .इस्लाम धर्म को मानने वालो की संख्या आज लगभग 120 करोड़ के आसपास है , जो ईसाई धर्म 150 करोड़ के बाद आता है .जिस तरह से मुस्लिमो की संख्या बांकी धर्म की अपेछा बढ़ रही है उसे देखते हुए यही कायष लगाया जा सकता है की 2050 तक इस्लाम दुनिया का सबसे बड़ा धर्म बन जायेगा .भारत के परिपेच्छ से देखा जाये तो इस्लाम की इतनी तेजी से बढ़ती जनसँख्या वृद्धि में भारत का भी महत्वपूर्ण योगदान है .
इस्लाम भारत में 14 फीसदी जनसँख्या के साथ दूसरा सब से बड़ा धर्म है .भारत इंडोनेसिया के बाद दूसरे नंबर की सब से बड़ी मुस्लिम आबादी वाला देश है और जिस तरह से मुस्लिम आबादी बढ़ रही है ,इसमें कोई दोराय नहीं की 2050 तक भारत इंडोनेसिया को पछाड़ कर दुनिया का सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाला देश बन जायेगा .
इस्लाम का भारत में प्रादुर्भाव कैसे हुआ इस पर नजर डालते है:
इतिहासकार हेनरी मिलियेट की किताब "द हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया" के मुताबिक इस्लाम ने भारत में पहली दस्तक केरल के मालाबार तट पर दी .सऊदी अरब से व्यापारियों का एक जहाज 6 वि सताब्दी के मध्य मालाबार तट के माध्यम से भारत में प्रवेश किया और वहाँ पर “अली एबिन दीनार ” नाम के एक व्यपारी ने एक मस्जिद का निर्माण किया जिसका नाम “चेरमान जुमा ” था. चेरमान जुमा आज दुनिया की सबसे प्राचीन मस्जिदों में से एक है .
वही पर मालाबार में ही रहने वाला मपलास समुदाय इस्लाम धर्म को अपनाने वाला पहला समुदाय बना.
परन्तु प्रत्यछ तौर पर इस्लाम 712 ईस्वी में मुस्लिम आक्रांता मोहम्द बिन कासिम जो तुर्क के सिराज सहर से सम्बन्ध रखता था ,ने लगभग छह हजार सैनिको के साथ भारत के “सिंध प्रदेश “वर्तमान पाकिस्तान के कराची में पहला आक्रमण किया .सिंध प्रदेश में उस समय तत्कालीन हिन्दू राजा “धीर सेन ” का राज्य था . जिसे हराकर मोहम्द बिन कासिम ने वहाँ पर अपना कब्ज़ा जमाय फिर हिन्दू मंदिरो में लूटपाट और हिन्दुओं का कत्लेआम सुरु कर दिया. उसका मकसद वहाँ पर राज्य करना नहीं अपितु भारत की अपार धन सम्पदा को लूटना था .
और उसने वैसा ही किया अपना मकसद पूरा करने के बाद वहाँ से वापिस अपने देश लौट गया .
उसके बाद 986 ईस्वी में "सुबक्तगीन" नाम के एक आक्रमणकारी ने भारत के उत्तर –पश्चिम में वहाँ के राजा जयपाल को हराक़र उसकी गद्दी में खुद काबिज होगया .ये घटना भारत की पहली मुस्लिम राजशाही वंश की शुरुआत थी.
सुबक्तगीन की मृत्यु के पश्चात उसका पुत्र उसकी राजगद्दी पर बैठा जिसका नाम हिंदुस्तान कभी नहीं भूल सकता जिसे “ बूत सिकन ” या “’मूर्तिभंजक ” के नाम से भी जाना जाता है और वो आक्रांता था महमूद गजनवी . यही वो पिसाच था जिसने पहली बार हिंदुस्तान में जेहाद का नारा दिया .
महमूद गजनवी ने भारत में पहला आक्रमण सन 1025-1026 ईस्वी में सोमनाथ के मंदिर में किया .सोमनाथ मंदिर अपनी अपार सम्पति के लिए प्रसिद्ध था .गजनवी द्वारा इसी मंदिर को लूटते समय तक़रीबन 50 हजार से भी जादा हिन्दुओं और ब्राह्मणो का सर कलम करवा दिया गया.
महमूद गजनवी के साथ ही भारतीय इतिहास के पन्नो में दर्ज अलबरूनी और फिरदौसी जैसे दरबारी कवी का आगमन भी हुआ था , जिन्हो ने क्रमशः "किताब -उल हिन्द" और " सहनामा" जैसे ग्रंथो की रचना की थी .
