"ईश्वर का प्राण है मंत्र ; मंत्र शक्ति "
आज हम एक ऐसे
विषय में बात करेंगे जिसके बारे
में आप शायद ही जानते होंगे या नहीं ही
जानते होंगे। इसमें आपकी कोई गलती नहीं। इस विषय कोई बात भी नहीं करता या करता भी
होगा तो आप तक बात पहुंची नहीं होगी। आप से एक सवाल करता हूँ।
जब भी हम किसी कमर्सिअल
यूज़ के लिए किसी व्यक्ति का
ऑडियो ,वीडियो या टेक्स्ट
फॉर्मेट में कोई कंटेंट उठाते हैं।
जिस भी व्यक्ति का वो कंटेंट होता है। ओरिजिनल
क्रिएटर होता है। उससे परमीशन लेते हैं या नहीं ? क्यों । क्योकि हमें किसी की चीज बिना उसकी परमीशन के
नहीं लेना चाहिए ये क़ानूनी अपराध है।
अब बात मुद्दे की करते हैं ; क्या आप सनातनी हैं ? यदि हैं तो घर में या मंदिर में या किसी ऐसे सार्वजनिक जगह पे जहाँ पूजा-पाठ चल रहा है।
मन्त्र तो पढ़ते होंगे ?
क्या आप उस मंत्र को देने
वाले को जानते हैं। नहीं जानते हैं तो
जानना चाहिए। क्योकि वो मंत्र देने वाले हमारे ऋषि -मुनि प्रथम दृष्टा हैं। उस मंत्र के द्वारा भगवान की स्तुति
की जिन्होंने उस मंत्र का प्रभाव जाना।
जिन्होंने उस मंत्र का
सबसे पहले साक्षात्कार किया तथा उस मंत्र द्वारा सर्वप्रथम सिद्धि प्राप्त की,
वही उस मंत्र का दृष्टा ऋषि माना गया है। जिसके
द्वारा हम लौकिक और पारलौकिक दोनों प्रकार से लाभ प्राप्त करते हैँ। उस मंत्र के
दृष्टा को न जानना अथवा उस दृष्टा को स्मरण किये बिना प्रयोग किंतनी बड़ी कृतघ्नता
है ?
इसलिए जो भी मंत्र आप जाप
करें या पूजा पाठ में प्रयोग करें उससे पहले उस मंत्र को देने वाले उन ऋषि
-मुनियों का स्मरण ध्यान कर उनसे विनय पूर्वक याचना करनी चाहिए। जिस मंत्र के जाप
से उन्होंने देवताओं की कृपा प्राप्त की, वैसे ही हमें भी उन्हीं के समान उस मंत्र के उच्चारण का लाभ मिले।
वर्तमान परिदृश्य से ही आंकलन करिये, भौतिक रूप से अनेकानेक लोगों में कितनी
संम्पन्नता देखने सुनने को मिलती है। किन्तु उनके जीवन में दिव्य शक्तिओं का कितना
प्रभाव है ?
पूजा -पाठ सभी करते हैं
लेकिन नकारात्मक शक्ति घेरे ही रहती है। जीवन में कृतघ्नता बनी रहती है। भले ही वे
लोग कितने ही धनवान, ऐश्वर्यावान
क्यों क्यों न हो। राग -द्वेष ,क्लेश से घिरे रहते हैं।
दूसरों के प्रति सेवा
-दया ,करुणा ,प्रेम जैसे भाव नदारत रहते हैं। मोह -माया, लोभ, लालच और पाखंड
में ही जीवन रमा रहता हैं। जो भी करते हैं
सिर्फ दिखावे दूसरों से श्रेष्ठ दिखने और दिखाने के लिए। जीवन का परम लक्ष्य सिर्फ
सुखों का भोग ही समझते है।
जितना जीवन से प्राप्त
करते हैं, उतनी ही कमी आती जाती है।
मनुष्य का सिर्फ आकार और ढांचा ही बचता है। पशुवत जीवन शैली में ढल जाते हैँ ।
हम ईश्वर की संतन हैं, हमें कृतघ्न, निकृष्ट जीवन नहीं जीना है। हमारे जीवन में बोध हो, ईश्वरीय शक्ति का भाव हो। हमे जो भी प्राप्त है। उसके प्रति
ईश्वर का आभार हो।
इसलिए जब हम अपने जीवन
