खुद से अनजान बेपरवाह परवाना भटकता रहा दर बदर,
कही रह गुजर नहीं वीराने में कही भटकता रहा वो उम्र भर .
आसमान की तरफ टक-टकी लगा के देख रहा था ,साम को एक दिन .
बैठा था पेड़ के निचे,वो और उसकी तन्हाई बस दो ही थे उस दिन .
मुद्दत के बाद न जाने कहाँ से एक भटका हुआ मुसाफिर आगया उस दिन.
मुसाफिर ...
ऐ भटके हुए मुसाफिर तुझे किसकी तलाश है ,
रोज देखता हूँ तुझे बैठे इस पेड़ के निचे ,
एक ही नज्म क्यों गुनगुनाता है सारा दिन .
कौन था वो तेरा अपना जो छोड़ गया तुझे इस हाल में ,
सक्लो-सूरत से कोई अदीब मालूम होते हो ,
फिर फ़क़ीर बन क्यों घूमते हो सारा दिन .
परवाना -
मुफ्लसी* का हूँ मारा रंजो-गम ही है मेरी जिंदगी का सहारा .
इस नज्म में मेरी रूह बसी है,अब यही है मेरी जिंदगी का सहारा .
राहगीर -
कौन था वो जो तेरी जिंदगी को इस हाल में छोड़ गया ...
कौन था वो बेदर्द जो तुझे in वीराने में छोड़ गया ..
परवाना -
नेक मालूम होते हो मेरे दर्द को तुम समझ सको तो सुनो ...
इश्क़ के तराजू में तो हम खरे थे ,दौलत का तराजू मेरे पास न था .
मगर वो इश्क़ के तराजू पे नहीं,दौलत के तराजू में ही दुनिया को तोलता था .
इश्क़ से पहले तो हम इंसान थे ,इश्क़ के बाद हम वो भी nahi rahe .
वो चाँद-तारो से अपनी दुनिया सजाते रहे ,
इधर हम रेत के जर्रे में जिंदगी तलाश करते रहे .
बिखर के मालूम हुआ आसमान ko देखना गुनाह नहीं ,
रेत के जर्रे को अस्मा तक पहुंचना मुमकिन नहीं .
तूफा आये रेत के जर्रे को कितना भी ऊँचा उड़ा लेजाए ,
फिर भी मुमकिन नहीं रेत का जर्रा आसमान को छुजाये.
खुद को तलाशा जब मैंने खुद में,खुद में ही मयाशर नहीं tha.
फिर लौटना मुमकिन नहीं था, जिंदगी से कही दूर चला आया tha .
मेरा इश्क़ ही मेरा गुनाह था .मेरी ख्वाइश ही मेरी गुनाह थी
आसमान में उड़ने की चाहत ही मेरी सबसे बड़ी दुसमन थी .
बिखर गया तो मालूम हुआ मेरी जिंदगी तो बस जर्ब थी ,
Khalish jindgi ki khalish hi rah gai,
adhi adhuri jindgi ke sath hi jeeti rahi.
Ghadi do ghadi ka mehman hun,
kab kis mod pe thahar jayun pata nahi.
मुसाफिर-
तुझ जैसे अदीब की कदर न की वो पत्थर दिल कौन था .
क्या वो इंसान ही है जिससे तू मोहब्बत कर बैठा था .
परवाना -
वो पत्थर नहीं वो एक मुकुट मणि नगीना है .
atf hai wo khuda ka,ajij hai anjuman ka ,
वो तराशा हुआ नगीना hai ....वो तराशा हुआ नगीना hai. ....
यह एक रूहानियत का सफर है ...
मेरी कलम किसी भी नियम के दायरे में नहीं बधी हुई है ,रचना एक बहाव में,महज एक घंटे में लिखी है .
असुद्धि होना स्वाभाविक है.
Creation is published .not allowed to use any way...any circumstances ..
कही रह गुजर नहीं वीराने में कही भटकता रहा वो उम्र भर .
आसमान की तरफ टक-टकी लगा के देख रहा था ,साम को एक दिन .
बैठा था पेड़ के निचे,वो और उसकी तन्हाई बस दो ही थे उस दिन .
मुद्दत के बाद न जाने कहाँ से एक भटका हुआ मुसाफिर आगया उस दिन.
मुसाफिर ...
ऐ भटके हुए मुसाफिर तुझे किसकी तलाश है ,
रोज देखता हूँ तुझे बैठे इस पेड़ के निचे ,
एक ही नज्म क्यों गुनगुनाता है सारा दिन .
कौन था वो तेरा अपना जो छोड़ गया तुझे इस हाल में ,
सक्लो-सूरत से कोई अदीब मालूम होते हो ,
फिर फ़क़ीर बन क्यों घूमते हो सारा दिन .
परवाना -
मुफ्लसी* का हूँ मारा रंजो-गम ही है मेरी जिंदगी का सहारा .
इस नज्म में मेरी रूह बसी है,अब यही है मेरी जिंदगी का सहारा .
राहगीर -
कौन था वो जो तेरी जिंदगी को इस हाल में छोड़ गया ...
कौन था वो बेदर्द जो तुझे in वीराने में छोड़ गया ..
परवाना -
नेक मालूम होते हो मेरे दर्द को तुम समझ सको तो सुनो ...
इश्क़ के तराजू में तो हम खरे थे ,दौलत का तराजू मेरे पास न था .
मगर वो इश्क़ के तराजू पे नहीं,दौलत के तराजू में ही दुनिया को तोलता था .
इश्क़ से पहले तो हम इंसान थे ,इश्क़ के बाद हम वो भी nahi rahe .
वो चाँद-तारो से अपनी दुनिया सजाते रहे ,
इधर हम रेत के जर्रे में जिंदगी तलाश करते रहे .
बिखर के मालूम हुआ आसमान ko देखना गुनाह नहीं ,
रेत के जर्रे को अस्मा तक पहुंचना मुमकिन नहीं .
तूफा आये रेत के जर्रे को कितना भी ऊँचा उड़ा लेजाए ,
फिर भी मुमकिन नहीं रेत का जर्रा आसमान को छुजाये.
खुद को तलाशा जब मैंने खुद में,खुद में ही मयाशर नहीं tha.
फिर लौटना मुमकिन नहीं था, जिंदगी से कही दूर चला आया tha .
मेरा इश्क़ ही मेरा गुनाह था .मेरी ख्वाइश ही मेरी गुनाह थी
आसमान में उड़ने की चाहत ही मेरी सबसे बड़ी दुसमन थी .
बिखर गया तो मालूम हुआ मेरी जिंदगी तो बस जर्ब थी ,
Khalish jindgi ki khalish hi rah gai,
adhi adhuri jindgi ke sath hi jeeti rahi.
Ghadi do ghadi ka mehman hun,
kab kis mod pe thahar jayun pata nahi.
मुसाफिर-
तुझ जैसे अदीब की कदर न की वो पत्थर दिल कौन था .
क्या वो इंसान ही है जिससे तू मोहब्बत कर बैठा था .
परवाना -
वो पत्थर नहीं वो एक मुकुट मणि नगीना है .
atf hai wo khuda ka,ajij hai anjuman ka ,
वो तराशा हुआ नगीना hai ....वो तराशा हुआ नगीना hai. ....
यह एक रूहानियत का सफर है ...
मेरी कलम किसी भी नियम के दायरे में नहीं बधी हुई है ,रचना एक बहाव में,महज एक घंटे में लिखी है .
असुद्धि होना स्वाभाविक है.
Creation is published .not allowed to use any way...any circumstances ..
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