अब बढ़ते है इस्लाम के दूसरे प्रत्यछ प्रादुर्भाव की ओर जो इशारा करता है : मोहम्मद गौरी की तरफ .मोहम्मद गौरी और पृथ्वी राज चौहान के मध्य लड़े गए तराईन की जंग इतिहास के पन्नो में खास महतवा रखता है .
सन 1191 ईस्वी में तराईन में पहली जंग लड़ी गई जिसमे पृथ्वी राज चौहान ने मोहम्मद गौरी को बुरी तरह से पराजित क़र उसे जिन्दा छोड़ दिया लेकिन 1192 ईस्वी की दूसरी जंग जो तराईन में ही लड़ी गयी और उस जंग में पृथ्वीराज चौहान को हार का मुँह देखना पड़ा .लेकिन मोहम्मद गौरी ने पृथ्वी राज पर रहम नहीं किया अपितु उस नरभछी द्वारा पृथ्वी राज की हत्या से पूर्व कड़ी यातनाये दीगई दोनों आंखे निकलवा ली फिर तलवार से सर कलम करवा दिया .
इसके बाद सन 1194 ईस्वी में मोहम्मद गौरी और कन्नौज के शासक जयचंद के मध्य चंदवार का युद्ध हुआ जिसमे जैचंद पराजित हुआ और उसकी भी हत्या क़र दी गई . यह वही जयचंद था जिसने पृथ्वी राज के विरुद्ध जंग लड़ने के लिए मोहम्मद गौरी को आमंत्रित किया था . इसी के नाम पर एक मुहाबरा भी है "इस देश को हानि है जयचंदो से है " जयचंद को उसकी गलती की सजा तो मिली लेकिन उसके दिए हुऐ जख्म आज हिन्दुस्तन के लिए नासूर बनगए है .हिंदुस्तान आज भी उस तपिश में जल रहा है जो आग जयचंद ने लगाई थी. हजारो सालो पहले लगाई गयी वो आग न तो कभी बुझी थी और न ही कभी बुझने पायेगी बल्कि एक दिन ज्वालामुखी का लावा बन हिंदुस्तान को पूरी तरह खाक क़र देगी क्योकि अब यहाँ एक नहीं सैकड़ो लाखो जयचंद है.आम आदमी अपनी ही समस्यो से घिरा स्वयं के व्यक्तिगत स्वार्थ साधने में लगा है . सियासतदार निजी स्वार्थ ,सत्ता सुख के लिए किसी भी हद तक जाने से गुरेज नहीं करते .देशभक्ति, आडम्बर बन चुकी है जो महज अखबारों और टीवी तक ही सिमट के रह गई है .कहने को तो हम एक प्रगतिशील समाज का निर्माण क़र रहे है लेकिन देश अंदर ही अंदर खोखला होता जा रहा .देश में अमीर -गरीब ,धर्म और जातियों के बीच की खायी कम होने की बजाय बढ़ती ही जा रही है.धर्म और जाती के नाम पर सियासती रोटियां सेकि जा रही है. सियासत के लिए धर्म आस्था से बढ़ क़र कही नशे का रूप ले चूका है .सियासतदार जनता को धर्म के नाम पर गुमराह कर सत्ता सुख भोग रहे है.दुनिया का सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक देश आज छद्दम (pseudo) लोकतंत्र के पथ पर अग्रसर है जिसे सायद ही रोका जा सकता है . अपने विषय पर लौटते है .भारत में तबाही और लूट -पाट करने के बाद सन 1206 ईस्वी में जब मोहम्मद गौरी भारत से गजनी वापिस लौट रहा था ,तब उसी सफर के दौरान रस्ते में ही मोहम्मद गौरी की हत्या खारवाल नाम के एक हिन्दू समुदाय द्वारा उस नरपिसाच की भी हत्या क़र दी गई .
उस नरपिसाच की कोई संतान न होने के कारण उसका गुलाम सेनापति "कुतबुद्दीन -ऐ-बक" ने सत्ता का भार संभाला . सन 1206 ईस्वी लाहौर में उसने अपना रज्जायभिषेक करवाया परन्तु उसने सुल्तान की पदवी धारण न करते हुऐ अपने आप को "मालिक और सिपहसालार " की उपाधि से ही संतुस्ट रखा . कुतबुद्दीन -ऐ-बक ने ही मोहम्मद गौरी की सह पर हजारो हिन्दुओं का खून पानी की तरह बहाया था .सैकड़ो हिन्दू मंदिरो और जैन मंदिरो को खँडहर में तब्दील क़र उन्ही भग्नवेशो से वही पर मस्जिद का निर्माण किया जिसका सबसे बड़ा जीता -जगता नमूना अजमेर में स्थित "अढ़ाई दिन का झोपड़ा " और अजमेर सरीफ है और इसी के साथ कुतबुद्दीन -ऐ -बक ने दिल्ली की सल्तनत में गुलाम वंश की नीव रखी .
