मेले का रेला'कविता'
बचपन की यादे...
मेले का रेला देखने
मीलो पैदल ही सरपट दौड़ा जाता,
माँ से लड़झगड़ कर कुल्हड़
में जो था सब ले जाता.
पैर जमीन पे पड़ते नहीं,उछल-कूद
करते उधम मचाते दौड़ लगता,
मोहन बजा,बासुरी और
खिलौने सब लूंगा यही सोचते दौड़ा जाता.
साथी-संगती संग दौड़ा
लगता,आगे निकल जाते तो फिर पीछे कर देता,
थक जाता फिर भी न रुकता,मन
में एक उत्साह लिए दौड़ा जाता.
कही कच्ची सड़क तो कही
पक्की सड़क,तो कही पगडण्डी है,
रेलम-पेल लगी है,जिसे
देखो सब को मेले में जाने की जल्दी है.
उमड़ पड़ा है जन सैलाब
मानो आसमान में उड़ रहे हो गिद्ध और कौवे है,
रंगबिरंगे चितरंगे मेर-मेर के कपडे पहने मानो धरती बानी इंद्र-धनुष सतरंगी है.
नीले-अम्बर से ढकी
ये धरती पीले सरसो के फूल खेतो में लहराए,
पीला वस्त्र,सर पे
निला पल्लू ओढ़े धरती हवा चले मंद-मंद मुश्काये.
मखमली हरियाली की चहु
दिशा फैली बहार है,
मनभावन ठंडी-ठंडी पुरवाई
की चली बयार है.
जवान,बूढ़े,बच्चे,औरते चले जा रहे हसते,गाते कहकहा लगाते,
हाँथ में थैला
कोई सर पे गठरी लिए कदम ताल मिलाते जाते .
मोटर-गाड़ी,साइकल वाले
ठेलम-ठेल एक आगे और एक पीछे बैठाते,
हटो-हटो चलो साइड देदो
कहते,रुकते-रुकाते रौब झाड़ते भागे जाते.
मेले में भीड़ बड़ी अपार
एक के ऊपर एक चढ़ा मै नन्हा सा कैसा आगे बढ़ता,
धक्म-धक्का करता कभी
इधर कभी उधर से सब को ठेलते आगे बढ़ता जाता.
लाई-लडुइया,रुख,पिपिहरी,मेले
में थे तरह-तरह के सामान,
अमीर-गरीब सब एक समान
सब सब से करे दुआ-सलाम.
ये लेलूं, वो लेलु,जो
भी देखु ,लगता सब लेलु, मन ललचाता,
ये कितने का वो कितने
का, सभी खिलौनों का मोल करता.
दाम सुनकर मायुश हो
जाता,कम ज्यादा करनेको कहता,
हिसाब-किताब बैठता,फिर
अगले ठेले में बढ़ जाता.
जो लेना था ले लिया,एक
झोले में भर लिया,
माँ के डर से कुछ पैसे
भी बचा लिया.
रात न हो जाये कही
माँ छड़ी से सपट लगाएगी,
माँ के डर से अब मेले
से जाने की थी जल्दी.
मोहन बाजा, कभी पिपिहरी,तरह-तरह
की धुन बजाता,
पी-पी-पो-पो करता घर
की ओर फिर सरपट दौड़ लगाता.
(क्रमबद्ध घटनाओ को छंद बद्ध करना एक बड़ा ही मुश्किल काम है.उम्मीद है ये प्रयाश हमारे* पाठको को पसंद आई होगी.)
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