मंगलवार, 30 जनवरी 2018

"वो तराशा हुआ नगीना था "Ghajal Theory"

उनके क़द्र दान थे हजार ,योँ उनके पास दौलत थी बेसुमार .
काबिल भी थे वो, दुनिया भी थी, उनके हुस्सन की तलबगार .

सजी थी उनकी महफ़िल आदिवो से ,
उनकी हर अदा पे मर मिटने का दिखावा jo करते थे.

मै नदारत  था ..
वो अपनी महफ़िल के काबिल जो हमें नहीं समझते  थे ...
बेआबरू करके निकला हमें अपनी महफ़िल से,नaकश(mulyahin) समझ बैठे ,
मुझसा कद्रदान यार कोई नहीं था उस महफ़िल में सायद ये भूल बैठे ,

हर नज्म में उनका जीकर करता था,
रूह पढ़  के उनकी बरक(kagaj) पे उन्ही को utar deta...

फिर भी हम अदीब कहा थे,
उनकी महफ़िल के अदीबो(gyani) में मेरा नाम जो नहीं हुआ करता था ...

हमारी नज्मो को  छोड़,अपने महफ़िलो के अदीबो की हर
 नज्म पे वो वाह !वाह! किया करते थे ...

उनकी महफ़िल के अदीब भी खुद को निजाम(mahan) समझ थे,
एक ही नज्म को हर महफ़िल में सुनाया करते थे...
हमारी नजर में तो  सबसे बड़े नाकश वही थे,
इतने काबिल थे तो हर महफ़िल में इक नयी नज्म क्यों नहीं सुनाया करते थे ..
हम तो उनकी हर इक नजर में इक नयी नज्म कहने की  कूबत(kabliyat) रखते थे . ..


गोया उनकी महफ़िल के जो अदीब थे ,
उनकी आँखों में तिलिस्म(jadu,bhram) का पार्द  डाल के रखते थे .
अपने ख्यालातों  की दुनिया जेहन(dimag) में उतारते थे,
जिस्म की आराइश(jismani sundarta,sajavat) पे नज्म  जो कहते थे...

वो उन्ही को अपना यार  मान बैठे ,
बेनजीर-बेनजीर (sabse sundar,adwatiya)कह कर जो उन्हें  बुलाते थे ..

अब -ऐ-हुस्सन(javani ki chamak) उनका सबाब में था,
जिस्मानी हकीकत को ही जिंदगी मन बैठे ...

हमारी रूह को कभी न पड़ सके वो,
हम तो तन्हाई में भी उनके साथ रहते थे...

जो उनके जिस्म की आराइश पे नहीं,
उनकी रूह की बात कर्ता*  था .. .

उनको कदर नहीं थी हमारी ,
उनकी नजर में तो हमारी  कलम बेतासीर(nishprabhavi)  थी...

क़द्रदाn यार जब रुखसत हुए  उनकी महफ़िल से,
आग-राग*(bahri sajavat) उतर गया जवानी का ...

खुद को तन्हाई का शिकार पाया,
ढूढ़ने लगी उनकी निगाहे वो परवाना कहाँ गया ..
मगर उनकी जिंदगी से तब तक हम जा चुके थे ...

दुढ़ती रही उनकी निगाहे महफ़िल-महफ़िल,
काबिल तो नहीं था सायद किसी बेजार(garib)
की महफ़िल में ही मिल जाये. ..

मगर हमारी महफ़िल तो वही थी ,जिंदगी भी वही थी .
जिसने हमें अपनी महफ़िल से बेआबरू कर दिया था .
उसकी महफ़िल को छोड़ के फिर ये परवाना
किसी और महफ़िल में नहीं गया   ... 


फिर हम कहा थे तब उसकी जिंदगी में ... .

 हम सफर की तलाश तन्हाई का शिकार
उनकी जिंदगी हमें तलाश करती रही ...
इक दिन उनकी नजर इक किताब में
जाके ठहर गई लिखा था जिसमे
वो तराशा हुआ नगीना था ...वो तराशा हुआ नगीना था ...

यह इक रूहानी सफर है ,कहानी के ८ भाग और बचे है जिन्हे वक़्त रहते पूरा करना है .
Creation has written in one flow may be some  mistakes,Thank you so Much for visiting my page.
Esi tarh es blog ko apna ghar samajh ke ate raha kare.(try to feel as your own home)
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