फिर इसके बाद दिल्ली पर खिलजी,तुगलक,लोदी और मुग़ल वंश का साशन रहा जब तक देश अंग्रेजो का गुलाम नहीं हुआ .
इस्लाम भारत में 14 फीसदी जनसँख्या के साथ दूसरा सब से बड़ा धर्म है .भारत इंडोनेसिया के बाद दूसरे नंबर की सब से बड़ी मुस्लिम आबादी वाला देश है और जिस तरह से मुस्लिम आबादी बढ़ रही है ,इसमें कोई दोराय नहीं की 2050 तक भारत इंडोनेसिया को पछाड़ कर दुनिया का सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाला देश बन जायेगा .
इस्लाम का भारत में प्रादुर्भाव कैसे हुआ इस पर नजर डालते है:
इतिहासकार हेनरी मिलियेट की किताब "द हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया" के मुताबिक इस्लाम ने भारत में पहली दस्तक केरल के मालाबार तट पर दी .सऊदी अरब से व्यापारियों का एक जहाज 6 वि सताब्दी के मध्य मालाबार तट के माध्यम से भारत में प्रवेश किया और वहाँ पर “अली एबिन दीनार ” नाम के एक व्यपारी ने एक मस्जिद का निर्माण किया जिसका नाम “चेरमान जुमा ” था. चेरमान जुमा आज दुनिया की सबसे प्राचीन मस्जिदों में से एक है .
वही पर मालाबार में ही रहने वाला मपलास समुदाय इस्लाम धर्म को अपनाने वाला पहला समुदाय बना.
परन्तु प्रत्यछ तौर पर इस्लाम 712 ईस्वी में मुस्लिम आक्रांता मोहम्द बिन कासिम जो तुर्क के सिराज सहर से सम्बन्ध रखता था ,ने लगभग छह हजार सैनिको के साथ भारत के “सिंध प्रदेश “वर्तमान पाकिस्तान के कराची में पहला आक्रमण किया .सिंध प्रदेश में उस समय तत्कालीन हिन्दू राजा “धीर सेन ” का राज्य था . जिसे हराकर मोहम्द बिन कासिम ने वहाँ पर अपना कब्ज़ा जमाय फिर हिन्दू मंदिरो में लूटपाट और हिन्दुओं का कत्लेआम सुरु कर दिया. उसका मकसद वहाँ पर राज्य करना नहीं अपितु भारत की अपार धन सम्पदा को लूटना था .
और उसने वैसा ही किया अपना मकसद पूरा करने के बाद वहाँ से वापिस अपने देश लौट गया .
उसके बाद 986 ईस्वी में "सुबक्तगीन" नाम के एक आक्रमणकारी ने भारत के उत्तर –पश्चिम में वहाँ के राजा जयपाल को हराक़र उसकी गद्दी में खुद काबिज होगया .ये घटना भारत की पहली मुस्लिम राजशाही वंश की शुरुआत थी.
सुबक्तगीन की मृत्यु के पश्चात उसका पुत्र उसकी राजगद्दी पर बैठा जिसका नाम हिंदुस्तान कभी नहीं भूल सकता जिसे “ बूत सिकन ” या “’मूर्तिभंजक ” के नाम से भी जाना जाता है और वो आक्रांता था महमूद गजनवी . यही वो पिसाच था जिसने पहली बार हिंदुस्तान में जेहाद का नारा दिया .
महमूद गजनवी ने भारत में पहला आक्रमण सन 1025-1026 ईस्वी में सोमनाथ के मंदिर में किया .सोमनाथ मंदिर अपनी अपार सम्पति के लिए प्रसिद्ध था .गजनवी द्वारा इसी मंदिर को लूटते समय तक़रीबन 50 हजार से भी जादा हिन्दुओं और ब्राह्मणो का सर कलम करवा दिया गया.
महमूद गजनवी के साथ ही भारतीय इतिहास के पन्नो में दर्ज अलबरूनी और फिरदौसी जैसे दरबारी कवी का आगमन भी हुआ था , जिन्हो ने क्रमशः "किताब -उल हिन्द" और " सहनामा" जैसे ग्रंथो की रचना की थी .
अब बढ़ते है इस्लाम के दूसरे प्रत्यछ प्रादुर्भाव की ओर जो इशारा करता है : मोहम्मद गौरी की तरफ .मोहम्मद गौरी और पृथ्वी राज चौहान के मध्य लड़े गए तराईन की जंग इतिहास के पन्नो में खास महतवा रखता है .
