शुक्रवार, 19 जनवरी 2018

..गजल ..

Gajal-
1-


परवाना मिला जिंदगी को मगर कोई असरार न मिला  .
सोहरत मिली ज़माने भर की मगर खुद से ही महरूम रहा .
अमीरो के मोहल्ले में एक अपना भी बड़ा सा माकान है,
नौकर-चाकर भी है मगर कोई अपना न रहा .
अदीबो से सजी महफ़िल हर साम रौशन भी है,
हर कोई असनाई का मुजाहिरा भी कर रहा .
दुढ़ती है निगाहे महफ़िल में अपना भी है कोई,
रौशन-ए-महफ़िल बुझने पर हर कोई जाता रहा.
अपनों की तलाश में बॉयबॉ हो चली ये आंखे,
मंतजीर में खुद से ही बाते करता रहा .
गुसार धीरे-धीरे गौहान जिंदगी का.
हक़गोई सर्ब-ओ-रोज यही होता रहा.
 

2-



कोई दिल के इतने करीब आया है ,सोये हुए अरमान फिर जगाया है .
खवाब  आँखों में लेके आया है , फिर कोई आज मेरी कुर्बत  में आया है .
दिल ठहरा हुआ था ,चाहत की एक हुक सी उठी है .
नाउम्मीदी में भी उम्मीद की एक झलक दिख रही है .
भीड़ में भी  वो  सक्श अपना नजर आया है .
उसमे कही मुझे अपना हमसफ़र नजर आया है .
हर घडी उसे ही देखने को दिल हो रहा है.
किसी अजनबी पे दिल को करार आया है .
खलिश में भी तबस्सुम करू , दिल कह रहा है .
 खुद के लिए नहीं ,उसी के लिए दुआ करू दिल कह रहा है .


3-
मुर्दा  कभी  लौट  के  आते  नहीं ,जहाँ हूँ वही रहने दो .
कफ़स में बंद लास को  कम  से कम  चैन से  सोने  दो .
जिस  सक्श को  ढूढ़  रहे  हो  ये  सक्श  अब  वो  नहीं ,
जहाँ पहुँचती  नहीं  कोई  सदा  वो  सक्श  अब  मिलेगा  वही .
निसा  अपने  पैरो  के  मिटा  दिया  बरंजिशे   ज़माने  के  डर  से .
अपने  गुनाहो  की  सजा  खुद  को  दे  दिया  बिछड़ने  के  डर  से .
खुद को न पहचान पाउँ इस कदर रहता हूँ खुद से बेखबर.
 दर-बदर बेजार भटकता  टूट गया हूँ , अंदर से सर्ब-सर.

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