में प्रयोग किये जाने वाले मन्त्रों का सही रूप से अनुपालन करेंगे, तभी उस मंत्र द्वारा यथेष्ट फल,सिद्धि की प्राप्ति कर सकेंगे। नहीं उसका फल
अल्पज्ञ, गौण ही रहेगा।
हमारे शास्त्रों में भी
कहा गया है" पुरुषविद्यानित्यत्वात कर्म सम्पत्ति -मन्त्रों वेदे। "
अर्थात -मनुष्य अल्पज्ञ
है, अतः उसकी विद्या अनित्य
है। उस अनित्य, अल्पज्ञ, संदिग्ध ज्ञान से कभी सत्कर्मों की सिद्धि नहीं
हो सकती।
अतः वैदिक मन्त्रों द्वारा ही कर्म संपादन होना चाहिए। वेदों का पालन करना प्रभु सम्मति है। मंत्र सिर्फ मंत्र नहीं उसमें छिपी ईश्वर की प्राण शक्ति है। इसे कुरीति कह कर ख़ारिज नहीं किया जा सकता। मध्यकालीन इतिहास में हम पढ़ते है, वैदिक नियमों के पालन को ढोंग और पाखंड कह कर दरकिनार किया गया। जिसका प्रभाव भी आप जानते हैँ, समय के साथ मनुष्य जीवन से ईश्वरीय शक्ति का प्रभाव कम पड़ने लगा। समाज बौद्धिक रूप से पंगु होता चला गया। विदेशी आक्रांतों द्वारा गुलामी की जंजीरों में जकड़ लिया गया।
समय के साथ धर्मांतरण जैसी विकृति एक हिंसक समाज की ओर बढ़ते गए। किन्तु हमें यह विचार करना
चाहिए जो सत्य है, नित्य है,
सास्वत है, हम अपनी जड़ों को काट कर एक वृछ होने की धारणा कैसे कर सकतें
हैँ ?
धर्म सिर्फ ज्ञान का
उपदेश नहीं है, कोई व्यक्ति चार
ज्ञान की अच्छी -अच्छी बातें करने लगे वही धर्म हो जाए। ऐसे हुए हैँ, और हैँ भी, बहुत सारे और आगे भी होंगे। किन्तु सनातन धर्म सिर्फ ज्ञान ,विज्ञान और उपदेश नहीं है। वह मनुष्य जीवन में
शास्वत प्राण रूप से उपलब्ध है। जिसकी शक्ति की आभा मन्त्रों के माध्यम से
परिलक्ष्छित है। जिस प्रकार शरीर के
अन्तः और बाह अंग एक समुच्चय से व्यवस्थित हैँ उसमें किसी प्रकार की थोड़ी सी भी
विकृति आजाने पर शारीरिक संरचना अव्यवथित हो जाती है। वैसा ही मन्त्रों के साथ भी
है ।
उसका अक्षरश: अपरिवर्तित
रूप से पालन करना चाहिए। वैदिक -कर्मों का पालन करते समय मन्त्रों का ज्यूँ -का
-त्यों उच्चारण करना चाहिए। यहाँ तक की मात्रा -पाई, स्वर की भी अशुद्धि न होने पाए। नहीं मंत्र, अपूर्ण और खंडित माना जाता है। कब और किस दशा में करना चाहिए,इसका भी ध्यान रखना चाहिए।
नहीं मनुष्य को फल की जगह
कुफल भोगना पड़ता है। आप स्वाध्याय तथा समझने के लिए अनुवाद कर सकते हैँ। स्वरचित भजन के माध्यम से भी ईश्वर
की आराधना कर सकते हैँ। उसका लाभ भी वैसा ही है जैसा स्वल्पहार में लिया गया फ़ास्ट
फ़ूड, जंक फ़ूड। इससे तत्छण लाभ
तो मालूम पड़ता है। लेकिन शरीर में दीर्घावधि तक शरीरीर क्षमता नहीं बढ़ाई जा सकती
है।
जटिलता तो यही है इसका ज्ञान कौन कराए ? समाज में भांति -भांति के गुरु और ज्ञानी हैँ । यही तो
ईश्वरीय सत्ता है जो आसानी से मिल जाए वो ज्ञान जीवन में बोध नहीं लाता। यदि आपके
अंदर ईश्वर की प्यास है, ईश्वर की चाह है
तो आपको स्वयं ही खोजना पड़ेगा।
- धर्मेंद्र मिश्रा
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