सन 1191 ईस्वी में तराईन में पहली जंग लड़ी गई जिसमे पृथ्वी राज चौहान ने मोहम्मद गौरी को बुरी तरह से पराजित क़र उसे जिन्दा छोड़ दिया लेकिन 1192 ईस्वी की दूसरी जंग जो तराईन में ही लड़ी गयी और उस जंग में पृथ्वीराज चौहान को हार का मुँह देखना पड़ा .लेकिन मोहम्मद गौरी ने पृथ्वी राज पर रहम नहीं किया अपितु उस नरभछी द्वारा पृथ्वी राज की हत्या से पूर्व कड़ी यातनाये दीगई दोनों आंखे निकलवा ली फिर तलवार से सर कलम करवा दिया .
इसके बाद सन 1194 ईस्वी में मोहम्मद गौरी और कन्नौज के शासक जयचंद के मध्य चंदवार का युद्ध हुआ जिसमे जैचंद पराजित हुआ और उसकी भी हत्या क़र दी गई . यह वही जयचंद था जिसने पृथ्वी राज के विरुद्ध जंग लड़ने के लिए मोहम्मद गौरी को आमंत्रित किया था . इसी के नाम पर एक मुहाबरा भी है "इस देश को हानि है जयचंदो से है " जयचंद को उसकी गलती की सजा तो मिली लेकिन उसके दिए हुऐ जख्म आज हिन्दुस्तन के लिए नासूर बनगए है .हिंदुस्तान आज भी उस तपिश में जल रहा है जो आग जयचंद ने लगाई थी. हजारो सालो पहले लगाई गयी वो आग न तो कभी बुझी थी और न ही कभी बुझने पायेगी बल्कि एक दिन ज्वालामुखी का लावा बन हिंदुस्तान को पूरी तरह खाक क़र देगी क्योकि अब यहाँ एक नहीं सैकड़ो लाखो जयचंद है.आम आदमी अपनी ही समस्यो से घिरा स्वयं के व्यक्तिगत स्वार्थ साधने में लगा है . सियासतदार निजी स्वार्थ ,सत्ता सुख के लिए किसी भी हद तक जाने से गुरेज नहीं करते .देशभक्ति, आडम्बर बन चुकी है जो महज अखबारों और टीवी तक ही सिमट के रह गई है .कहने को तो हम एक प्रगतिशील समाज का निर्माण क़र रहे है लेकिन देश अंदर ही अंदर खोखला होता जा रहा .देश में अमीर -गरीब ,धर्म और जातियों के बीच की खायी कम होने की बजाय बढ़ती ही जा रही है.धर्म और जाती के नाम पर सियासती रोटियां सेकि जा रही है. सियासत के लिए धर्म आस्था से बढ़ क़र कही नशे का रूप ले चूका है .सियासतदार जनता को धर्म के नाम पर गुमराह कर सत्ता सुख भोग रहे है.दुनिया का सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक देश आज छद्दम (pseudo) लोकतंत्र के पथ पर अग्रसर है जिसे सायद ही रोका जा सकता है . अपने विषय पर लौटते है .भारत में तबाही और लूट -पाट करने के बाद सन 1206 ईस्वी में जब मोहम्मद गौरी भारत से गजनी वापिस लौट रहा था ,तब उसी सफर के दौरान रस्ते में ही मोहम्मद गौरी की हत्या खारवाल नाम के एक हिन्दू समुदाय द्वारा उस नरपिसाच की भी हत्या क़र दी गई .
उस नरपिसाच की कोई संतान न होने के कारण उसका गुलाम सेनापति "कुतबुद्दीन -ऐ-बक" ने सत्ता का भार संभाला . सन 1206 ईस्वी लाहौर में उसने अपना रज्जायभिषेक करवाया परन्तु उसने सुल्तान की पदवी धारण न करते हुऐ अपने आप को "मालिक और सिपहसालार " की उपाधि से ही संतुस्ट रखा . कुतबुद्दीन -ऐ-बक ने ही मोहम्मद गौरी की सह पर हजारो हिन्दुओं का खून पानी की तरह बहाया था .सैकड़ो हिन्दू मंदिरो और जैन मंदिरो को खँडहर में तब्दील क़र उन्ही भग्नवेशो से वही पर मस्जिद का निर्माण किया जिसका सबसे बड़ा जीता -जगता नमूना अजमेर में स्थित "अढ़ाई दिन का झोपड़ा " और अजमेर सरीफ है और इसी के साथ कुतबुद्दीन -ऐ -बक ने दिल्ली की सल्तनत में गुलाम वंश की नीव रखी .
फिर इसके बाद दिल्ली पर खिलजी,तुगलक,लोदी और मुग़ल वंश का साशन रहा जब तक देश अंग्रेजो का गुलाम नहीं हुआ .
0 Comment to "हिंदुस्तान में इस्लाम का प्रादुर्भाव"
एक टिप्पणी भेजें
Useful, valuable comments are welcome!!!